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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

द्वितीय उद्योतः २९३ ध्वन्यालोकः ईसाऽकलुसस्स वि तुह मुहस्स णं एस पुण्णिमाचन्दो । अज्ज सरिसत्तणं पाविऊण अङ्गे विअ ण माइ ॥ ( ईर्ष्याकलुषस्यापि तव मुखस्य नन्वेष पूर्णिमाचन्द्रः । अद्य सदृशत्वं प्राप्याङ्ग एव न माति ॥ इति छाया ) यथा वा— त्रासाकुलः परिपतन् परितो निकेतान् पुंभिर्न कैश्चिदपि धन्विभिरन्वबन्धि । तस्थौ तथापि न मृगः क्वचिदङ्गनाभि राकर्णपूर्णनयनेषुहतेक्षणश्रीः ॥ यह पूर्णिमाचन्द्र ईर्ष्या से कलुष भी तुम्हारे मुख का आज सादृश्य पाकर मानों अपने अङ्ग में ही नहीं समाता है । अथवा जैसे— भय से व्याकुल, चारों ओर घरों में दौड़ते हुए हिरन को किन्हीं धनुर्धारी पुरुषों ने नहीं पीछा किया, तथापि वह मानों कहीं अङ्गनाओं द्वारा कान तक खींचे हुए नेत्र के बाण से आंखों की शोभा के नष्ट हो जाने के कारण कहीं नहीं ठहरा । लोचनम् ननु ननुशब्देन वितर्कोत्प्रेक्षारूपमाचक्षाणेनासम्बद्धता निराकृतेति सम्भा- वयमान उदाहरणान्तरमाह-यथा वेति । परितः सर्वतो निकेतान् परिपतन्नाक्र- मन्न कैश्चिदपि चापपाणिभिरसौ मृगोऽनुबद्धस्तथापि न क्वचित्तस्थौ त्रासचाप- लयोगात्स्वाभाविकादेव । तत्र चोत्प्रेक्षा ध्वन्यते-अङ्गनाभिराकर्णपूर्णनेत्रशरैर्हता ईक्षणश्रीः सर्वस्वभूता यस्य यतोऽतो न तस्थौ । नन्वेतदप्यसम्बद्धमस्त्वित्या- अर्थात् इतने समय से एक दिन मात्र । यहां स्वभावतः सिद्ध पूर्णचन्द्र द्वारा दिशाओं का पूरण इस प्रकार उत्प्रेक्षित होता है । 'मानों' ( ननु ) इस शब्द से वितर्क रूप उत्प्रेक्षा का अभिधान करते हुए 'अस- म्बद्धता निराकरण की गई है' यह सम्भावना करते हुए दूसरा उदाहरण कहते हैं— अथवा जैसे—। चारों ओर घरों में दौड़ता अर्थात् चौकड़ी भरता हुआ यह मृग किसी धनुर्धारी से पीछा नहीं किया गया तथापि कहीं नहीं ठहरा भय के कारण स्वाभाविक चापलयोग से ही । वहां उत्प्रेक्षा ध्वनित हो रही है कि अङ्गनाओं के कान तक खींचे हुए नेत्रबाणों से सर्वस्वभूत जिसकी नेत्रशोभा हत हो गई है । जिस कारण उस कारण

२९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शब्दार्थव्यवहारे च प्रसिद्धिरैव प्रमाणम् । श्लेषध्वनिर्यथा— रम्या इति प्राप्तवतीः पताकाः रागं विविक्ता इति वर्धयन्तीः । यस्यामसेवन्त नमद्वलीकाः समं वधूभिर्वलभीर्युवानः ॥ शब्द और अर्थ के व्यवहार में प्रसिद्धि ही प्रमाण है । श्लेषध्वनि, जैसे— जिस (द्वारका नगरी) में युवक लोग सुन्दर होने के कारण प्रसिद्धि को प्राप्त, एकान्त या पवित्र होने के कारण राग को बढ़ाने वाली एवं झुकी जाती हुई त्रिवलि वाली वधुओं के साथ, रम्य होने के कारण पताकाओं से युक्त, एकान्त होने से राग (सम्भोग की अभिलाष) बढ़ाने वाली, झुके हुए छज्जों वाली वलभियों (निजी वासगृहों) का सेवन करते थे । लोचनम् शङ्कयाह—शब्दार्थेति । पताका ध्वजपटान् प्राप्तवती । रम्या इति हेतोः । पताकाः प्रसिद्धीः प्राप्तवतीः । किमाकाराः प्रसिद्धीः रम्या इत्येवमाकाराः । विविक्ता जनसङ्कुलत्वाभावादित्यतो हेतो रागं सम्भोगाभिलाषं वर्धयन्तीः । अन्ये तु रागं चित्रशोभामिति । तथा रागममुरागं वर्धयन्तीः । यतो हेतोः विविक्ता विभक्ताङ्ग्यो लटभाः याः । नमन्ति वलीकानि छदिपर्यन्तभागा यासु । नमन्त्यो वल्लयस्त्रिवलीललक्षणा यासाम् । सममिति सहेत्यर्थः । ननु सम- शब्दात्तुल्यार्थोऽपि प्रतीतः । सत्यम् ; सोऽपि श्लेषबलात् । श्लेषश्च नाभिधा- वृत्तेराक्षिप्तः, अपि त्वर्थसौन्दर्यबलादेवेति सर्वथा ध्वन्यमान एव श्लेषः । अत नहीं ठहरा । यह भी असम्बद्ध है यह आशङ्का करके कहते हैं—शब्द और अर्थ—। पताका अर्थात् ध्वजपटों को प्राप्त करती हुई । रम्य होने के कारण । पताका अर्थात् प्रसिद्धियां प्राप्त करती हुई । किस आकार की प्रसिद्धियां ? रम्य आकार की । विविक्त अर्थात् लोगों को भीड़-भाड़ न होने के कारण राग अर्थात् सम्भोग की अभिलाषा बढ़ाती हुई । दूसरे (कहते हैं) राग अर्थात् चित्रशोभा । उस प्रकार राग अर्थात् अनुराग बढ़ाती हुई । जिस कारण से विविक्त अर्थात् विभक्त अङ्गों वाली लटभाएं (सुन्दरियां) । झुक रहे हैं वलीक अर्थात् छज्जे जिनमें । झुक रही हैं वलियां अर्थात् त्रिवलियां जिनकी । समं (साथ) अर्थात् साथ । शंका करते हैं कि 'समं' शब्द 'तुल्य' अर्थ में भी मालूम है ? (समाधान करते हैं कि) ठीक है, वह भी श्लेष के बल से (अर्थात् यहां 'समं' का तुल्य अर्थ भी श्लेष के बल से है प्रतीत होगा) । और श्लेष (यहां) अभिधावृत्ति से आक्षिप्त नहीं, अपितु अर्थसौन्दर्य के बल से ही (आक्षिप्त है), इस लिए सर्वथा श्लेष

