भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

द्वितीय उद्योतः २९३ ध्वन्यालोकः ईसाऽकलुसस्स वि तुह मुहस्स णं एस पुण्णिमाचन्दो । अज्ज सरिसत्तणं पाविऊण अङ्गे विअ ण माइ ॥ ( ईर्ष्याकलुषस्यापि तव मुखस्य नन्वेष पूर्णिमाचन्द्रः । अद्य सदृशत्वं प्राप्याङ्ग एव न माति ॥ इति छाया ) यथा वा— त्रासाकुलः परिपतन् परितो निकेतान् पुंभिर्न कैश्चिदपि धन्विभिरन्वबन्धि । तस्थौ तथापि न मृगः क्वचिदङ्गनाभि राकर्णपूर्णनयनेषुहतेक्षणश्रीः ॥ यह पूर्णिमाचन्द्र ईर्ष्या से कलुष भी तुम्हारे मुख का आज सादृश्य पाकर मानों अपने अङ्ग में ही नहीं समाता है । अथवा जैसे— भय से व्याकुल, चारों ओर घरों में दौड़ते हुए हिरन को किन्हीं धनुर्धारी पुरुषों ने नहीं पीछा किया, तथापि वह मानों कहीं अङ्गनाओं द्वारा कान तक खींचे हुए नेत्र के बाण से आंखों की शोभा के नष्ट हो जाने के कारण कहीं नहीं ठहरा । लोचनम् ननु ननुशब्देन वितर्कोत्प्रेक्षारूपमाचक्षाणेनासम्बद्धता निराकृतेति सम्भा- वयमान उदाहरणान्तरमाह-यथा वेति । परितः सर्वतो निकेतान् परिपतन्नाक्र- मन्न कैश्चिदपि चापपाणिभिरसौ मृगोऽनुबद्धस्तथापि न क्वचित्तस्थौ त्रासचाप- लयोगात्स्वाभाविकादेव । तत्र चोत्प्रेक्षा ध्वन्यते-अङ्गनाभिराकर्णपूर्णनेत्रशरैर्हता ईक्षणश्रीः सर्वस्वभूता यस्य यतोऽतो न तस्थौ । नन्वेतदप्यसम्बद्धमस्त्वित्या- अर्थात् इतने समय से एक दिन मात्र । यहां स्वभावतः सिद्ध पूर्णचन्द्र द्वारा दिशाओं का पूरण इस प्रकार उत्प्रेक्षित होता है । 'मानों' ( ननु ) इस शब्द से वितर्क रूप उत्प्रेक्षा का अभिधान करते हुए 'अस- म्बद्धता निराकरण की गई है' यह सम्भावना करते हुए दूसरा उदाहरण कहते हैं— अथवा जैसे—। चारों ओर घरों में दौड़ता अर्थात् चौकड़ी भरता हुआ यह मृग किसी धनुर्धारी से पीछा नहीं किया गया तथापि कहीं नहीं ठहरा भय के कारण स्वाभाविक चापलयोग से ही । वहां उत्प्रेक्षा ध्वनित हो रही है कि अङ्गनाओं के कान तक खींचे हुए नेत्रबाणों से सर्वस्वभूत जिसकी नेत्रशोभा हत हो गई है । जिस कारण उस कारण