भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 680 में से

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पृष्ठ 355

द्वितीय उद्योतः २९५ ध्वन्यालोकः अत्र वधूभिः सह वलभौरिसेवन्तेति वाक्यार्थप्रतीतेरनन्तरं वध्व इव वलभ्य इति श्लेषप्रतीतिरशब्दाप्यर्थसामर्थ्यान्मुख्यत्वेन वर्तते । यथासङ्ख्यध्वनिर्यथा— अङ्कुरितः पल्लवितः कोरकितः पुष्पितश्च सहकारः । यहां 'वधुओं के साथ वलभियों की सेवा की' इस वाक्यार्थ की प्रतीति के अनन्तर 'वधुओं के समान वलभी' इस श्लेष की प्रतीति शब्दजनित न होकर भी अर्थसामर्थ्य से मुख्य रूप में होती है । यथासंख्यध्वनि, जैसे-- आम्रवृक्ष अङ्कुरित, पल्लवित, कोरकित और पुष्पित हुआ और हृदय में मदन लोचनम् एव वध्व इव वलभ्य इत्यभिदधतापि वृत्तिकृतोपमाध्वनिरिति नोक्तम् । श्लेष- स्यैवात्र मूलत्वात् । समा इति हि यदि स्पष्टं भवेत्तदोपमाया एव स्पष्टत्वाच्छ्ले- षस्तदाक्षिप्तः स्यात् । सममिति निपातोऽञ्जसा सहार्थवृत्तिर्व्यञ्जकत्वबलेनैव क्रियाविशेषणत्वेन शब्दश्लेषतामेति । न च तेन विनाभिधाया अपरिपुष्टा काचित् । अत एव समाप्तयामेवाभिधायां सहृदयैरेव स द्वितीयोऽर्थोऽपृथक्प्र- यत्नेनैवावगम्यः । यथोक्तं प्राक्—'शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव' इत्यादि । एतच्च सर्वोदाहरणेष्वनुसर्तव्यम् । 'पीनश्चैत्रो दिवा नात्ति' इत्यत्राभिधैवापर्यवसितेति सैव स्वार्थनिर्वाहायार्थान्तरं शब्दान्तरं वाकर्षतीत्यनुमानस्य श्रुतार्थापत्तेर्वा तार्किकमीमांसकयोर्न ध्वनिप्रसङ्ग इत्यलं बहुना । तदाह-अशब्दापीति । ध्वन्यमान ही है । इसी लिए 'वधुओं के समान वल भी' यह कहते हुए भी वृत्तिकार ने 'उपमाध्वनि' यह नहीं कहा, क्यों कि यहां श्लेष ही मूल है । यदि ('समं' के स्थान पर ) 'समाः' यह स्पष्ट हो जाय तब उपमा के स्पष्ट हो जाने से श्लेष उसके द्वारा आक्षिप्त होता । 'समं' यह निपात झटिति 'साथ' अर्थ का बोध करके व्यञ्जकत्व के बल से ही क्रियाविशेषण होने के कारण शब्दश्लेषत्व को प्राप्त कर लेना है । उसके बिना अभिधा का कोई अपरिपोष नहीं होता । अतएव अभिधा के समाप्त होने पर ही सहृदयों के ही वह दूसरा अर्थ बिना पृथक् प्रयत्न के अवगत होता है । जैसा कि पहले कहा है— 'शब्द और अर्थ के शासन के ज्ञानमात्र से ही०' इत्यादि । यह सब उदाहरणों में समझ लेना चाहिए । 'मोटा चैत्र ( नाम का व्यक्ति ) दिन में भोजन नहीं करता है' यहां अभिधा ही पर्यवसित न होकर अपने अर्थ के निर्वाह के लिए ( रात्रिभोजनरूप ) दूसरे अर्थ या ( 'रात्रि में भोजन करता है' ) इस रूप शब्द को आकृष्ट करती है, इस प्रकार अनुमान के अथवा श्रुतार्थापत्ति के होने से तार्किक या मीमांसक के मत में ध्वनि का प्रसङ्ग नहीं है, इत्यलं बहुना । तो कहते हैं—शब्दजनित न होकर भी—। इस प्रकार