द्वितीय उद्योतः २९५ ध्वन्यालोकः अत्र वधूभिः सह वलभौरिसेवन्तेति वाक्यार्थप्रतीतेरनन्तरं वध्व इव वलभ्य इति श्लेषप्रतीतिरशब्दाप्यर्थसामर्थ्यान्मुख्यत्वेन वर्तते । यथासङ्ख्यध्वनिर्यथा— अङ्कुरितः पल्लवितः कोरकितः पुष्पितश्च सहकारः । यहां 'वधुओं के साथ वलभियों की सेवा की' इस वाक्यार्थ की प्रतीति के अनन्तर 'वधुओं के समान वलभी' इस श्लेष की प्रतीति शब्दजनित न होकर भी अर्थसामर्थ्य से मुख्य रूप में होती है । यथासंख्यध्वनि, जैसे-- आम्रवृक्ष अङ्कुरित, पल्लवित, कोरकित और पुष्पित हुआ और हृदय में मदन लोचनम् एव वध्व इव वलभ्य इत्यभिदधतापि वृत्तिकृतोपमाध्वनिरिति नोक्तम् । श्लेष- स्यैवात्र मूलत्वात् । समा इति हि यदि स्पष्टं भवेत्तदोपमाया एव स्पष्टत्वाच्छ्ले- षस्तदाक्षिप्तः स्यात् । सममिति निपातोऽञ्जसा सहार्थवृत्तिर्व्यञ्जकत्वबलेनैव क्रियाविशेषणत्वेन शब्दश्लेषतामेति । न च तेन विनाभिधाया अपरिपुष्टा काचित् । अत एव समाप्तयामेवाभिधायां सहृदयैरेव स द्वितीयोऽर्थोऽपृथक्प्र- यत्नेनैवावगम्यः । यथोक्तं प्राक्—'शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव' इत्यादि । एतच्च सर्वोदाहरणेष्वनुसर्तव्यम् । 'पीनश्चैत्रो दिवा नात्ति' इत्यत्राभिधैवापर्यवसितेति सैव स्वार्थनिर्वाहायार्थान्तरं शब्दान्तरं वाकर्षतीत्यनुमानस्य श्रुतार्थापत्तेर्वा तार्किकमीमांसकयोर्न ध्वनिप्रसङ्ग इत्यलं बहुना । तदाह-अशब्दापीति । ध्वन्यमान ही है । इसी लिए 'वधुओं के समान वल भी' यह कहते हुए भी वृत्तिकार ने 'उपमाध्वनि' यह नहीं कहा, क्यों कि यहां श्लेष ही मूल है । यदि ('समं' के स्थान पर ) 'समाः' यह स्पष्ट हो जाय तब उपमा के स्पष्ट हो जाने से श्लेष उसके द्वारा आक्षिप्त होता । 'समं' यह निपात झटिति 'साथ' अर्थ का बोध करके व्यञ्जकत्व के बल से ही क्रियाविशेषण होने के कारण शब्दश्लेषत्व को प्राप्त कर लेना है । उसके बिना अभिधा का कोई अपरिपोष नहीं होता । अतएव अभिधा के समाप्त होने पर ही सहृदयों के ही वह दूसरा अर्थ बिना पृथक् प्रयत्न के अवगत होता है । जैसा कि पहले कहा है— 'शब्द और अर्थ के शासन के ज्ञानमात्र से ही०' इत्यादि । यह सब उदाहरणों में समझ लेना चाहिए । 'मोटा चैत्र ( नाम का व्यक्ति ) दिन में भोजन नहीं करता है' यहां अभिधा ही पर्यवसित न होकर अपने अर्थ के निर्वाह के लिए ( रात्रिभोजनरूप ) दूसरे अर्थ या ( 'रात्रि में भोजन करता है' ) इस रूप शब्द को आकृष्ट करती है, इस प्रकार अनुमान के अथवा श्रुतार्थापत्ति के होने से तार्किक या मीमांसक के मत में ध्वनि का प्रसङ्ग नहीं है, इत्यलं बहुना । तो कहते हैं—शब्दजनित न होकर भी—। इस प्रकार

२९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अङ्कुरितः पल्लवितः कोरकितः पुष्पितश्च हृदि मदनः ॥ अत्र हि यथोद्देशमनूद्देशे यच्चारुत्वमनुरणनरूपं मदनविशेषण- भूताङ्कुरितादिशब्दगतं तन्मदनसहकारयोस्तुल्ययोगितासमुच्चयलक्षणा- द्वाच्यादतिरिच्यमानमालक्ष्यते । एवमन्येऽप्यलङ्कारा यथायोगं योजनीयाः । अङ्कुरित, पल्लवित, कोरकित और पुष्पित हुआ । यहां पहले क्रम के अनुसार दूसरे क्रम में जो अनुरणनरूप चारुत्व मदन के विशेषभूत अङ्कुरित आदि शब्द में प्रतीत होता है वह मदन और आम्रवृक्ष के तुल्य- योगिता या समुच्चयरूप वाच्य से अधिक (चारुत्वपूर्ण) दिखाई देता है । इस प्रकार अन्य अलङ्कार भी, जहां जैसा उचित हो, योजन कर लेने चाहिए ॥ २७ ॥ लोचनम् एवमन्येऽपीति । सर्वेषामेवार्थालङ्काराणां ध्वन्यमानता दृश्यते । यथा च दीपकध्वनिः— मा भवन्तमनलः पवनो वा वारणो मदकलः परशुर्वा । वज्रमिन्द्रकरविप्रसृतं वा स्वस्ति तेऽस्तु लतया सह वृक्ष ॥ इत्यत्र बाधिष्टेति गोप्यमानादेव दीपकादत्यन्तस्नेहास्पदत्वप्रतिपत्त्या चारु- त्वनिष्पत्तिः । अप्रस्तुतप्रशंसाध्वनिरपि— दुण्डुल्लन्तो मरिहिसि कण्टकलिआईं केअइवणाईं । मालइकुसुमसरिच्छं भमर भमन्तो ण पाविहिसि ॥ प्रियतमेन साकमुद्याने विहरन्ती काचिन्नायिका भ्रमरमेवमाहेति भृङ्गस्या- भिधायां प्रस्तुतत्वमेव । न चामन्त्रणादप्रस्तुतत्वावगतिः, प्रत्युतामन्त्रणं तस्या मौग्ध्यविजृम्भितमिति अभिधया तावन्नाप्रस्तुतप्रशंसा समाप्या । समाप्तायां अन्य भी—। सभी अर्थालङ्कारों की ध्वन्यमानता देखी जाती है । जैसे दीपकध्वनि— हे वृक्ष तुम्‍हें अनल, या पवन, या मतवाला हाथी, या परशु या इन्द्र के हाथ से छोड़ा हुआ वज्र मत (बाधित करे), लता के साथ तुम्हारा कल्याण हो ! यहां 'बाधित करे' इस छिपाए जाते हुए ही 'दीपक' से अत्यन्त स्नेह के आस्पद होने की प्रतीति के द्वारा चारुत्व की निष्पत्ति होती है । 'अप्रस्तुतप्रशंसाध्वनि' भी— हे भ्रमर कंटीले केतकी के वनों को ढूंढ़ता-ढूंढ़ता तू मर जायगा पर घूमता हुआ मालती के पुष्प के सदृश को नहीं प्राप्त करेगा । प्रियतम के साथ उद्यान में विहार करती हुई किसी नायिका ने भौंरे से इस प्रकार कहा, इस प्रकार भौंरा अभिधा में प्रस्तुत ही है । आमन्त्रण के कारण (भौंरा के अप्रस्तुत होने का) ज्ञान नहीं होता (अर्थात् यह कहना कि भौंरा का आमंत्रण सम्भव नहीं अतः निश्चय ही वह अप्रस्तुत है, ऐसी बात नहीं) बल्कि आमन्त्रण उस (नायिका) की मुग्धता का विजृम्भित है इसलिए अभिधा से अप्रस्तुतप्रशंसा समाप्त नहीं की जा

द्वितीय उद्योतः २९७

लोचनम्

पुनरभिधायां वाच्यार्थबलादन्यापदेशता ध्वन्यते । यत्सौभाग्याभिमानपूर्णा सुकुमारपरिमलमालतीकुसुमसदृशी कुलवधूर्निर्व्याजप्रेमपरतया कृतकवैदग्ध्य- लब्धप्रसिद्ध्यतिशयानि शम्भलीकण्टकव्याप्तानि दूरामोदकेतकीवनस्थानीयानि वेश्याकुलानीतश्चेतश्च चञ्चूर्यमाणं प्रियतममुपालभते । अपह्नुतिध्वनिर्यथास्मदु- पाध्यायभट्टेन्दुराजस्य— यः कालागुरुपत्रभङ्गरचनावासैकसारायते गौराङ्गीकुचकुम्भभूरिसुभगाभोगे सुधाधामनि । विच्छेदानलदीपतोत्कवनिताचेतोधिवासोद्भवं सन्तापं विनिनीषुरेष विततैरङ्गैर्नताङ्गि स्मरः ॥ अत्र चन्द्रमण्डलमध्यवर्तिनो लक्ष्मणो वियोगाग्निपरिचितवनिताहृदयोदित- प्लोषमलीमसच्छविन्मन्मथाकारतयापह्नवौ ध्वन्यते । अत्रैव ससन्देहध्वनिः— यतश्चन्द्रवर्तिनस्तस्य नामापि न गृहीतम् । अपि तु गौराङ्गीस्तनाभोगस्थानीये चन्द्रमसि कालागुरुपत्रभङ्गविच्छित्त्यास्पदत्वेन यः सारतामुत्कृष्टतामाच- रतीति तन्न जानीमः किमेतद्वस्त्विति ससन्देहोऽपि ध्वन्यते । पूर्वमनङ्गीकृत- प्रणयामनुतप्तां विरहोत्कण्ठितां वल्लभागमनप्रतीक्षापरत्वेन कृतप्रसाधनादि- विधितया वासकसज्जीभूतां पूर्णचन्द्रोदयावसरे दूतीमुखानीतः प्रियतमस्त्वदीय- सकती । फिर अभिधा के समाप्त होने पर वाच्यार्थ के बल से अन्यापदेशता ध्वनित होती है कि सौभाग्य के अभिमान से भरी, सुकुमार एवं परिमल वाली मालती के पुष्प के सदृश कुलवधू अपने निश्छल प्रेम की तल्लीनता से प्रियतम को उलाहना देती है जो अपने कृत्रिम वैदग्ध्य से अतिशय सिद्धिप्राप्त, कुट्टनियों के कंटकों से भरे, एवं दूर तक फैली सुरभि वाले केतकी-वनों के सदृश वेश्याकुलों में इधर-उधर भटका करता है । अपह्नुतिध्वनि, जैसे हमारे उपाध्याय भट्ट इन्दुराज का— जो (कामदेव) गोरे अङ्गों वाली (नायिका) के समान विशेष विस्तार वाले सुधा के धाम, अर्थात् चन्द्रमा में कालागुरु की पत्रभङ्ग की रचना के रूप में सार (अर्थात् उत्कृष्ट) हो रहा है वह, हे नताङ्गि, वियोगाग्नि से प्रदीप्त उत्कण्ठित वनिताओं के चित्त में रहने से उत्पन्न सन्ताप को वितत अङ्गों से निवारण करना चाहता है । यहां चन्द्रमण्डल के बीच रहने वाले चिह्न का, वियोग की अग्नि में पके वनिता के हृदय से उत्पन्न ज्वाला से मलिन कान्ति वाले कामदेव के आकार के रूप में अपह्नव ध्वनित हो रहा है । यहां ही ‘ससन्देहध्वनि’ है—क्योंकि चन्द्र में रहने वाले उस (चिह्न) का नाम भी नहीं लिया है, बल्कि गोरे अङ्गों वाली के स्तन-विस्तार के सदृश चन्द्रमा में कालागुरु की पत्रभङ्ग-विच्छित्ति के आस्पद रूप में सारता अर्थात् उत्कृष्टता का आचरण कर रहा है, हम नहीं जानते कि यह क्या वस्तु है, इस प्रकार ‘ससन्देह’ भी ध्वनित हो रहा है। पहले प्रणय को स्वीकार नहीं किया, बाद में अनुतप्त, विरह से उत्कण्ठित, प्रिय के आगमन की प्रतीक्षा में संलग्न होने के कारण बनाव-सिंगार के

