ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पुनः, ध्वन्यङ्गता भवेत् । चारुत्वोत्कर्षतो व्यङ्ग्यप्राधान्यं यदि लक्ष्यते ॥ ३० ॥ उक्तं ह्येतत्—'चारुत्वोत्कर्षनिबन्धना वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधा- न्यविवक्षा' इति । वस्तुमात्रव्यङ्ग्यत्वे चालङ्काराणामनन्तरोपदर्शि- तेभ्य एवोदाहरणेभ्यो विषय उन्नेयः । तदेवमर्थमात्रेणालङ्कारविशेष- रूपेण वार्थेनार्थान्तरस्यालङ्कारस्य वा प्रकाशने चारुत्वोत्कर्षनिबन्धने सति प्राधान्येऽर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यो निरवगन्तव्यः ॥ ३० ॥ फिर; ध्वन्यङ्गता होती है । यदि चारुत्व के उत्कर्ष के कारण व्यङ्ग्य का प्राधान्य लक्षित होता है ॥ ३० ॥ क्योंकि यह पहले कह चुके हैं—'वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य की विवक्षा चारुत्व के उत्कर्ष के कारण होती है।' अलङ्कारों के वस्तुमात्र से व्यङ्ग्य होने पर अभी दिखाए हुए ही उदाहरणों से विषय समझ लेना चाहिए । तो इस प्रकार अर्थमात्र से अथवा अलङ्कारविशेषरूप अर्थ से अर्थान्तर के अथवा अलङ्कार के प्रकाशन में चारुत्व के उत्कर्ष के कारण प्राधान्य होने पर अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य वाला ध्वनि समझना चाहिए ॥ ३० ॥ लोचनम् व्यङ्ग्यप्राधान्यमिति । अत्र हेतुः—चारुत्वोत्कर्षत इति । यदीति । तदप्राधान्ये तु वाच्यालङ्कार एव प्रधानमिति गुणीभूतव्यङ्ग्यतेति भावः । नन्वलङ्कारो वस्तुना व्यज्यते अलङ्कारान्तरेण च व्यज्यत इत्यत्रोदाहरणानि किमिति न दर्शितानीत्याशङ्क्याह—वस्त्विति । एतत्संक्षिप्योपसंहरति—तदेवमिति । व्यङ्ग्यस्य व्यञ्जकस्य च प्रत्येकं वस्त्वलङ्काररूपतया द्विप्रकारत्वाच्चतुर्विधोऽय- मर्थशक्त्युद्भव इति तात्पर्यम् ॥ २९-३० ॥ ध्वन्यङ्गता—। अर्थात् ध्वनि का भेद होना । व्यङ्ग्य का प्राधान्य—। इसमें कारण है—चारुत्व के उत्कर्ष के कारण । यदि—। भाव यह कि उसका ( अर्थात् व्यङ्ग्य का ) प्राधान्य न होने पर वाच्यालङ्कार ही प्रधान है, इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्यता होगी । अलङ्कार वस्तु से व्यञ्जित होता है और अलङ्कारान्तर से व्यञ्जित होता है, इनमें क्यों नहीं उदाहरण दिखाए हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—वस्तु०—। इसे संक्षेप करके उपसंहार करते हैं—तो इस प्रकार—। व्यङ्ग्य के और व्यञ्जक के प्रत्येक वस्तुरूप और अलङ्काररूप होने के कारण दो प्रकार होने से यह अर्थशक्त्युद्भव चार प्रकार का होता है यह तात्पर्य है ॥ २९-३० ॥