ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २९१ ध्वन्यालोकः अत्र हि त्यागैकरसस्य दरिद्रस्य जन्मानभिनन्दनं त्रुटितपत्रकुब्ज- पादपजन्माभिनन्दनं च साक्षाच्छब्दवाच्यम् । तथाविधादपि पादपा- त्तादृशस्य पुंस उपमानोपमेयत्वप्रतीतिपूर्वकं शोच्यतायासाधिक्यं तात्प- र्येण प्रकाशयति । उत्प्रेक्षाध्वनिर्यथा— चन्दनासक्तभुजगनिःश्वासानिलमूच्छितः । मूर्च्छयत्येष पथिकान्मधौ मलयमारुतः ॥ अत्र हि मधौ मलयमारुतस्य पथिकमूर्च्छाकारित्वं मन्मथोन्माथ- यहां त्यागपरायण दरिद्र (पुरुष) के जन्म का न अभिनन्दन और त्रुटितपत्र एवं कुबड़े वृक्ष के जन्म का अभिनन्दन साक्षात् शब्द का वाच्य है । उस प्रकार के भी वृक्ष से उस प्रकार के पुरुष की उपमानोपमेय सम्बन्ध की प्रतीतिपूर्वक तात्पर्यतः शोचनीयता का आधिक्य प्रकाशित करता है । उत्प्रेक्षाध्वनि, जैसे— वसन्तकाल में चन्दन में लिपटे साँपों की सांस की हवा से बढ़ा हुआ यह मलयमारुत पथिक जनों को मूर्च्छित करता है । यहां वसन्तकाल में मलयमारुत का पथिकमूर्च्छाकारी होना काम के उन्माथ लोचनम् एव वनस्यैकान्ते गहने यत्र स्फुटतरबहुवृक्षसम्पत्त्या प्रेक्ष्यतेऽपि न कश्चित् । कुब्ज इति रूपघटनादावनुपयोगी । गलितपत्र इति । छायामपि न करोति तस्य का पुष्पफलवत्तेत्यभिप्रायः । तादृशोऽपि कदाचिदाङ्गारिकस्योपयोगी भवेदुल्लूका- दीनां वा निवासायेति भावः । मानुष इति । सुलभार्थिजन इति भावः । लोक इति । यत्र लोक्यते सोऽर्थिभिस्तेन चार्थिजनो न च किचिच्छक्यते कर्तुं तन्महद्वैशसमिति भावः । अत्र वाच्यालङ्कारो न कश्चित् । उपमानेत्यनेन व्यतिरेकस्य मार्गपरिशुद्धिं करोति । आधिक्यमिति । व्यतिरेकमित्यर्थः । के प्रदेश में ही, वन के एकान्त गहन में जहां स्पष्ट रूप से बहुत वृक्षों के कारण कोई दिखाई नहीं देता । कुबड़ा अर्थात् रूपघटना आदि के सम्बन्ध में अनुपयोगी । गलितपत्र—। अभिप्राय यह कि छाया भी नहीं करता है उसके पुष्पित-फलित होने की बात ही कौन ? भाव यह कि उस प्रकार का भी (वृक्ष) कदाचित् आङ्गारिक के उपयोग में आ जाय अथवा उल्लू पक्षियों के निवास के लिए हो । मनुष्य—। भाव यह कि जहां अर्थिजन सुलभ हैं । लोक—। भाव यह कि जहां अर्थिजनों से वह और उससे अर्थिजन देखे जाते हैं, (वहां यदि) नहीं कुछ कर सकते हैं तब वह बड़ा अपराध है । यहां कोई वाच्य अलङ्कार नहीं है । 'उपमान' इसके द्वारा व्यतिरेक के मार्ग का परिशोधन करते हैं । आधिक्य—। अर्थात् व्यतिरेक । उत्प्रेक्षा की है—। क्यों कि विषवात से