२९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कुचकलशन्यस्तकालागुरुपत्रभङ्गरचना मन्मथोद्दीपनकारिणीति चाटुकं कुर्वा- णश्चन्द्रवर्तिनी चेयं कुवलयदलश्यामलकान्तिरेवमेव करोतीति प्रतिवस्तूपमा- ध्वनिरपि । सुधाधामनीति चन्द्रपर्यायतयोपात्तमपि पदं सन्तापं विनिनीषुरित्यत्र हेतुतामपि व्यनक्तीति हेत्वलङ्कारध्वनिरपि । त्वदीयकुचशोभा मृगाङ्कशोभा च सह मदनमुद्दीपयत इति सहोक्तिध्वनिरपि । ‘त्वत्कुचसदृशश्चन्द्रश्चन्द्रसम- स्त्वत्कुचाभोगः’ इत्यर्थप्रतीतेरुपमेयोपमाध्वनिरपि । एवमन्येऽप्यत्र भेदाः शक्योत्प्रेक्षाः । महाकविवाचोऽस्याः कामधेनुत्वात् । यतः— हेलापि कस्यचिदचिन्त्यफलप्रसूत्यै कस्यापि नालमणवेऽपि फलाय यत्नः । दिग्दन्तिरोमचलनं धरणीं धुनोति खात्सम्पतन्नपि लतां चलयेन्न भृङ्गः ॥ एषां तु भेदानां संसृष्टित्वं सङ्करत्वं च यथायोगं चिन्त्यम् । अतिशयोक्ति- ध्वनिर्यथा ममैव— केलीकन्दलितस्य विभ्रममधोर्धुर्यं वपुस्ते दृशौ भङ्गीभङ्गुरकामकार्मुकमिदं भ्रूनर्मकर्मक्रमः । विधान से वासकसज्जा बनी हुई ( नायिका ) को पूर्ण चन्द्र के उदय के अवसर में दूती के द्वारा लाया गया प्रियतम तुम्हारे कुचकलश में लगी हुई पत्रभङ्गरचना काम को उद्दीप्त करने वाली है’ यह चाटु ( चापलूसी ) करते हुए और चन्द्र में रहने वाली यह कुवलयदल के समान श्यामल कान्ति इसी प्रकार ( काम को उद्दीप्त ) करती है, यह ‘प्रतिवस्तूपमा ध्वनि’ भी है । ‘सुधा का धाम’ यह चन्द्र के पर्याय के रूप में उपात्त होकर भी ‘सन्ताप को निवारण करना चाहता है’ इसमें हेतुभाव को व्यक्त करता है, इस प्रकार ‘हेतु’ अलङ्कार का ध्वनि भी है । तुम्हारे स्तनों की शोभा और मृगाङ्क चन्द्र की शोभा एक साथ काम को उद्दीप्त करती हैं, यह सहोक्तिध्वनि भी है । तुम्हारे स्तन के सदृश चन्द्र है और चन्द्र के सदृश तुम्हारा कुचाभोग है, इस अर्थ की प्रतीति होने से ‘उपमेयोपमाध्वनि’ भी है । इस प्रकार यहां अन्य भी भेद उत्प्रेक्षित हो सकते हैं । क्यों कि यह महाकवि की वाणी कामधेनु होती है । क्योंकि— किसी की लीला ( मात्र ) भी वह काम कर देती है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती और यत्न कुछ भी काम नहीं कर पाता । दिग्गज के रोम का कम्पन धरती को कम्पित कर डालता है, परन्तु भौंरा आकाश से गिर कर भी लता को नहीं हिला पाता । इन भेदों का संसृष्टित्व और सङ्करत्व यथोचित रूपसे समझ लेने चाहिए । ‘अति- शयोक्तिध्वनि’, जैसे मेरा ही— विलासी जनों की क्रीड़ा से अङ्कुरित होने वाले विभ्रमवसन्त के कार्यभार को धारण करने वाला शरीर तेरी आंखें हैं, यह कामदेव का रचना विशेष से टेढ़ा धनुष तेरी भौं के लीलाकर्म का प्रकार है । तेरे मुखकमल में विद्यमान आसव ( मद्य ) कुछ भी

: द्वितीय उद्योतः २९९ ध्वन्यालोकः एवमलङ्कारध्वनिमार्गं व्युत्पाद्य तस्य प्रयोजनवत्तां ख्यापयि- तुमिदमुच्यते— इस प्रकार अलङ्कारध्वनि का मार्ग बता कर उसे सप्रयोजन बताने के लिए यह कहते हैं— लोचनम् आपातेऽपि विकारकारणमहो वक्त्राम्बुजन्मासवः सत्यं सुन्दरि वेधसस्त्रिजगतीसारस्त्वमेकाकृतिः ॥ अत्र हि मधुमासमदनासवानां त्रैलोक्ये सुभगत्वान्योन्यं परिपोषकत्वेन। ते तु त्वयि लोकोत्तरेण वपुषा सम्भूय स्थिता इत्यतिशयोक्तिर्ध्वन्यते। आपातेऽ- पि विकारकारणमित्यास्वादपरम्पराक्रियां विना विकारात्मनः फलस्य सम्प- त्तिरिति विभावनाध्वनिरपि। विभ्रममधोर्धुर्यमिति तुल्ययोगिताध्वनिरपि। एवं सर्व्वलङ्काराणां ध्वन्यमानत्वमस्तीति मन्तव्यम्। न तु यथा कैश्चिन्नियतविषयी- कृतम्। यथायोगमिति (पृ० २९६)। क्वचिदलङ्कारः क्वचिद्वस्तु व्यञ्जकमित्यर्थो योजनीय इति ॥ ननूक्तास्तावच्चिरन्तनैरलङ्कारास्तेषां तु भवता यदि व्यङ्ग्यत्वं प्रदर्शितं किमियतेत्याशङ्क्याह—एवमित्यादि। येषामलङ्काराणां वाच्यत्वेन शरीरीकरणं शरीरभूतात्प्रस्तुतादर्थान्तरभूततया अशरीराणां कटकादिस्थानीयानां शरीरता- आस्वाद कर लेने पर (विभिन्न) विकारों को उत्पन्न कर देता है, ठीक है, हे सुन्दरि, तेरे एक रूप में विधाता के तीनों जगत् का सार है। यहां वसन्त, काम और मद्य ये तीनों त्रैलोक्य में एक दूसरे के परिपोषक होने के कारण सुभग हैं। वे तुझमें लोकोत्तर शरीर से मिल कर विद्यमान हैं, यह अतिशयोक्ति ध्वनित हो रही है। 'कुछ आस्वाद कर लेने पर ही विकारों को उत्पन्न कर देता है' यहां लगातार आस्वाद के बिना हुए ही विकार रूप फल का लाभ है, इस प्रकार विभावनाध्वनि भी है। 'विभ्रम-वसन्त के कार्यभार को धारण करने वाला' यहां 'तुल्य- योगिताध्वनि' भी है। इस प्रकार यह मानना चाहिए कि सब अलङ्कार ध्वनित होते हैं, ऐसा नहीं कि किसी ने विषय नियत कर दिया है (कि सिर्फ इतने ही अलङ्कार ध्वनित होते हैं, अन्य नहीं)। यथोचित रूप से। कहीं अलङ्कार व्यञ्जक होता है तो कहीं वस्तु' यह अर्थ लगाना चाहिए ॥ २७ ॥ प्राचीनोंने अलङ्कार कहे हैं, यदि उन (अलङ्कारों) का व्यङ्ग्यत्व आपने दिखाया तो इतने से क्या ? यह आशङ्का करके कहते हैं—'इस प्रकार' इत्यादि। जिन अलं- कारों का वाच्य रूप से शरीर रूप होना (शरीरीकरण) अर्थात् शरीरभूत प्रस्तुत से अर्थान्तर रूप होने के कारण 'कटक' आदि की भांति शरीर भिन्न का शरीरतापादन

