भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

: द्वितीय उद्योतः २९९ ध्वन्यालोकः एवमलङ्कारध्वनिमार्गं व्युत्पाद्य तस्य प्रयोजनवत्तां ख्यापयि- तुमिदमुच्यते— इस प्रकार अलङ्कारध्वनि का मार्ग बता कर उसे सप्रयोजन बताने के लिए यह कहते हैं— लोचनम् आपातेऽपि विकारकारणमहो वक्त्राम्बुजन्मासवः सत्यं सुन्दरि वेधसस्त्रिजगतीसारस्त्वमेकाकृतिः ॥ अत्र हि मधुमासमदनासवानां त्रैलोक्ये सुभगत्वान्योन्यं परिपोषकत्वेन। ते तु त्वयि लोकोत्तरेण वपुषा सम्भूय स्थिता इत्यतिशयोक्तिर्ध्वन्यते। आपातेऽ- पि विकारकारणमित्यास्वादपरम्पराक्रियां विना विकारात्मनः फलस्य सम्प- त्तिरिति विभावनाध्वनिरपि। विभ्रममधोर्धुर्यमिति तुल्ययोगिताध्वनिरपि। एवं सर्व्वलङ्काराणां ध्वन्यमानत्वमस्तीति मन्तव्यम्। न तु यथा कैश्चिन्नियतविषयी- कृतम्। यथायोगमिति (पृ० २९६)। क्वचिदलङ्कारः क्वचिद्वस्तु व्यञ्जकमित्यर्थो योजनीय इति ॥ ननूक्तास्तावच्चिरन्तनैरलङ्कारास्तेषां तु भवता यदि व्यङ्ग्यत्वं प्रदर्शितं किमियतेत्याशङ्क्याह—एवमित्यादि। येषामलङ्काराणां वाच्यत्वेन शरीरीकरणं शरीरभूतात्प्रस्तुतादर्थान्तरभूततया अशरीराणां कटकादिस्थानीयानां शरीरता- आस्वाद कर लेने पर (विभिन्न) विकारों को उत्पन्न कर देता है, ठीक है, हे सुन्दरि, तेरे एक रूप में विधाता के तीनों जगत् का सार है। यहां वसन्त, काम और मद्य ये तीनों त्रैलोक्य में एक दूसरे के परिपोषक होने के कारण सुभग हैं। वे तुझमें लोकोत्तर शरीर से मिल कर विद्यमान हैं, यह अतिशयोक्ति ध्वनित हो रही है। 'कुछ आस्वाद कर लेने पर ही विकारों को उत्पन्न कर देता है' यहां लगातार आस्वाद के बिना हुए ही विकार रूप फल का लाभ है, इस प्रकार विभावनाध्वनि भी है। 'विभ्रम-वसन्त के कार्यभार को धारण करने वाला' यहां 'तुल्य- योगिताध्वनि' भी है। इस प्रकार यह मानना चाहिए कि सब अलङ्कार ध्वनित होते हैं, ऐसा नहीं कि किसी ने विषय नियत कर दिया है (कि सिर्फ इतने ही अलङ्कार ध्वनित होते हैं, अन्य नहीं)। यथोचित रूप से। कहीं अलङ्कार व्यञ्जक होता है तो कहीं वस्तु' यह अर्थ लगाना चाहिए ॥ २७ ॥ प्राचीनोंने अलङ्कार कहे हैं, यदि उन (अलङ्कारों) का व्यङ्ग्यत्व आपने दिखाया तो इतने से क्या ? यह आशङ्का करके कहते हैं—'इस प्रकार' इत्यादि। जिन अलं- कारों का वाच्य रूप से शरीर रूप होना (शरीरीकरण) अर्थात् शरीरभूत प्रस्तुत से अर्थान्तर रूप होने के कारण 'कटक' आदि की भांति शरीर भिन्न का शरीरतापादन