भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 361

द्वितीय उद्योतः ३०१ ध्वन्यालोकः अङ्गित्वेन व्यङ्ग्यतायामपि, अलङ्काराणां द्वयी गतिः- कदाचि- द्वस्तुमात्रेण व्यज्यन्ते, कदाचिदलङ्कारेण । तत्र— व्यज्यन्ते वस्तुमात्रेण यदालङ्कृतयस्तया । ध्रुवं ध्वन्यङ्गता तासाम् अत्र हेतुः— काव्यवृत्तिस्तदाश्रया ॥ २९ ॥ यस्मात्तत्र तथाविधव्यङ्ग्यालङ्कारपरत्वेनैव काव्यं प्रवृत्तम् । अन्यथा तु तद्वाक्यमात्रमेव स्यात् ॥ २९ ॥ तासामेवालङ्कृतीनाम्— अलङ्कारान्तरव्यङ्ग्यभावे अङ्गी (अर्थात् प्रधान) रूप से व्यङ्ग्य होने पर भी अलङ्कारों की दो गति है— कभी वस्तुमात्र से व्यञ्जित होते हैं, कभी अलङ्कार से । उनमें— जब वस्तुमात्र से अलङ्कार व्यञ्जित होते हैं तब उनकी ध्वन्यङ्गता ध्रुव है— यहां कारण— काव्य की प्रवृत्ति उसके ही आश्रित है ॥ २९ ॥ क्योंकि वहां उस प्रकार के व्यङ्ग्य अलङ्कार के तात्पर्य से ही काव्य प्रवृत्त है । अन्यथा वह वाक्यमात्र ही होता । उन्हीं अलङ्कारों की— अलङ्कारान्तर के व्यङ्ग्य होने पर लोचनम् तत्रेति । द्वय्यां गतौ सत्याम् । अत्र हेतुरित्ययं वृत्तिग्रन्थः । काव्यस्य कवि- व्यापारस्य वृत्तिस्तदाश्रयादलङ्कारप्रवणा यतः । अन्यथेति । यदि न तत्परत्व- मित्यर्थः । तेन तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यता नैव शङ्क्येति तात्पर्यम् । तासामेवा- लङ्कृतीनामित्ययं पठिष्यमाणकारिकोपस्कारः । पुनरिति कारिकामध्य उप- स्कारः । ध्वन्यङ्गतेति । ध्वनिभेदत्वमित्यर्थः । उनमें—। दो स्थितियों के होने पर । 'यहां कारण' यह वृत्तिग्रन्थ है । क्योंकि काव्य की अर्थात् कवि के व्यापार की प्रवृत्ति उसके आश्रित अर्थात् अलङ्कारप्रवण है । अन्यथा—अर्थात् यदि तात्पर्य न हो । इसलिए वहां गुणीभूतव्यङ्ग्य की शङ्का (सम्भावना) नहीं करनी चाहिए यह मतलब है । 'उन्हीं अलङ्कारों की' यह आगे पढ़ी जाने वाली कारिका का उपस्कार है । 'फिर' यह कारिका के बीच में उपस्कार है ।