३०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शरीरीकरणं येषां वाच्यत्वे न व्यवस्थितम् । तेऽलङ्काराः परां छायां यान्ति ध्वन्यङ्गतां गतः ॥ २८ ॥ ध्वन्याङ्गता चोभाभ्यां प्रकाराभ्यां व्यञ्जकत्वेन व्यङ्ग्यत्वेन च । तत्रेह प्रकरणाद्व्यङ्ग्यत्वेनेत्यवगन्तव्यम् । व्यङ्ग्यत्वेऽप्यलङ्काराणां प्राधा- न्यविवक्षायामेव सत्यां ध्वनावन्तःपातः । इतरथा तु गुणीभूतव्यङ्ग्य- त्वं प्रतिपादयिष्यते ॥ २८ ॥ वाच्य रूप से जिनका शरीर रूप होना माना जाता है, वे अलङ्कार ध्वनि के अङ्ग होकर अधिक शोभा लाभ करते हैं ॥ २८ ॥ ध्वन्यङ्गता दो प्रकार से होती है, व्यञ्जक होने से और व्यङ्ग्य होने से । उनमें यहां प्रकरणवश 'व्यङ्ग्य होने' से ध्वन्यङ्गता समझनी चाहिए । व्यङ्ग्य होने पर भी जब अलङ्कारों के प्राधान्य की विवक्षा होगी तभी ध्वनि में ( उनका ) अन्तःपात होगा । अन्यथा, गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व का प्रतिपादन करेंगे ॥ २८ ॥ लोचनम् पादनं व्यवस्थितं सुकवीनामयत्नसम्पाद्यतया । यदि वा वाच्यत्वे सति येषां शरीरतापादनमपि न व्यवस्थितं दुर्घटमिति यावत् । तेऽलङ्कारा ध्वनेर्व्यापारस्य काव्यस्य वाऽङ्गतां व्यङ्ग्यरूपतया गताः सन्तः परां दुर्लभां छायां कान्तिमा- त्भरूपतां यान्ति । एतदुक्तं भवति—सुकविर्विदग्धपुरन्ध्रीवद्भूषणं यद्यपि श्लिष्टं योजयति, तथापि शरीरतापत्तिरेवास्य कष्टसम्पाद्या कुङ्कुमपीतिकाया इव । आत्मतायास्तु का सम्भावनापि । एवम्भूता चेयं व्यङ्ग्यता या अप्रधानभूतापि वाच्यमात्रालङ्कारेभ्य उत्कर्षमलङ्काराणां वितरति । बालक्रीडायामपि राजत्वमिवेत्यमुमर्थं मनसि कृत्याह-इतरथा त्विति ॥२८॥ सुकवियों के द्वारा अयत्नसम्पाद्य होने के कारण व्यवस्थित है । अथवा यदि वाच्य होने पर जिनका शरीरतापादन भी नहीं बन सकता । वे अलङ्कार ध्वनि के व्यापार की अथवा काव्य की व्यङ्ग्य के प्रकार से अङ्गता को प्राप्त होते हुए दुर्लभ छाया अर्थात् कान्ति प्राप्त करते हैं, आत्मा रूप हो जाते हैं। बात यह कही गई—यद्यपि सुकवि विदग्ध पुरन्ध्री की भांति श्लिष्ट ( एक में एक सक्त ) योजना करता था, तथापि कुंकुम के पीलापन की भांति इस ( उपमा आदि अलङ्कार ) का शरीरतापादन की बहुत कष्ट से हो पाता है । इस प्रकार की यह व्यङ्ग्यता, जो अप्रधानभूत होकर भी वाच्यमात्र जो अलङ्कार है उनसे अलङ्कारों का ज्यादा उत्कर्ष वितरण करती है। 'लड़कों की क्रीड़ा में राजपने की भांति' यह बात मन में रख कर कहते हैं— अन्यथ —॥ २८ ॥

द्वितीय उद्योतः ३०१ ध्वन्यालोकः अङ्गित्वेन व्यङ्ग्यतायामपि, अलङ्काराणां द्वयी गतिः- कदाचि- द्वस्तुमात्रेण व्यज्यन्ते, कदाचिदलङ्कारेण । तत्र— व्यज्यन्ते वस्तुमात्रेण यदालङ्कृतयस्तया । ध्रुवं ध्वन्यङ्गता तासाम् अत्र हेतुः— काव्यवृत्तिस्तदाश्रया ॥ २९ ॥ यस्मात्तत्र तथाविधव्यङ्ग्यालङ्कारपरत्वेनैव काव्यं प्रवृत्तम् । अन्यथा तु तद्वाक्यमात्रमेव स्यात् ॥ २९ ॥ तासामेवालङ्कृतीनाम्— अलङ्कारान्तरव्यङ्ग्यभावे अङ्गी (अर्थात् प्रधान) रूप से व्यङ्ग्य होने पर भी अलङ्कारों की दो गति है— कभी वस्तुमात्र से व्यञ्जित होते हैं, कभी अलङ्कार से । उनमें— जब वस्तुमात्र से अलङ्कार व्यञ्जित होते हैं तब उनकी ध्वन्यङ्गता ध्रुव है— यहां कारण— काव्य की प्रवृत्ति उसके ही आश्रित है ॥ २९ ॥ क्योंकि वहां उस प्रकार के व्यङ्ग्य अलङ्कार के तात्पर्य से ही काव्य प्रवृत्त है । अन्यथा वह वाक्यमात्र ही होता । उन्हीं अलङ्कारों की— अलङ्कारान्तर के व्यङ्ग्य होने पर लोचनम् तत्रेति । द्वय्यां गतौ सत्याम् । अत्र हेतुरित्ययं वृत्तिग्रन्थः । काव्यस्य कवि- व्यापारस्य वृत्तिस्तदाश्रयादलङ्कारप्रवणा यतः । अन्यथेति । यदि न तत्परत्व- मित्यर्थः । तेन तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यता नैव शङ्क्येति तात्पर्यम् । तासामेवा- लङ्कृतीनामित्ययं पठिष्यमाणकारिकोपस्कारः । पुनरिति कारिकामध्य उप- स्कारः । ध्वन्यङ्गतेति । ध्वनिभेदत्वमित्यर्थः । उनमें—। दो स्थितियों के होने पर । 'यहां कारण' यह वृत्तिग्रन्थ है । क्योंकि काव्य की अर्थात् कवि के व्यापार की प्रवृत्ति उसके आश्रित अर्थात् अलङ्कारप्रवण है । अन्यथा—अर्थात् यदि तात्पर्य न हो । इसलिए वहां गुणीभूतव्यङ्ग्य की शङ्का (सम्भावना) नहीं करनी चाहिए यह मतलब है । 'उन्हीं अलङ्कारों की' यह आगे पढ़ी जाने वाली कारिका का उपस्कार है । 'फिर' यह कारिका के बीच में उपस्कार है ।

