ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अङ्कुरितः पल्लवितः कोरकितः पुष्पितश्च हृदि मदनः ॥ अत्र हि यथोद्देशमनूद्देशे यच्चारुत्वमनुरणनरूपं मदनविशेषण- भूताङ्कुरितादिशब्दगतं तन्मदनसहकारयोस्तुल्ययोगितासमुच्चयलक्षणा- द्वाच्यादतिरिच्यमानमालक्ष्यते । एवमन्येऽप्यलङ्कारा यथायोगं योजनीयाः । अङ्कुरित, पल्लवित, कोरकित और पुष्पित हुआ । यहां पहले क्रम के अनुसार दूसरे क्रम में जो अनुरणनरूप चारुत्व मदन के विशेषभूत अङ्कुरित आदि शब्द में प्रतीत होता है वह मदन और आम्रवृक्ष के तुल्य- योगिता या समुच्चयरूप वाच्य से अधिक (चारुत्वपूर्ण) दिखाई देता है । इस प्रकार अन्य अलङ्कार भी, जहां जैसा उचित हो, योजन कर लेने चाहिए ॥ २७ ॥ लोचनम् एवमन्येऽपीति । सर्वेषामेवार्थालङ्काराणां ध्वन्यमानता दृश्यते । यथा च दीपकध्वनिः— मा भवन्तमनलः पवनो वा वारणो मदकलः परशुर्वा । वज्रमिन्द्रकरविप्रसृतं वा स्वस्ति तेऽस्तु लतया सह वृक्ष ॥ इत्यत्र बाधिष्टेति गोप्यमानादेव दीपकादत्यन्तस्नेहास्पदत्वप्रतिपत्त्या चारु- त्वनिष्पत्तिः । अप्रस्तुतप्रशंसाध्वनिरपि— दुण्डुल्लन्तो मरिहिसि कण्टकलिआईं केअइवणाईं । मालइकुसुमसरिच्छं भमर भमन्तो ण पाविहिसि ॥ प्रियतमेन साकमुद्याने विहरन्ती काचिन्नायिका भ्रमरमेवमाहेति भृङ्गस्या- भिधायां प्रस्तुतत्वमेव । न चामन्त्रणादप्रस्तुतत्वावगतिः, प्रत्युतामन्त्रणं तस्या मौग्ध्यविजृम्भितमिति अभिधया तावन्नाप्रस्तुतप्रशंसा समाप्या । समाप्तायां अन्य भी—। सभी अर्थालङ्कारों की ध्वन्यमानता देखी जाती है । जैसे दीपकध्वनि— हे वृक्ष तुम्हें अनल, या पवन, या मतवाला हाथी, या परशु या इन्द्र के हाथ से छोड़ा हुआ वज्र मत (बाधित करे), लता के साथ तुम्हारा कल्याण हो ! यहां 'बाधित करे' इस छिपाए जाते हुए ही 'दीपक' से अत्यन्त स्नेह के आस्पद होने की प्रतीति के द्वारा चारुत्व की निष्पत्ति होती है । 'अप्रस्तुतप्रशंसाध्वनि' भी— हे भ्रमर कंटीले केतकी के वनों को ढूंढ़ता-ढूंढ़ता तू मर जायगा पर घूमता हुआ मालती के पुष्प के सदृश को नहीं प्राप्त करेगा । प्रियतम के साथ उद्यान में विहार करती हुई किसी नायिका ने भौंरे से इस प्रकार कहा, इस प्रकार भौंरा अभिधा में प्रस्तुत ही है । आमन्त्रण के कारण (भौंरा के अप्रस्तुत होने का) ज्ञान नहीं होता (अर्थात् यह कहना कि भौंरा का आमंत्रण सम्भव नहीं अतः निश्चय ही वह अप्रस्तुत है, ऐसी बात नहीं) बल्कि आमन्त्रण उस (नायिका) की मुग्धता का विजृम्भित है इसलिए अभिधा से अप्रस्तुतप्रशंसा समाप्त नहीं की जा