ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्रातिशयोक्त्या हयग्रीवगुणानामवर्णनीयताप्रतिपादनरूपस्यासा- धारणतद्विशेषप्रकाशनपरस्याक्षेपस्य प्रकाशनम् । अर्थान्तरन्यासध्वनिः शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्योऽर्थशक्तिमू- लानुरणनरूपव्यङ्ग्यश्च सम्भवति । तत्राद्यस्योदाहरणम्— देव्वाएत्तम्मि फले किं कीरइ एत्तिअं पुणा भणिमो । कङ्किल्लपल्लवाः पल्लवाणँ अण्णाण ण सरिच्छा ॥ यहां अतिशयोक्ति से हयग्रीव के गुणों की अवर्णनीयता-प्रतिपादनरूप, और उन (गुणों) की विशेषता प्रकाशनपरक 'आक्षेप' का प्रकाशन है । 'अर्थान्तरन्यासध्वनि' शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यङ्ग्य और अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यङ्ग्य (इन दो प्रकारों से) सम्भव है । इनमें प्रथम का उदाहरण— 'फल विधाता के अधीन है, क्या किया जाय ? (फिर भी) इतना कहते हैं कि रक्ताशोक के पल्लव अन्य पल्लवों के सदृश नहीं होते ।' लोचनम् नावास्तवत्वात् । तेषामसुराणां वस्तुवृत्त्यैव सादृश्यं स्फुरति । तदेव च सादृश्यं चमत्कारहेतुः प्राधान्येन । अतिशयोक्त्येति । वाच्यालङ्काररूपयेत्यर्थः । अवर्ण- नीयताप्रतिपादनमेवाक्षेपस्य रूपमिष्टप्रतिषेधात्मकत्वात् । तस्य प्राधान्यं विशे- षणद्वारेणाह—असाधारणेति । सम्भवतीत्यनेन प्रसङ्गाच्छब्दशक्तिमूलस्यात्र विचार इति दर्शयति । दैवायत्ते फले किं क्रियतामेतावत्पुनर्भणामः । रक्ताशोकपल्लवाः पल्लवानामन्येषां न सदृशाः ॥ अशोकस्य फलमाम्रादिवन्नास्ति, किं क्रियतां पल्लवास्त्वतीव हृद्या इतीयता- भिधा समाप्तैव । अत्र फलशब्दस्य शक्तिवशात्समर्थकमस्य वस्तुनः पूर्वमेव प्रतीयते । लोकोत्तरजिगीषातदुपायप्रवृत्तस्यापि हि फलं सम्पल्लक्षणं दैवायत्तं नहीं है। क्यों कि रूपक आरोप्यमाण होने के कारण वास्तव नहीं होता। उन असुरों के वस्तुतः ही सादृश्य स्फुरित होता है। और वही सादृश्य प्रधान रूप से चमत्कार का हेतु है। अतिशयोक्ति से—। अर्थात् वाच्यालङ्कार रूप अतिशयोक्ति से। अवर्णनीयता का प्रतिपादन ही आक्षेप का लक्षण है, क्यों कि (वह) इष्ट का प्रतिषेध रूप होता है। विशेषण द्वारा उसका प्राधान्य कहते हैं—उन (गुणों) की विशेषता—। 'सम्भव है' इससे प्रसङ्ग से शब्दशक्तिमूल का यहां विचार है, यह दिखाते हैं। अशोक का फल आम आदि की भांति नहीं है, क्या किया जाय ! परन्तु पल्लव अतीव हृद्य हैं, यहां तक अभिधा समाप्त ही है। यहां 'फल' शब्द के शक्तिवश इस वस्तु का समर्थक पहले ही प्रतीत होता है। लोकोत्तर विजयेच्छा और उसके उपाय में प्रवृत्त का