३०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पुनः, ध्वन्यङ्गता भवेत् । चारुत्वोत्कर्षतो व्यङ्ग्यप्राधान्यं यदि लक्ष्यते ॥ ३० ॥ उक्तं ह्येतत्—'चारुत्वोत्कर्षनिबन्धना वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधा- न्यविवक्षा' इति । वस्तुमात्रव्यङ्ग्यत्वे चालङ्काराणामनन्तरोपदर्शि- तेभ्य एवोदाहरणेभ्यो विषय उन्नेयः । तदेवमर्थमात्रेणालङ्कारविशेष- रूपेण वार्थेनार्थान्तरस्यालङ्कारस्य वा प्रकाशने चारुत्वोत्कर्षनिबन्धने सति प्राधान्येऽर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यो निरवगन्तव्यः ॥ ३० ॥ फिर; ध्वन्यङ्गता होती है । यदि चारुत्व के उत्कर्ष के कारण व्यङ्ग्य का प्राधान्य लक्षित होता है ॥ ३० ॥ क्योंकि यह पहले कह चुके हैं—'वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य की विवक्षा चारुत्व के उत्कर्ष के कारण होती है।' अलङ्कारों के वस्तुमात्र से व्यङ्ग्य होने पर अभी दिखाए हुए ही उदाहरणों से विषय समझ लेना चाहिए । तो इस प्रकार अर्थमात्र से अथवा अलङ्कारविशेषरूप अर्थ से अर्थान्तर के अथवा अलङ्कार के प्रकाशन में चारुत्व के उत्कर्ष के कारण प्राधान्य होने पर अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य वाला ध्वनि समझना चाहिए ॥ ३० ॥ लोचनम् व्यङ्ग्यप्राधान्यमिति । अत्र हेतुः—चारुत्वोत्कर्षत इति । यदीति । तदप्राधान्ये तु वाच्यालङ्कार एव प्रधानमिति गुणीभूतव्यङ्ग्यतेति भावः । नन्वलङ्कारो वस्तुना व्यज्यते अलङ्कारान्तरेण च व्यज्यत इत्यत्रोदाहरणानि किमिति न दर्शितानीत्याशङ्क्याह—वस्त्विति । एतत्संक्षिप्योपसंहरति—तदेवमिति । व्यङ्ग्यस्य व्यञ्जकस्य च प्रत्येकं वस्त्वलङ्काररूपतया द्विप्रकारत्वाच्चतुर्विधोऽय- मर्थशक्त्युद्भव इति तात्पर्यम् ॥ २९-३० ॥ ध्वन्यङ्गता—। अर्थात् ध्वनि का भेद होना । व्यङ्ग्य का प्राधान्य—। इसमें कारण है—चारुत्व के उत्कर्ष के कारण । यदि—। भाव यह कि उसका ( अर्थात् व्यङ्ग्य का ) प्राधान्य न होने पर वाच्यालङ्कार ही प्रधान है, इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्यता होगी । अलङ्कार वस्तु से व्यञ्जित होता है और अलङ्कारान्तर से व्यञ्जित होता है, इनमें क्यों नहीं उदाहरण दिखाए हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—वस्तु०—। इसे संक्षेप करके उपसंहार करते हैं—तो इस प्रकार—। व्यङ्ग्य के और व्यञ्जक के प्रत्येक वस्तुरूप और अलङ्काररूप होने के कारण दो प्रकार होने से यह अर्थशक्त्युद्भव चार प्रकार का होता है यह तात्पर्य है ॥ २९-३० ॥

द्वितीय उद्योतः ३०३ ध्वन्यालोकः एवं ध्वनेः प्रभेदान् प्रतिपाद्य तदाभासविवेकं कर्तुमुच्यते— यत्र प्रतीयमानोऽर्थः प्रक्लिष्टत्वेन भासते । वाच्यस्याङ्गतया वापि नास्यासौ गोचरो ध्वनेः ॥ ३१ ॥ द्विविधोऽपि प्रतीयमानः स्फुटोऽस्फुटश्च । तत्र य एव स्फुटः शब्दशक्त्यार्थशक्त्या वा प्रकाशते स एव ध्वनेर्मार्गो नेतरः । इस प्रकार ध्वनि के प्रभेदों का प्रतिपादन करके उसके आभास का विवेक करने के लिए कहते हैं— जहां प्रतीयमान अर्थ प्रक्लिष्ट रूप से अथवा वाच्य के अङ्ग रूप से भासित होता है वह इस ध्वनि का गोचर नहीं है ॥ ३१ ॥ प्रतीयमान दो प्रकार का है—स्फुट और अस्फुट । उनमें जो ही स्फुट होकर शब्दशक्ति अथवा अर्थशक्ति से प्रकाशित होता है वही ध्वनि का मार्ग है, इतर नहीं। लोचनम् एवमिति । अविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्य इति द्वौ मूलभेदौ । आद्यस्य द्वौ भेदौ—अत्यन्ततिरस्कृतवाच्योऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्यश्च । द्विती- यस्य द्वौ भेदौ—अलक्ष्यक्रमोऽनुरणनरूपश्च । प्रथमोऽनन्तभेदः । द्वितीयो द्विविधः—शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च । पश्चिमस्त्रिविधः—कविप्रौढोक्तिकृत- शरीरः कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिकृतशरीरः स्वतःसम्भवो च । ते च प्रत्येकं व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोरुक्तभेदनयेन चतुर्थेति द्वादशविधोऽर्थशक्तिमूलः । आद्याश्च- त्वारो भेदा इति षोडश मुख्यभेदाः । ते च पदवाक्यप्रकाशत्वेन प्रत्येकं द्विविधा वक्ष्यन्ते । अलक्ष्यक्रमस्य तु वर्णपदवाक्यसङ्घटनाप्रबन्धप्रकाशयत्वेन पञ्चत्रिंश- इस प्रकार—। अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दो मूलभेद हैं। प्रथम के दो भेद—अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य । द्वितीय के दो भेद—अलक्ष्यक्रम और अनुरणनरूप । प्रथम के भेद अनन्त हैं। दूसरा दो प्रकार का है—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल । अन्तवाला (अर्थात् अर्थशक्तिमूल ) तीन प्रकार का है—कवि की प्रौढोक्ति से बना, कविद्वारा निबद्ध वक्ता की प्रौढोक्ति से बना और स्वतःसम्भवौ । और ये प्रत्येक व्यङ्ग्य और व्यञ्जक के कहे हुए प्रकार के अनुसार ( अर्थात् वस्तु से वस्तु, वस्तु से अलङ्कार, अलङ्कार से वस्तु और अलङ्कार से अलङ्कार) चार प्रकार के होकर, बारह प्रकार का अर्थशक्तिमूल होता है । पहले के चार भेद ( अर्थात् शब्दशक्त्युत्थ के वस्तु तथा अलङ्कार रूप दो भेद, उभयशक्त्युत्थ का एक और असंलक्ष्यक्रम का एक इस प्रकार सब मिल कर ) सोलह मुख्य भेद हैं। वे पदप्रकाश और वाक्यप्रकाश के रूप से प्रत्येक दो प्रकार के कहेंगे । अलक्ष्यक्रम के वर्णप्रकाश, ( पदप्रकाश, वाक्यप्रकाश ) संघटनाप्रकाश और प्रबन्धप्रकाश होने के कारण पैंतीस भेद

३०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्फुटोऽपि योऽभिधेयस्याङ्गत्त्वेन प्रतीयमानोऽवभासते सोऽस्यानुरणन- रूपव्यङ्ग्यस्य ध्वनेरगोचरः । यथा— कमलाअरा णँ मलिआ हंसा उड्डाविआ ण अ पिउच्छा । केण वि गामतडाए अब्भं उत्ताणं फलिहम् ॥ अत्र हि प्रतीयमानस्य मुग्धवध्वा जलधरप्रतिबिम्बदर्शनस्य वाच्याङ्गत्त्वमेव । एवंविधे विषयेऽन्यत्रापि यत्र व्यङ्ग्यापेक्षया वाच्यस्य चारुत्वोत्कर्षप्रतीत्या प्राधान्यमवसीयते, तत्र व्यङ्ग्यस्याङ्गत्त्वेन स्फुट होकर भी जो प्रतीयमान अभिधेय (वाच्य) के अङ्गरूप से भासित होता है वह इस अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि का गोचर नहीं । जैसे— (अरी सखी,) न तालाब गन्दा हुआ है न सहसा हंस ही उड़ा दिए, किसी ने गांव के तालाब में मेघ को उलटा करके डाल दिया है ! यहां प्रतीयमान मुग्धवधू (अनबूझ नवेली) द्वारा मेघ की छाया का दर्शन वाच्य का अङ्ग ही है । इस प्रकार के विषय में अन्यत्र भी जहां व्यङ्ग्य की अपेक्षा वाच्य के चारुत्वोत्कर्ष की प्रतीति से प्राधान्य मालूम पड़ता है, वहां व्यङ्ग्य के अङ्ग लोचनम् द्वेधाः । तदाभासेभ्यो ध्वन्याभासेभ्यो विवेको विभागः । अस्येत्यात्मभूतस्य ध्वनेरसौ काव्यविशेषो न गोचरः, न विषय इत्यर्थः । कमलाकरा न मलिता हंसा उड्डायिता न च सहसा । केनापि ग्रामतडागेऽभ्रमुत्तानितं क्षिप्तम् ॥ इति च्छाया । अन्ये तु पिउच्छा पितृष्वसः इत्थमामन्त्र्यते । केनापि अतिनिपुणेन । वाच्याङ्गत्वमेवेति । वाच्येनैव हि विस्मयविभावरूपेण मुग्धिमातिशयः प्रतीयत इति वाच्यादेव चारुत्वसम्पत् । वाच्यं तु स्वात्मोपपत्तयेऽर्थान्तरं स्वोपकार- वाञ्छया व्यनक्ति । हुए । उनके आभासों अर्थात् ध्वनि के आभासों से विवेक अर्थात् विभाग । इसका अर्थात् आत्मभूत ध्वनि का वह काव्यविशेष गोचर नहीं अर्थात् विषय नहीं । परन्तु दूसरे (के अनुसार) 'पिउच्छा' अर्थात् 'बुआ' (पिता की बहन) इस प्रकार आमन्त्रण किया गया है । किसी ने अर्थात् अति चालाक ने । वाच्य का अङ्ग ही—। विस्मय-विभाव रूप वाच्य से ही अतिशय मुग्धिमा (सुन्दरता) प्रतीत होती है, इसलिए वाच्य से ही चारुत्वसम्पत्ति है । क्योंकि वाच्य अपनी उपपत्ति के लिए अर्थान्तर को अपने उपकार की वाञ्छा से व्यक्त करता है ।

