भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

२८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः उपमाध्वनिर्यथा— वीराणं रमइ घुसिणरुणम्मि ण तदा पिआथणुच्छङ्गे । दिट्ठी रिउगअकुम्भत्थलम्मि जह बहलसिन्दूरे ॥ यथा वा ममैव विषमबाणलीलायाम सुरपराक्रमणे कामदेवस्य— उपमा-ध्वनि, जैसे— वीरों की दृष्टि जिस प्रकार सिन्दूर से भरे शत्रुओं के हाथियों के कुम्भस्थलों में रमण करती है उस प्रकार कुंकुम से लाल प्रिया के स्तनोत्सङ्ग में रमण नहीं करती । अथवा जैसे मेरा ही 'विषमबाणलीला' में असुरों पर पराक्रम के अवसर में कामदेव का— लोचनम् व्यञ्जकः । अनुरणनरूपं यद्रूपकमर्थशक्तिव्यङ्ग्यं तदाश्रयेणेह काव्यस्य चारुत्वं व्यवतिष्ठते । ततस्तेनैव व्यपदेश इति सम्बन्धः । तुल्ययोजनत्वादुपमाध्वन्यु- दाहरणयोर्लक्षणं स्वकण्ठेन न योजितम् । वीराणां रमते घुसृणारुणे न तथा प्रियास्तनोत्सङ्गे । दृष्टी रिपुगजकुम्भस्थले यथा बहलसिन्दूरे ॥ प्रसाधितप्रियतमाश्वासनपरतया समनन्तरीभूतयुद्धत्वरितमनस्कतया च दोलायमानदृष्टित्वेऽपि युद्धे त्वरातिशय इति व्यतिरेको वाच्यालङ्कारः । तत्र तु येयं ध्वन्यमानोपमा प्रियाकुचकुड्मलाभ्यां सकलजनत्रासकरेष्वपि शात्रवेषु मर्दनोद्यतेषु गजकुम्भस्थलेषु तद्वशेन रतिमाददानानामिव बहुमान इति सैव वीरतातिशयचमत्कारं विधत्त इत्युपमायाः प्राधान्यम् । असुरपराक्रमणे इति । है । अनुरणन रूप अर्थशक्ति से व्यङ्ग्य जो 'रूपक' है उसके आश्रय से यहां काव्य का चारुत्व व्यवस्थित होता है। इसलिए उसी से व्यपदेश है। योजना के समान होने के कारण (अर्थात् ऊपर के ही ढंग से बात होने के कारण) उपमाध्वनि के दोनों उदा- हरणों का लक्षण अपने शब्द द्वारा प्रस्तुत नहीं किया है । सजी-धजी (प्रसाधित) प्रियतमा के आश्वासन में लगे होने के कारण और तुरत होने वाले युद्ध के लिए त्वरितमनस्क होने के कारण दृष्टि के दोलायमान होने पर भी युद्ध में (वीरों की) अतिशय त्वरा होती है, यह 'व्यतिरेक' वाच्य अलङ्कार है । जो यह प्रिया के कुचकुङ्मलों से उपमा ध्वनित हो रही है, समस्त जनों को भीत करने वाले भी, मर्दनोद्यत शत्रुओं के हाथियों के कुम्भस्थलों में उस (उपमा) के कारण रति धारण करते हुए (वीरों) का बहुमान है, इस कारण वही (ध्वन्यमान उपमा) वीरतातिशय का चमत्कार उत्पन्न करती है अतः उपमा का प्राधान्य है । असुरों पर पराक्रम के अवसर में—। वहां इस (कामदेव) की त्रैलोक्यविजय वर्णन करते हैं।