भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

द्वितीय उद्योतः २८७ ध्वन्यालोकः तं ताण सिरिसहोअररअणाहरणम्मि हिअअमेकरसम् । बिम्बाहरे पिआणं णिविसिअं कुसुमवाणेण ॥ ( तत्तेषां श्रीसहोदररत्नाहरणे हृदयमेकरसम् । बिम्बाधरे प्रियाणां निवेशितं कुसुमबाणेन ॥ इति छाया ) आक्षेपध्वनिर्यथा— स वक्तुमखिलान् शक्तो हयग्रीवाश्रितान् गुणान् । योऽम्बुकुम्भैः परिच्छेदं ज्ञातुं शक्तो महोदधेः ॥ उन (असुरों) के लक्ष्मी के साथ पैदा होनेवाले रत्नों के लूटने में एकरस हृदय को कामदेव ने प्रियाओं के बिम्बाधर में संलग्न कर दिया । आक्षेपध्वनि, जैसे— 'हयग्रीव भगवान् के समस्त गुणों को वह कह सकता है जो जल के घड़ों से महासमुद्र के परिमाण को जान सकता है ।' लोचनम् त्रैलोक्यविजयो हि तत्रास्य वर्ण्यते । तेषामसुराणां पातालवासिनां यैः पुनः पुनरिन्द्रपुरावमर्दनादि किं किं न कृतं तद्धृदयमिति यत्तेभ्यस्तेभ्योऽतिदुष्करे- भ्योऽप्यकम्पनीयव्यवसायं तच्च । श्रीसहोदराणामत एवानिर्वाच्योत्कर्षाणामि- त्यर्थः । तेषां रत्नानामा समन्ताद्धरणे एकरसं तत्परं यद्धृदयं तत्कुसुमबाणेन सुकुमारतरोपकरणसम्भारेण प्रियाणां बिम्बाधरे निवेशितम्, तदवलोकनपरि- चुम्बनदर्शनमात्रकृतकृत्यताभिमानयोगि तेन कामदेवेन कृतम् । तेषां हृदयं यदत्यन्तं विजिगीषाज्वलनजाज्वल्यमानमभूदिति यावत् । अत्रातिशयोक्तिर्वा- च्यालङ्कारः । प्रतीयमाना चोपमा । सकलरत्नसारतुल्यो बिम्बाधर इति हि तेषां बहुमानो वास्तव एव । अत एव न रूपकध्वनिः । रूपकस्यारोप्यमाणत्वे- जिन्होंने बार बार इन्द्रपुरी (अमरावती) के अवमर्दन आदि क्या क्या नहीं किया उन पातालवासी असुरों का हृदय और जो उन उन अतिदुष्कर कार्यों से अविचलनीय व्यवसाय वालां है, वह । लक्ष्मी के साथ पैदा होने वाले, अर्थात् जिनके उत्कर्ष का वर्णन नहीं किया जा सकता । उन रत्नों के समग्रतया हरण में एकरस अर्थात् तत्पर जो हृदय वह सुकुमारतर उपकरण-सम्भार वाले (अर्थात् फूलों के बाण वाले) कामदेव ने प्रियाओं के बिम्बाधर में संलग्न कर दिया, अर्थात् उस कामदेव ने (उनके हृदय को) उसके अवलोकन, परिचुम्बन, दर्शनमात्र में अपने को कृतकृत्य मान लेने वाला बना दिया है । उनका हृदय, जो अत्यन्त विजयेच्छा की अग्नि से प्रज्वलित हो रहा था । यहां अतिशयोक्ति वाच्य अलङ्कार है और उपमा प्रतीयमान है । क्यों कि उनका यह बहुमान कि बिम्बाधर सारे रत्नों के सारतुल्य है, वास्तव है । अतएव रूपक ध्वनि