द्वितीय उद्योतः ३०५ ध्वन्यालोकः प्रतीतेर्ध्वनेरविषयत्वम् । यथा— वाणीरकुडङ्गोड्डीणसउणिकोलाहलं सुणन्तीए । घरकम्मवावडाए बहुए सीअन्ति अङ्गाइं ॥ एवंविधो हि विषयः प्रायेण गुणीभूतव्यङ्ग्यस्योदाहरणत्वेन निर्देक्ष्यते । यत्र तु प्रकरणादिप्रतिपत्त्या निर्धारितविशेषो वाच्योऽर्थः रूप से प्रतीत होने के कारण ध्वनि का विषय नहीं है । जैसे— वेतस लता ( बेंत ) की घनी झाड़ से उड़े हुए पंछियों की आवाज सुनती हुई, घर के काम-काज में फंसी बहू के अङ्ग शिथिल पड़े जा रहे हैं । इस प्रकार का विषय प्रायः करके गुणीभूतव्यङ्ग्य के उदाहरण के रूप में निर्देश करेंगे। परन्तु जहां प्रकरण आदि के ज्ञान से विशेष निर्धारित होने पर वाच्य अर्थ लोचनम् वेतसलतागहनोड्डीनशकुनिकोलाहलं शृण्वत्याः । गृहकर्मव्यापृताया वध्वाः सीदन्त्यङ्गानि ॥ इति च्छाया । अत्र दत्तसङ्केतचौर्यकामुकरतसमुचितस्थानप्राप्तिर्ध्वन्यमाना वाच्यमेवोप- स्कुरुते । तथा हि गृहकर्मव्यापृताया इत्यन्यपराया अपि, वध्वा इति सातिश- यलज्जापारतन्त्र्यबद्धाया अपि, अङ्गानीत्येकमपि न तादृगङ्गं यद्गाम्भीर्याद्वहि- त्त्ववशेन संवरीतुं पारितम्, सीदन्तीत्यास्तां गृहकर्मसम्पादनं स्वात्मानमपि धर्तुं न प्रभवन्तीति । गृहकर्मयोगेन स्फुटं तथा लक्ष्यमाणानीति । अस्मादेव वाच्यात्सातिशयमदनपरवशताप्रतीतेश्चारुत्वसम्पत्तिः । यत्र त्विति । प्रकरणामा- दिर्यस्य शब्दान्तरसन्निधानसामर्थ्यलिङ्गादेस्तदवगमादेव यत्रार्थो निश्चितसमस्त- स्वभावः । पुनर्वाच्यः पुनरपि स्वशब्देनोक्तोऽत एव स्वात्मावगतेः सम्पन्न- यहां दत्तसङ्केत चौर्यकामुक का रत के योग्य स्थान में पहुंचना यह ध्वनित होता हुआ वाच्य को ही उपस्कृत करता है । जैसा कि 'घर के कामकाज में लगी हुई' अर्थात् अन्य ( कार्य ) में लगी हुई भी, 'बहू की' अर्थात् अतिशय लज्जा और पारतन्त्र्य में बंधी हुई भी, ( सब ) अङ्ग, अर्थात् एक भी अङ्ग उस प्रकार नहीं था जो गाम्भीर्य से आकारगोपन के ढङ्ग से संवरण किया जा सके, 'शिथिल पड़े जा रहे हैं' घर का काम- काज करना तो दूर रहे, अपने आपको सम्हाल भी नहीं पा रहे हैं । घर के काम-काज में उस प्रकार स्पष्ट लक्षित नहीं होते । इसी वाच्य से सातिशय मदनपारवश्य की प्रतीति होने से चारुता सम्पन्न होती है । परन्तु जहां— । प्रकरण आदि में है जिसके अर्थात् शब्दान्तरसन्निधान, सामर्थ्य, लिङ्ग आदि के अवगत होने से ही जहां अर्थ के समस्त २० ध्व०

३०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पुनः प्रतीयमानाङ्गत्वेनैवावभासते सोऽस्यैवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य ध्वनेर्मार्गः । यथा— उच्चिणसु पडिअ कुसुमं मा धुण सेहालिअं हलिअसुहे ! अह दे विसमविरावो ससुरेण सुओ वलअसद्दो ॥ अत्र ह्यविनयपतिना सह रममाणा सखी बहिःश्रुतवलयकलकलया पुनः प्रतीयमान के अङ्ग रूप में ही भासित होता है वह इसी अनुरणन रूप व्यङ्ग्य ध्वनि का मार्ग है । जैसे— अरी हलवाहे की पतोहू, गिरे हुए फूल चुन, हरसिंगार को मत हिला । विषम ( अनिष्टजनक ) परिणाम वाली तेरे वलय की आवाज को ससुर ने सुन लिया है । यहां अविनयपति ( जार ) के साथ रमण करती हुई सखी ( नायिका ) को बाहर से वलय की आवाज सुन कर सखी सावधान करती है । यह ( व्यङ्ग्य अर्थ ) लोचनम् पूर्वत्वादेव तावन्मात्रपर्यवसायी न भवति तथाविधश्च प्रतीयमानस्याङ्गतामे- तीति सोऽस्य ध्वनेर्विषय इत्यनेन व्यङ्ग्यतात्पर्यनिबन्धनं स्फुटं वदता व्यङ्ग्य- गुणीभावे त्वेतद्विपरीतमेव निबन्धनं मन्तव्यमित्युक्तं भवति । उच्चिनु पतितं कुसुमं मा धुनीहि शेफालिकां हालिकस्नुषे । एष ते विषमविपाकः श्वशुरेण श्रुतो वलयशब्दः ॥ इति च्छाया । यतः श्वशुरः शेफालिकालतिकां प्रयत्नै रक्षंस्तस्या आकर्षणधूननादिना कुप्यति । तेनात्र विषमपरिपाकत्वं मन्तव्यम् । अन्यथा स्वोक्त्यैव व्यङ्ग्याक्षेपः स्यात् । अत्र च 'कस्स वा ण होइ रोसो' इत्येतदनुसारेण व्याख्या कर्तव्या । स्वभाव का निश्चय हो जाता है । पुनः वाच्य अर्थात् फिर भी अपने शब्द से उक्त, अतएव अपनी अवगति हो जाने के कारण पहले ही सम्पन्न हो जाने के कारण ही उतने मात्र में पर्यवसन्न होने वाला नहीं होता है और उस प्रकार का ( वह वाच्य अर्थ ) प्रतीयमान का अङ्ग हो जाता है, अतः वह ध्वनि का विषय है, इस ( कथन ) से व्यङ्ग्य में तात्पर्य का निबन्धन स्पष्ट कहते हुए यह कहा कि व्यङ्ग्य के गुणीभाव में इसके विपरीत निबन्धन मानना चाहिए । क्यों कि ससुर हरसिंगार की लत्तर की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करता है, आकर्षण-धूनन आदि से कुपित होता है । इस लिए यहां परिणाम में विषम ( अर्थात् अनिष्टकर ) सम- झना चाहिए । अन्यथा अपनी उक्ति से ही व्यङ्ग्य का आक्षेप होगा । यहां 'कस्स वा ण होइ रोसो०' के अनुसार व्याख्या करनी चाहिए । वाच्य अर्थ की प्रतिपत्ति रूप लाभ के

