ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शरीरीकरणं येषां वाच्यत्वे न व्यवस्थितम् । तेऽलङ्काराः परां छायां यान्ति ध्वन्यङ्गतां गतः ॥ २८ ॥ ध्वन्याङ्गता चोभाभ्यां प्रकाराभ्यां व्यञ्जकत्वेन व्यङ्ग्यत्वेन च । तत्रेह प्रकरणाद्व्यङ्ग्यत्वेनेत्यवगन्तव्यम् । व्यङ्ग्यत्वेऽप्यलङ्काराणां प्राधा- न्यविवक्षायामेव सत्यां ध्वनावन्तःपातः । इतरथा तु गुणीभूतव्यङ्ग्य- त्वं प्रतिपादयिष्यते ॥ २८ ॥ वाच्य रूप से जिनका शरीर रूप होना माना जाता है, वे अलङ्कार ध्वनि के अङ्ग होकर अधिक शोभा लाभ करते हैं ॥ २८ ॥ ध्वन्यङ्गता दो प्रकार से होती है, व्यञ्जक होने से और व्यङ्ग्य होने से । उनमें यहां प्रकरणवश 'व्यङ्ग्य होने' से ध्वन्यङ्गता समझनी चाहिए । व्यङ्ग्य होने पर भी जब अलङ्कारों के प्राधान्य की विवक्षा होगी तभी ध्वनि में ( उनका ) अन्तःपात होगा । अन्यथा, गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व का प्रतिपादन करेंगे ॥ २८ ॥ लोचनम् पादनं व्यवस्थितं सुकवीनामयत्नसम्पाद्यतया । यदि वा वाच्यत्वे सति येषां शरीरतापादनमपि न व्यवस्थितं दुर्घटमिति यावत् । तेऽलङ्कारा ध्वनेर्व्यापारस्य काव्यस्य वाऽङ्गतां व्यङ्ग्यरूपतया गताः सन्तः परां दुर्लभां छायां कान्तिमा- त्भरूपतां यान्ति । एतदुक्तं भवति—सुकविर्विदग्धपुरन्ध्रीवद्भूषणं यद्यपि श्लिष्टं योजयति, तथापि शरीरतापत्तिरेवास्य कष्टसम्पाद्या कुङ्कुमपीतिकाया इव । आत्मतायास्तु का सम्भावनापि । एवम्भूता चेयं व्यङ्ग्यता या अप्रधानभूतापि वाच्यमात्रालङ्कारेभ्य उत्कर्षमलङ्काराणां वितरति । बालक्रीडायामपि राजत्वमिवेत्यमुमर्थं मनसि कृत्याह-इतरथा त्विति ॥२८॥ सुकवियों के द्वारा अयत्नसम्पाद्य होने के कारण व्यवस्थित है । अथवा यदि वाच्य होने पर जिनका शरीरतापादन भी नहीं बन सकता । वे अलङ्कार ध्वनि के व्यापार की अथवा काव्य की व्यङ्ग्य के प्रकार से अङ्गता को प्राप्त होते हुए दुर्लभ छाया अर्थात् कान्ति प्राप्त करते हैं, आत्मा रूप हो जाते हैं। बात यह कही गई—यद्यपि सुकवि विदग्ध पुरन्ध्री की भांति श्लिष्ट ( एक में एक सक्त ) योजना करता था, तथापि कुंकुम के पीलापन की भांति इस ( उपमा आदि अलङ्कार ) का शरीरतापादन की बहुत कष्ट से हो पाता है । इस प्रकार की यह व्यङ्ग्यता, जो अप्रधानभूत होकर भी वाच्यमात्र जो अलङ्कार है उनसे अलङ्कारों का ज्यादा उत्कर्ष वितरण करती है। 'लड़कों की क्रीड़ा में राजपने की भांति' यह बात मन में रख कर कहते हैं— अन्यथ —॥ २८ ॥