भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 680 में से

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पृष्ठ 354

२९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शब्दार्थव्यवहारे च प्रसिद्धिरैव प्रमाणम् । श्लेषध्वनिर्यथा— रम्या इति प्राप्तवतीः पताकाः रागं विविक्ता इति वर्धयन्तीः । यस्यामसेवन्त नमद्वलीकाः समं वधूभिर्वलभीर्युवानः ॥ शब्द और अर्थ के व्यवहार में प्रसिद्धि ही प्रमाण है । श्लेषध्वनि, जैसे— जिस (द्वारका नगरी) में युवक लोग सुन्दर होने के कारण प्रसिद्धि को प्राप्त, एकान्त या पवित्र होने के कारण राग को बढ़ाने वाली एवं झुकी जाती हुई त्रिवलि वाली वधुओं के साथ, रम्य होने के कारण पताकाओं से युक्त, एकान्त होने से राग (सम्भोग की अभिलाष) बढ़ाने वाली, झुके हुए छज्जों वाली वलभियों (निजी वासगृहों) का सेवन करते थे । लोचनम् शङ्कयाह—शब्दार्थेति । पताका ध्वजपटान् प्राप्तवती । रम्या इति हेतोः । पताकाः प्रसिद्धीः प्राप्तवतीः । किमाकाराः प्रसिद्धीः रम्या इत्येवमाकाराः । विविक्ता जनसङ्कुलत्वाभावादित्यतो हेतो रागं सम्भोगाभिलाषं वर्धयन्तीः । अन्ये तु रागं चित्रशोभामिति । तथा रागममुरागं वर्धयन्तीः । यतो हेतोः विविक्ता विभक्ताङ्ग्यो लटभाः याः । नमन्ति वलीकानि छदिपर्यन्तभागा यासु । नमन्त्यो वल्लयस्त्रिवलीललक्षणा यासाम् । सममिति सहेत्यर्थः । ननु सम- शब्दात्तुल्यार्थोऽपि प्रतीतः । सत्यम् ; सोऽपि श्लेषबलात् । श्लेषश्च नाभिधा- वृत्तेराक्षिप्तः, अपि त्वर्थसौन्दर्यबलादेवेति सर्वथा ध्वन्यमान एव श्लेषः । अत नहीं ठहरा । यह भी असम्बद्ध है यह आशङ्का करके कहते हैं—शब्द और अर्थ—। पताका अर्थात् ध्वजपटों को प्राप्त करती हुई । रम्य होने के कारण । पताका अर्थात् प्रसिद्धियां प्राप्त करती हुई । किस आकार की प्रसिद्धियां ? रम्य आकार की । विविक्त अर्थात् लोगों को भीड़-भाड़ न होने के कारण राग अर्थात् सम्भोग की अभिलाषा बढ़ाती हुई । दूसरे (कहते हैं) राग अर्थात् चित्रशोभा । उस प्रकार राग अर्थात् अनुराग बढ़ाती हुई । जिस कारण से विविक्त अर्थात् विभक्त अङ्गों वाली लटभाएं (सुन्दरियां) । झुक रहे हैं वलीक अर्थात् छज्जे जिनमें । झुक रही हैं वलियां अर्थात् त्रिवलियां जिनकी । समं (साथ) अर्थात् साथ । शंका करते हैं कि 'समं' शब्द 'तुल्य' अर्थ में भी मालूम है ? (समाधान करते हैं कि) ठीक है, वह भी श्लेष के बल से (अर्थात् यहां 'समं' का तुल्य अर्थ भी श्लेष के बल से है प्रतीत होगा) । और श्लेष (यहां) अभिधावृत्ति से आक्षिप्त नहीं, अपितु अर्थसौन्दर्य के बल से ही (आक्षिप्त है), इस लिए सर्वथा श्लेष