भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 680 में से

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पृष्ठ 349

द्वितीय उद्योतः २८९ ध्वन्यालोकः पदप्रकाशश्चायं ध्वनिरिति वाक्यस्यार्थान्तरतात्पर्येऽपि सति न विरोधः । द्वितीयस्योदाहरणं यथा— हिअअट्ठाविअमण्णुं अवरुण्णमुहं हि मं पसाअन्त । अवरद्धस्स वि ण हु दे पहुजाणअ रोसिउं सक्कम् ॥ ( हृदयस्थापितमन्युमपरोषमुखीमपि मां प्रसादयन् । अपराध्रस्यापि न खलु ते बहुज्ञ रोषितुं शक्यम् ॥ इति छाया) यह ध्वनि पदप्रकाश है, इसलिए वाक्य के अर्थान्तर में तात्पर्य होने पर भी विरोध नहीं है । दूसरे का उदाहरण, जैसे— हृदय में क्रोध स्थापित करके मुख पर क्रोध प्रकट न करनेवाली भी मुझे तुम प्रसन्न कर रहे हो, इसलिए हे बहुत समझदार, तुम्हारे अपराधी होने पर भी तुम पर क्रोध नहीं किया जा सकता । लोचनम् कदाचिन्न भवेदपीत्येवंरूपं सामान्यात्मकम् । नन्वस्य सर्ववाक्यस्याप्रस्तुत- प्रशंसा प्राधान्येन व्यङ्ग्या तत्कथमर्थान्तरन्यासस्य व्यङ्ग्यता, द्वयोर्युगपदेकत्र प्राधान्यायोगादित्याशङ्कयाह—पदप्रकाशेति । सर्वो हि ध्वनिप्रपञ्चः पदप्रकाशो वाक्यप्रकाशश्चेति वक्ष्यते । तत्र फलपदेऽर्थान्तरन्यासध्वनिः प्राधान्येन । वाक्ये त्वप्रस्तुतप्रशंसा । तत्रापि पुनः फलपदोपात्तसमर्थ्यसमर्थकभावप्राधान्यमेव भातीत्यर्थान्तरन्यासध्वनिरेवायमिति भावः । हृदये स्थापितो न तु बहिः प्रकटितो मन्युर्यया । अत एवाप्रदर्शितरोष- मुखीमपि मां प्रसादयन् हे बहुज्ञ, अपराद्धस्यापि तव न खलु रोषकरणं शक्यम् । अत्र बहुज्ञेत्यामन्त्रणार्थो विशेषे पर्यवसितः । अनन्तरं तु तदर्थपर्या- भी सम्पत् रूप फल कदाचित् न भी हो, इस प्रकार का सामान्य रूप ( समर्थक ) है । इस समग्र वाक्य का प्रधान रूप से व्यङ्ग्य अप्रस्तुत प्रशंसा है, तो अर्थान्तरन्यास का व्यङ्ग्यत्व कैसे ? क्यों कि दोनों का एक ही समय प्राधान्य नहीं होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—पदप्रकाश—। यह कहेंगे कि सारा ध्वनिप्रपञ्च पदप्रकाश और वाक्य- प्रकाश होता है । वहां 'फल' पद में अर्थान्तरन्यासध्वनि प्रधानरूप से है । वाक्य में अप्रस्तुत-प्रशंसा है । भाव यह कि वहां भी फिर 'फल' पद से उपात्त समर्थ्यसमर्थकभाव का प्राधान्य ही प्रतीत होता है, अतः यह अर्थान्तरन्यासध्वनि है । हृदय में स्थापित किया है न कि बाहर प्रकट किया है मन्यु ( क्रोध ) को जिसने । अतएव रोष को प्रदर्शित न करने वाली भी मुझे प्रसादन करता हुआ, हे बहुत समझ- दार, अपराधी होने पर भी तुम पर रोष करना शक्य नहीं । यहां 'बहुत समझदार' यह आमन्त्रणार्थ विशेष में पर्यवसित है । बाद में उसके अर्थ के पर्यालोचन से जो १६ ध्व०