ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २९७
लोचनम्
पुनरभिधायां वाच्यार्थबलादन्यापदेशता ध्वन्यते । यत्सौभाग्याभिमानपूर्णा सुकुमारपरिमलमालतीकुसुमसदृशी कुलवधूर्निर्व्याजप्रेमपरतया कृतकवैदग्ध्य- लब्धप्रसिद्ध्यतिशयानि शम्भलीकण्टकव्याप्तानि दूरामोदकेतकीवनस्थानीयानि वेश्याकुलानीतश्चेतश्च चञ्चूर्यमाणं प्रियतममुपालभते । अपह्नुतिध्वनिर्यथास्मदु- पाध्यायभट्टेन्दुराजस्य— यः कालागुरुपत्रभङ्गरचनावासैकसारायते गौराङ्गीकुचकुम्भभूरिसुभगाभोगे सुधाधामनि । विच्छेदानलदीपतोत्कवनिताचेतोधिवासोद्भवं सन्तापं विनिनीषुरेष विततैरङ्गैर्नताङ्गि स्मरः ॥ अत्र चन्द्रमण्डलमध्यवर्तिनो लक्ष्मणो वियोगाग्निपरिचितवनिताहृदयोदित- प्लोषमलीमसच्छविन्मन्मथाकारतयापह्नवौ ध्वन्यते । अत्रैव ससन्देहध्वनिः— यतश्चन्द्रवर्तिनस्तस्य नामापि न गृहीतम् । अपि तु गौराङ्गीस्तनाभोगस्थानीये चन्द्रमसि कालागुरुपत्रभङ्गविच्छित्त्यास्पदत्वेन यः सारतामुत्कृष्टतामाच- रतीति तन्न जानीमः किमेतद्वस्त्विति ससन्देहोऽपि ध्वन्यते । पूर्वमनङ्गीकृत- प्रणयामनुतप्तां विरहोत्कण्ठितां वल्लभागमनप्रतीक्षापरत्वेन कृतप्रसाधनादि- विधितया वासकसज्जीभूतां पूर्णचन्द्रोदयावसरे दूतीमुखानीतः प्रियतमस्त्वदीय- सकती । फिर अभिधा के समाप्त होने पर वाच्यार्थ के बल से अन्यापदेशता ध्वनित होती है कि सौभाग्य के अभिमान से भरी, सुकुमार एवं परिमल वाली मालती के पुष्प के सदृश कुलवधू अपने निश्छल प्रेम की तल्लीनता से प्रियतम को उलाहना देती है जो अपने कृत्रिम वैदग्ध्य से अतिशय सिद्धिप्राप्त, कुट्टनियों के कंटकों से भरे, एवं दूर तक फैली सुरभि वाले केतकी-वनों के सदृश वेश्याकुलों में इधर-उधर भटका करता है । अपह्नुतिध्वनि, जैसे हमारे उपाध्याय भट्ट इन्दुराज का— जो (कामदेव) गोरे अङ्गों वाली (नायिका) के समान विशेष विस्तार वाले सुधा के धाम, अर्थात् चन्द्रमा में कालागुरु की पत्रभङ्ग की रचना के रूप में सार (अर्थात् उत्कृष्ट) हो रहा है वह, हे नताङ्गि, वियोगाग्नि से प्रदीप्त उत्कण्ठित वनिताओं के चित्त में रहने से उत्पन्न सन्ताप को वितत अङ्गों से निवारण करना चाहता है । यहां चन्द्रमण्डल के बीच रहने वाले चिह्न का, वियोग की अग्नि में पके वनिता के हृदय से उत्पन्न ज्वाला से मलिन कान्ति वाले कामदेव के आकार के रूप में अपह्नव ध्वनित हो रहा है । यहां ही ‘ससन्देहध्वनि’ है—क्योंकि चन्द्र में रहने वाले उस (चिह्न) का नाम भी नहीं लिया है, बल्कि गोरे अङ्गों वाली के स्तन-विस्तार के सदृश चन्द्रमा में कालागुरु की पत्रभङ्ग-विच्छित्ति के आस्पद रूप में सारता अर्थात् उत्कृष्टता का आचरण कर रहा है, हम नहीं जानते कि यह क्या वस्तु है, इस प्रकार ‘ससन्देह’ भी ध्वनित हो रहा है। पहले प्रणय को स्वीकार नहीं किया, बाद में अनुतप्त, विरह से उत्कण्ठित, प्रिय के आगमन की प्रतीक्षा में संलग्न होने के कारण बनाव-सिंगार के