ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र हि वाच्यविशेषेण सापराधस्यापि बहुज्ञस्य कोपः कर्तुमशक्य इति समर्थकं सामान्यमन्वितमन्यत्तात्पर्येण प्रकाशते । व्यतिरेकध्वनिरप्युभयरूपः सम्भवति । तत्राद्यस्योदाहरणं प्राक्प्र- दर्शितमेव । द्वितीयस्योदाहरणं यथा— जाएज्ज वणुद्देसे खुज्ज विअ पाअव्रो गडिअवत्तो । मा माणुसम्मि लोए ताएकरसो दरिद्दो अ ॥ ( जायेय वनोद्देशे कुब्ज एव पादपो गलितपत्रः । मा मानुषे लोके त्यागैकरसो दरिद्रश्च ॥ इति छाया ) यहां वाच्य विशेष से 'अपराधी होने पर भी बहुत समझदार पर क्रोध नहीं किया जा सकता' यह समर्थक सामान्य तात्पर्य से अन्वित अन्य ( विशेष ) को प्रकाशित करता है । व्यतिरेक ध्वनि भी दो प्रकार का सम्भव है । उनमें प्रथम का उदाहरण पहले दिखाया ही है । दूसरे का उदाहरण, जैसे— जंगल के प्रदेश में ही गलितपत्र कुबड़ा वृक्ष ( बनकर ) पैदा हो, पर मनुष्य लोक में त्याग में परायण और दरिद्र मत हो । लोचनम् लोचनाद्यत्सामान्यरूपं समर्थकं प्रतीयते तदेव चमत्कारकारि । सा हि खण्डिता सती वैदग्ध्यानुनीता तं प्रत्यसूयां दर्शयन्तीत्थमाह । यः कश्चिद्द्बहुज्ञो धूर्तः स एवं सापराधोऽपि स्वापराधावकाशमाच्छादयतीति मा त्वमात्मनि बहुमानं मिथ्या ग्रहीरिति । अन्वितमिति । विशेषे सामान्यस्य संबद्धत्वादिति भावः । व्यतिरेकध्वनिरपीति । अपिशब्देनार्थान्तरन्यासवदेव द्विप्राकारत्वमाह । प्रागिति । 'खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति' इति । 'रक्तस्त्वं नवपल्लवैः' इति । जायेय,वनोद्देश सामान्य रूप समर्थक प्रतीत होता है वही चमत्कारकारी है । वह खण्डिता ( नायक द्वारा ) विदग्धा से अनुनय किये जाने पर उसके प्रति असूया दिखाती हुई इस प्रकार कहती है । जो कोई बहुत समझदार धूर्त है वह इस प्रकार अपराधी होकर भी अपने अपराध का स्थान ढंकता है, इस लिए तुम अपने में मिथ्या बहुमान न रखो । अन्वित—। भाव यह कि विशेष में सामान्य सम्बद्ध होता है । व्यतिरेकध्वनि भी—। 'भी' शब्द से अर्थान्तरन्यास की भांति ही दो प्रकार होना कहा है । पहले—। 'खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति०' और 'रक्तस्त्वं नवपल्लवैः०' पैदा हो, जंगल