द्वितीय उद्योतः ३०७ ध्वन्यालोकः सख्या प्रतिबोध्यते । एतदपेक्षणीयं वाच्यार्थप्रतिपत्तये । प्रतिपन्ने च वाच्येऽर्थे तस्याविनयप्रच्छादनतात्पर्येणाभिधीयमानत्वात्पुनर्व्यङ्ग्या- ङ्गत्वमेवेत्यस्मिन्ननुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनावन्तर्भावः ॥ ३१ ॥ एवं विवक्षितवाच्यस्य ध्वनेस्तदाभासविवेके प्रस्तुते सत्यविव- क्षितवाच्यस्यापि तं कर्तुमाह— अव्युत्पत्तेरशक्तेर्वा निबन्धो यः स्खलद्गतेः । शब्दस्य स च न ज्ञेयः सूरिभिर्विषयो ध्वनेः ॥ ३२ ॥ वाच्यार्थ को समझने के लिए अपेक्षित है, और वाच्य अर्थ के मालूम हो जाने पर उस ( वाच्यार्थ ) के अविनय के प्रच्छादन के लिए कहे जाने के कारण पुनः व्यङ्ग्य का अङ्ग ही है, इस प्रकार इस अनुरणन रूप व्यङ्ग्य ध्वनि में अन्तर्भाव है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार विवक्षित वाच्य ध्वनि के और उसके आभास के विवेक प्रस्तुत होने पर अविवक्षितवाच्य का भी वह करने के लिए कहते हैं— अव्युत्पत्ति अथवा अशक्ति के कारण स्खलद्गति शब्द का जो प्रयोग है उसे विद्वानों को ध्वनि का विषय नहीं समझना चाहिए ॥ ३२ ॥ लोचनम् वाच्यार्थस्य प्रतिपत्तये लाभाय एतद्व्यङ्ग्यमपेक्षणीयम् । अन्यथा वाच्योऽर्थो न लभ्येत । स्वतःसिद्धतया अवचनीय एव सोऽर्थः स्यादिति यावत् । नन्वेवं व्यङ्ग्यस्योपस्कारता प्रत्युतोक्ता भवेदित्याशङ्क्याह—प्रतिपन्ने चेति । शब्दे- नोक्त इति यावत् ॥ ३१ ॥ तदाभासविवेके प्रस्तुत इति सप्तमी हेतौ । तदाभासविवेकप्रस्तावलक्षणात्प्र- सङ्गादिति यावत् । कस्य तदाभास इत्यपेक्षायामाह—विवक्षितवाच्यस्येति । स्पष्टे तु व्याख्याने प्रस्तुत इत्यसङ्गतम् । परिसमाप्तौ हि विवक्षिताभिधेयस्य तदा- लिए यह व्यङ्ग्य अपेक्षणीय है, अन्यथा वाच्य अर्थ लब्ध नहीं होगा। मतलब कि स्वतः- सिद्ध होने के कारण वह अर्थ अवचनीय ही होगा । तब तो इस प्रकार प्रत्युत व्यङ्ग्य की उपस्कारता कही गई, यह आशंका करके कहते हैं—वाच्य अर्थ के प्रतिपन्न—। मतलब कि शब्द से उक्त होने पर ॥ ३१ ॥ उसके आभास के विवेक के प्रस्तुत होने पर यहां हेतु में सप्तमी है । मतलब कि उसके आभास के विवेक के प्रस्ताव रूप प्रसङ्ग से । किसका 'उसका आभास' इस अपेक्षा में कहते हैं—विवक्षितवाच्य का—। व्याख्यान स्पष्ट होने पर 'प्रस्तुत' यह कहना असङ्गत है । क्यों कि परिसमाप्ति में विवक्षितवाच्य का उसके आभास का विवेक

३०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्खलद्गतेरुपचरितस्य शब्दस्याव्युत्पत्तेरशक्तेर्वा निबन्धो यः स च न ध्वनेर्विषयः । स्खलद्गति अर्थात् उपचरित शब्द का अव्युत्पत्ति अथवा अशक्ति से जो प्रयोग है और वह ध्वनि का विषय नहीं । लोचनम् भासविवेकः । न त्वधुना प्रस्तुततः । नाप्युत्तरकालमनुबध्नाति । स्खलद्गतेरिति । गौणस्य लाक्षणिकस्य वा शब्दस्येत्यर्थः । अव्युत्पत्तिरनुप्रासादिनिबन्धनतात्प- र्यप्रवृत्तिः । यथा— प्रेङ्खत्प्रेमप्रबन्धप्रचुरपरिचये प्रौढसीमन्तिनीनां चित्ताकाशावकाशे विहरति सततं यः स सौभाग्यभूमिः । अत्रानुप्रासरसिकतया प्रेङ्खदिति लाक्षणिकः, चित्ताकाश इति गौणः प्रयोगः कविना कृतोऽपि न ध्वन्यमानरूपसुन्दरप्रयोजनांशपर्यवसायी । अशक्ति- र्वृत्तपरिपूरणाद्यसामर्थ्यम् । यथा— विषमकाण्डकुटुम्बकसञ्चयप्रवर वारिनिधौ पतता त्वया । चलतरङ्गविघूर्णितभाजने विचलतात्मनि कुड्चमये कृता ॥ अत्र प्रवरान्तमाद्यपदं चन्द्रमस्युपचरितम् । भाजनमित्याशये, कुड्चमय है, न कि अभी प्रस्तुत है । न कि आगे तक अनुबन्ध करता है । स्खलद्गति—अर्थात् गौण या लाक्षणिक शब्द का । अव्युत्पत्ति अर्थात् अनुप्रास आदि के प्रयोग के तात्पर्य से प्रवृत्ति । जैसे— प्रौढ़ सीमन्तिनियों के स्फुरित होते हुए ( प्रेङ्खत् ) प्रेम-प्रबन्ध के प्रचुर परिचय वाले चित्त के आकाश में जो सतत विहार करता है, वह सौभाग्यभूमि है । यहां अनुप्रास के रसिक होने के कारण 'प्रेङ्खत्' यह लाक्षणिक और 'चित्त का आकाश' यह गौण प्रयोग कवि के द्वारा किया गया भी ध्वन्यमान रूप सुन्दर प्रयोजन के अंश में पर्यवसायी नहीं है । अशक्ति अर्थात् वृत्तपूर्ति आदि असामर्थ्य । जैसे— हे विषमबाण ( कामदेव ) के कुटुम्बसमूह में प्रवर ( अर्थात् चन्द्र ), समुद्र में गिरते हुए तुमने चंचल तरंग की भांति विघूर्णित भाजन वाले, कुड्यमय अपने आप में विच- लता कर दी है । यहां 'प्रवर' तक प्रथम पद चन्द्रमा में उपचरित है । 'भाजन' आशय में, 'कुड्य-

द्वितीय उद्योतः ३०९ ध्वन्यालोकः यतः— सर्वेष्वेव प्रभेदेषु स्फुटत्वेनावभासनम् । यद्व्यङ्ग्यस्याङ्गिभूतस्य तत्पूर्णं ध्वनिलक्षणम् ॥ ३३ ॥ क्योंकि— सभी प्रभेदों में स्फुट रूप से जो अङ्गिभूत व्यङ्ग्य का अवभासित होना है वह ध्वनि का पूर्ण लक्षण है ॥ ३३ ॥ लोचनम् इति च विचले । अत्रैतत् कामपि कान्ति न पुष्यति, ऋते वृत्तपूरणात् । स चेति । प्रथमोद्द्योते यः प्रसिद्धयनुरोधप्रवर्तितव्यवहाराः कवय इत्यत्र ‘वदति बिसिनीपत्रशयनम्’ इत्यादि भाक्त उक्तः । स न केवलं ध्वनेर्न विषयो यावदय- मन्योऽपीति चशब्दस्यार्थः । उक्तमेव ध्वनिस्वरूपं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदतीत्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति—यत इति । अवभास- नमिति । भावानयने द्रव्यानयनमिति न्यायादवभासमानं व्यङ्ग्यम् । ध्वनि- लक्षणं ध्वनेः स्वरूपं पूर्णम् , अवभासनं वा ज्ञानं तद्ध्वनेर्लक्षणं प्रमाणं, तच्च पूर्णं, पूर्णध्वनिस्वरूपनिवेदकत्वात् । अथ वा ज्ञानमेव ध्वनिलक्षणम्, लक्षणस्य ज्ञानपरिच्छेद्यत्वात् । वृत्तावेवकारेण ततोऽन्यस्य चाभासरूपत्वमेवेति सूचयता तदाभासविवेकहेतुभावो यः प्रक्रान्तः स एव निर्वाहित इति शिवम् ॥ ३३ ॥ मय’ यह विचल में । यहां यह किसी कान्ति का पोषण नहीं करता, बावजूद छन्दःपूर्ति के । और वह—। प्रथम उद्योत में जो ‘प्रसिद्धि के अनुरोध से व्यवहार प्रवृत्त करने वाले कवि’ इस प्रसंग में ‘कमलिनी के पत्र का शयन कहता है’ इत्यादि भाक्त कहा है । न केवल वही ध्वनि का विषय नहीं है, बल्कि अन्य भी, यह ‘और’ ( च ) शब्द का अर्थ है । कहे हुए ही ध्वनिस्वरूप को उसके आभास के विवेक के हेतु रूप से कारिकाकार अनुवाद करते हैं, इस अभिप्राय से वृत्तिकार उपस्कार देते हैं—क्योंकि—। अवभासित होना—। ‘भाव के आनयन में द्रव्य का आनयन होता है’ इस न्याय के अनुसार अव- भासमान व्यङ्ग्य ( अवभासन का अर्थ है ) ध्वनि का लक्षण अर्थात् ध्वनि का स्वरूप पूर्ण है, अथवा अवभासन अर्थात् ज्ञान वह ध्वनि का लक्षण अर्थात् प्रमाण है, और वह पूर्ण है, क्यों कि पूर्ण ध्वनि के स्वरूप को निवेदन करता है । अथवा ज्ञान ही ध्वनि का लक्षण है, क्यों कि लक्षण ज्ञान का परिच्छेद्य होता है । वृत्ति में ‘ही’ ( एवकार ) से ‘उससे इतर का आभासरूपत्व ही है’ यह सूचित करते हुए उसके आभास के विवेक का हेतुभाव जो आरम्भ किया वही निर्वाह किया । शिवम् ।

