भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

२९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कुचकलशन्यस्तकालागुरुपत्रभङ्गरचना मन्मथोद्दीपनकारिणीति चाटुकं कुर्वा- णश्चन्द्रवर्तिनी चेयं कुवलयदलश्यामलकान्तिरेवमेव करोतीति प्रतिवस्तूपमा- ध्वनिरपि । सुधाधामनीति चन्द्रपर्यायतयोपात्तमपि पदं सन्तापं विनिनीषुरित्यत्र हेतुतामपि व्यनक्तीति हेत्वलङ्कारध्वनिरपि । त्वदीयकुचशोभा मृगाङ्कशोभा च सह मदनमुद्दीपयत इति सहोक्तिध्वनिरपि । ‘त्वत्कुचसदृशश्चन्द्रश्चन्द्रसम- स्त्वत्कुचाभोगः’ इत्यर्थप्रतीतेरुपमेयोपमाध्वनिरपि । एवमन्येऽप्यत्र भेदाः शक्योत्प्रेक्षाः । महाकविवाचोऽस्याः कामधेनुत्वात् । यतः— हेलापि कस्यचिदचिन्त्यफलप्रसूत्यै कस्यापि नालमणवेऽपि फलाय यत्नः । दिग्दन्तिरोमचलनं धरणीं धुनोति खात्सम्पतन्नपि लतां चलयेन्न भृङ्गः ॥ एषां तु भेदानां संसृष्टित्वं सङ्करत्वं च यथायोगं चिन्त्यम् । अतिशयोक्ति- ध्वनिर्यथा ममैव— केलीकन्दलितस्य विभ्रममधोर्धुर्यं वपुस्ते दृशौ भङ्गीभङ्गुरकामकार्मुकमिदं भ्रूनर्मकर्मक्रमः । विधान से वासकसज्जा बनी हुई ( नायिका ) को पूर्ण चन्द्र के उदय के अवसर में दूती के द्वारा लाया गया प्रियतम तुम्हारे कुचकलश में लगी हुई पत्रभङ्गरचना काम को उद्दीप्त करने वाली है’ यह चाटु ( चापलूसी ) करते हुए और चन्द्र में रहने वाली यह कुवलयदल के समान श्यामल कान्ति इसी प्रकार ( काम को उद्दीप्त ) करती है, यह ‘प्रतिवस्तूपमा ध्वनि’ भी है । ‘सुधा का धाम’ यह चन्द्र के पर्याय के रूप में उपात्त होकर भी ‘सन्ताप को निवारण करना चाहता है’ इसमें हेतुभाव को व्यक्त करता है, इस प्रकार ‘हेतु’ अलङ्कार का ध्वनि भी है । तुम्हारे स्तनों की शोभा और मृगाङ्क चन्द्र की शोभा एक साथ काम को उद्दीप्त करती हैं, यह सहोक्तिध्वनि भी है । तुम्हारे स्तन के सदृश चन्द्र है और चन्द्र के सदृश तुम्हारा कुचाभोग है, इस अर्थ की प्रतीति होने से ‘उपमेयोपमाध्वनि’ भी है । इस प्रकार यहां अन्य भी भेद उत्प्रेक्षित हो सकते हैं । क्यों कि यह महाकवि की वाणी कामधेनु होती है । क्योंकि— किसी की लीला ( मात्र ) भी वह काम कर देती है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती और यत्न कुछ भी काम नहीं कर पाता । दिग्गज के रोम का कम्पन धरती को कम्पित कर डालता है, परन्तु भौंरा आकाश से गिर कर भी लता को नहीं हिला पाता । इन भेदों का संसृष्टित्व और सङ्करत्व यथोचित रूपसे समझ लेने चाहिए । ‘अति- शयोक्तिध्वनि’, जैसे मेरा ही— विलासी जनों की क्रीड़ा से अङ्कुरित होने वाले विभ्रमवसन्त के कार्यभार को धारण करने वाला शरीर तेरी आंखें हैं, यह कामदेव का रचना विशेष से टेढ़ा धनुष तेरी भौं के लीलाकर्म का प्रकार है । तेरे मुखकमल में विद्यमान आसव ( मद्य ) कुछ भी