ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दायित्वेनैव । तत्तु चन्दनासक्तभुजगनिःश्वासानिलमूर्च्छितत्वेनोत्प्रेक्षि- तमित्युत्प्रेक्षा साक्षादनुक्तापि वाक्यार्थसामर्थ्यादनुरणनरूपा लक्ष्यते । न चैवंविधे विषये इवादिशब्दप्रयोगमन्तरेणासंबद्धतैवेति शक्यते वक्तुम् । गमकत्वादन्यत्रापि तदप्रयोगे तदर्थावगतिदर्शनात् । यथा— देने वाला होने के कारण ही है, परन्तु उसे चन्दन में लिपटे हुए सर्पों की सांस की हवा से बढ़े होने (मूर्च्छित होने) के कारण उत्प्रेक्षा की है, इस प्रकार साक्षात् अनुक्त भी उत्प्रेक्षा वाच्यार्थ की सामर्थ्य से अनुरणन रूप में लक्षित होती है । इस प्रकार के विषय में 'इव' आदि शब्दों के प्रयोग के बिना असम्बद्धता ही है, यह नहीं कह सकते, क्योंकि गमक हैं, अन्यत्र भी उनका प्रयोग न होने पर उनके अर्थ का ज्ञान देखा जाता है । जैसे— लोचनम् उत्प्रेक्षितमिति । विषवातेन हि मूर्च्छितो बृंहित उपचितो मोहं करोति । एकश्च मूर्च्छितः पथिकमध्येऽन्येषामपि धैर्यच्युतिं विदधन्मूर्च्छां करोतीत्युभयथो- त्प्रेक्षा । नन्वत्र विशेषणमधिकीभवद्धेतुतयैव सङ्गच्छते । ततः किं ? न हि हेतुता परमार्थतः । तथापि तु हेतुता उत्प्रेक्ष्यत इति यत्किञ्चिदेतत् । तदिति । तस्ये- वादेरप्रयोगेऽपि तस्यार्थस्येत्युत्प्रेक्षारूपस्यावगतेः प्रतीतेर्दर्शनात् । एतदेवोदाह- रति–यथेति । ईर्ष्याकलुषस्यापीषदरुणच्छायाकस्य । यदि तु प्रसन्नस्य मुखस्य सादृश्यमुद्वहेत्सर्वदा वा तत्किं कुर्यात्तन्मुखं त्वेतद्भवतीति मनोरथानामप्यपथ- मिदमित्यपिशब्दस्याभिप्रायः । अङ्गे स्वदेहे न मात्येव दश दिशः पूरयति यतः । अद्यैता कालेनैकं दिवसमात्रमित्यर्थः । अत्र पूर्णचन्द्रेण दिशां पूरणं स्वरस- सिद्धमेवमुत्प्रेक्ष्यते । मूर्च्छित बृंहित या उपचित होकर मोह उत्पन्न करता है । और एक मूर्च्छित होकर पथिकों के बीच अन्य लोगों का भी धैर्य च्युत करता हुआ मूर्च्छा करता है, इस प्रकार दोनों प्रकार से उत्प्रेक्षा है । शंका करते हैं कि यहां विशेष अधिक होने के कारण हेतु रूप से संगत होता है । (समाधान देते हैं) कि तो क्या ? परमार्थतः हेतुत्व नहीं है । तब भी हेतुत्व उत्प्रेक्षित होता है, अतः यह कुछ ही है । उनका— । क्योंकि उन 'इव' आदि के प्रयोग न होने पर भी उत्प्रेक्षारूप उस अर्थ की अवगति या प्रतीति देखी जाती है । इसका ही उदाहरण देते हैं—जैसे— । ईर्ष्या से कलुष अर्थात् ईषदरुण छाया वाला भी । परन्तु यदि प्रसन्न मुख का सादृश्य धारण करता तो सब समय क्या कर डालता । तेरा मुख यह होता है (अर्थात् चन्द्र होता है) यह बात मनोरथों का भी विषय नहीं हो सकती, यह 'भी' (अपि) शब्द का अभिप्राय है । अङ्ग में अर्थात् अपनी देह में नहीं समाता है जिस कारण दस दिशाओं को पूरित करता है । आज