३१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तच्चोदाहृतविषयमेव ॥ ३३ ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके द्वितीय उद्योतः ॥ उसका विषय उदाहृत ही है ॥ ३३ ॥ श्री राजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में द्वितीय उद्योत समाप्त ॥ लोचनम् प्राज्यं प्रोल्लासमात्रं सद्भेदेनासूत्रयते यया । वन्देऽभिनवगुप्तोऽहं पश्यन्तीं तामिदं जगत् ॥ ३३ ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोक- लोचने ध्वनिसङ्केते द्वितीय उद्योतः ॥ जो ( भगवती परमेश्वरी माया ) समस्त को सत्तत्त्व से भिन्न करके प्रतीतिमात्र निर्माण करती है, इस जगत् को देखती हुई ( पश्यन्ती ) उसको मैं अभिनवगुप्त वन्दना करता हूँ । श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित सहृदयालोकलोचन ध्वनिसङ्केत में दूसरा उद्योत समाप्त ।

तृतीय उद्योतः ध्वन्यालोकः एवं व्यङ्ग्यमुखेनैव ध्वनेः प्रदर्शिते सप्रभेदे स्वरूपे पुनर्व्यञ्जक- मुखेनैतत्प्रकाशयते— इस प्रकार व्यङ्ग्य के प्रकार से ही ध्वनि के सप्रभेद स्वरूप के प्रदर्शित करने पर पुनः व्यञ्जक के प्रकार से इसे प्रकाशित करते हैं— लोचनम् स्मरामि स्मरसंहारलीलापाटवशालिनः । प्रसह्य शम्भोर्देहार्धं हरन्तीं परमेश्वरीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गतिं कर्तुमाह वृत्तिकारः—एवमित्यादि। तत्र वाच्यमुखेन ताव- दविवक्षितवाच्यादयो भेदाः, वाच्यश्च यद्यपि व्यञ्जक एव। यथोक्तम्—‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति। ततश्च व्यञ्जकमुखेनापि भेद उक्तः, तथापि स वाच्योऽर्थो व्यङ्ग्यमुखेनैव भिद्यते। तथा ह्यविवक्षितो वाच्यो व्यङ्ग्येन न्यग्भावितः, विवक्षितान्यपरो वाच्य इति व्यङ्ग्यार्थप्रवण एवोच्यते इत्येवं मूलभेदयोरेव यथास्वमवान्तरभेदसहितयोर्व्यञ्जकरूपो योऽर्थः स व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षिताशरण- तयैव भेदमासादयति। अत एवाह—व्यङ्ग्यमुखेनेति। किं च यद्यप्यर्थो व्यञ्जक- स्तथापि व्यङ्ग्यतायोग्योऽप्यसौ भवतीति, शब्दस्तु न कदाचिद्व्यङ्ग्यः अपि तु व्यञ्जक एवेति। तदाह—व्यञ्जकमुखेनेति। न च वाच्यस्याविवक्षितादिरूपेण काम के संहार की लीला में सामर्थ्यशाली भगवान् शंकर का देहार्ध हरण करती हुई परमेश्वरी को स्मरण करता हूँ। अन्य उद्योत की प्रसङ्ग-सङ्गति करने के लिए वृत्तिकार कहते हैं—'इस प्रकार' इत्यादि। अविवक्षितवाच्य आदि भेद वाच्य के प्रकार से हैं, और वाच्य यद्यपि व्यञ्जक ही है, जैसे कहा है—'जहां अर्थ अथवा शब्द०'। तब तो व्यञ्जक के प्रकार से भी भेद कह दिया, तथापि वह वाच्य अर्थ व्यङ्ग्य के प्रकार से ही भिन्न हुआ है। जैसा कि अविवक्षित वाच्य व्यङ्ग्य के द्वारा न्यग्भावित (अप्रधानीकृत) है और विवक्षि- तान्यपरवाच्य, व्यङ्ग्यार्थप्रवण ही कहा जाता है, इस प्रकार यथावस्थित अवान्तर- भेदसहित मूलभेदों में ही व्यञ्जक रूप जो अर्थ है वह व्यङ्ग्य की मुखप्रेक्षिता की शरण के रूप से ही भेद प्राप्त करता है। इसीलिए कहते हैं—व्यङ्ग्य के प्रकार से—। और भी, यद्यपि अर्थ व्यञ्जक है, तथापि व्यङ्ग्यता के योग्य भी वह होता है, परन्तु शब्द कभी व्यङ्ग्य नहीं होता, बल्कि व्यञ्जक ही होता है। इस लिए कहते हैं—व्यञ्जक के प्रकार से—। ऐसी बात नहीं कि वाच्य का अविवक्षित आदि रूप से जो भेद है वहां

३१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः । अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यप्रकाशता । तदन्यस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य च ध्वनेः ॥ १ ॥ अविवक्षितवाच्य और उससे अन्य (विवक्षितान्यपरवाच्य का भेद) अनुरणन रूपव्यङ्ग्य (अर्थात् संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य) ध्वनि पदप्रकाश और वाक्यप्रकाश होते हैं ॥१॥ लोचनम् यो भेदस्तत्र सर्वथैव व्यञ्जकत्वं नास्तीति पुनःशब्देनाह । व्यञ्जकमुखेनापि भेदः सर्वथैव न न प्रकाशितः किन्तु प्रकाशितोऽप्यधुना पुनः शुद्धव्यञ्जकमु- खेन । तथाहि व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षितया विना पदं वाक्यं वर्णाः पदभागः सङ्घटना महावाक्यमिति स्वरूपत एव व्यञ्जकानां भेदः, न चैषामर्थवत्कदाचिदपि व्यङ्ग्यता सम्भवतीति व्यञ्जकैकनियतं स्वरूपं यत्तन्मुखेन भेदः प्रकाश्यत इति तात्पर्यम् । यस्तु व्याचष्टे—'व्यङ्ग्यानां वस्त्वलङ्काररसानां मुखेन' इति, स एवं प्रष्टव्यः—एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम् । वृत्तिकारेण तु दर्शितम् । न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति । ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ? न चैतावता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्गतिः कृता भवति । अविवक्षि- तवाच्यादीनामपि प्रकाराणां दर्शितत्वादित्यलं निजपूज्यजनसगोत्रैः साकं विवादेन । चकारः कारिकायां यथासङ्ख्यशङ्कानिवृत्त्यर्थः । तेनाविवक्षित- वाच्यो द्विप्रभेदोऽपि प्रत्येकं पदवाक्यप्रकाश इति द्विधा । तदन्यस्य विवक्षिता- सर्वथा ही व्यञ्जकत्व नहीं है, यह 'पुनः' शब्द से कहते हैं । व्यञ्जक के प्रकार से भी भेद को सर्वथा ही प्रकाशित नहीं किया है ऐसा नहीं, किन्तु प्रकाशित है, तथापि अब फिर से शुद्ध व्यञ्जक के प्रकार से (कहते हैं) । जैसा कि व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षिता के विना (बिना व्यङ्ग्य की अपेक्षा किए) पद, वाक्य, वर्ण, पदभाग, संघटना और महावाक्य यह स्वरूपतः ही व्यञ्जकों का भेद है, अर्थ की भांति इनकी व्यङ्ग्यता कभी सम्भव नहीं अत एव जिस कारण (इनका) स्वरूप व्यञ्जक मात्र में नियत है तदनुसार भेद प्रकाशित करते हैं, यह तात्पर्य है । परन्तु जो व्याख्यान करता है—'वस्तु, अलङ्कार, रस इन व्यङ्ग्यों के प्रकार से' उससे इस प्रकार पूछना चाहिए—(व्यङ्ग्य का) यह त्रिभेदत्व कारिकाकार ने नहीं किया है, परन्तु वृत्तिकार ने दिखाया है। अभी वृत्तिकार भेद का प्रकटन नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में 'यह किया है यह करने जा रहे हैं' इसकी सङ्गति कर्ता के भिन्न होने पर क्या होगी ? और इतने से सभी प्राचीन ग्रन्थों में सङ्गति नहीं की जा सकती । क्योंकि अविवक्षित वाच्य आदि के भी प्रकारों को दिखाया जा चुका है । इस प्रकार अपने पूज्य जन के बिरादरों के साथ विवाद व्यर्थ है ! 'कारिका' में 'और' ('च') शब्द यथासङ्ख्य की शङ्का के निवृत्त्यर्थ है । इस कारण दो भेदों वाला अविवक्षितवाच्य