भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 680 में से

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पृष्ठ 363

द्वितीय उद्योतः ३०३ ध्वन्यालोकः एवं ध्वनेः प्रभेदान् प्रतिपाद्य तदाभासविवेकं कर्तुमुच्यते— यत्र प्रतीयमानोऽर्थः प्रक्लिष्टत्वेन भासते । वाच्यस्याङ्गतया वापि नास्यासौ गोचरो ध्वनेः ॥ ३१ ॥ द्विविधोऽपि प्रतीयमानः स्फुटोऽस्फुटश्च । तत्र य एव स्फुटः शब्दशक्त्यार्थशक्त्या वा प्रकाशते स एव ध्वनेर्मार्गो नेतरः । इस प्रकार ध्वनि के प्रभेदों का प्रतिपादन करके उसके आभास का विवेक करने के लिए कहते हैं— जहां प्रतीयमान अर्थ प्रक्लिष्ट रूप से अथवा वाच्य के अङ्ग रूप से भासित होता है वह इस ध्वनि का गोचर नहीं है ॥ ३१ ॥ प्रतीयमान दो प्रकार का है—स्फुट और अस्फुट । उनमें जो ही स्फुट होकर शब्दशक्ति अथवा अर्थशक्ति से प्रकाशित होता है वही ध्वनि का मार्ग है, इतर नहीं। लोचनम् एवमिति । अविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्य इति द्वौ मूलभेदौ । आद्यस्य द्वौ भेदौ—अत्यन्ततिरस्कृतवाच्योऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्यश्च । द्विती- यस्य द्वौ भेदौ—अलक्ष्यक्रमोऽनुरणनरूपश्च । प्रथमोऽनन्तभेदः । द्वितीयो द्विविधः—शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च । पश्चिमस्त्रिविधः—कविप्रौढोक्तिकृत- शरीरः कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिकृतशरीरः स्वतःसम्भवो च । ते च प्रत्येकं व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोरुक्तभेदनयेन चतुर्थेति द्वादशविधोऽर्थशक्तिमूलः । आद्याश्च- त्वारो भेदा इति षोडश मुख्यभेदाः । ते च पदवाक्यप्रकाशत्वेन प्रत्येकं द्विविधा वक्ष्यन्ते । अलक्ष्यक्रमस्य तु वर्णपदवाक्यसङ्घटनाप्रबन्धप्रकाशयत्वेन पञ्चत्रिंश- इस प्रकार—। अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दो मूलभेद हैं। प्रथम के दो भेद—अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य । द्वितीय के दो भेद—अलक्ष्यक्रम और अनुरणनरूप । प्रथम के भेद अनन्त हैं। दूसरा दो प्रकार का है—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल । अन्तवाला (अर्थात् अर्थशक्तिमूल ) तीन प्रकार का है—कवि की प्रौढोक्ति से बना, कविद्वारा निबद्ध वक्ता की प्रौढोक्ति से बना और स्वतःसम्भवौ । और ये प्रत्येक व्यङ्ग्य और व्यञ्जक के कहे हुए प्रकार के अनुसार ( अर्थात् वस्तु से वस्तु, वस्तु से अलङ्कार, अलङ्कार से वस्तु और अलङ्कार से अलङ्कार) चार प्रकार के होकर, बारह प्रकार का अर्थशक्तिमूल होता है । पहले के चार भेद ( अर्थात् शब्दशक्त्युत्थ के वस्तु तथा अलङ्कार रूप दो भेद, उभयशक्त्युत्थ का एक और असंलक्ष्यक्रम का एक इस प्रकार सब मिल कर ) सोलह मुख्य भेद हैं। वे पदप्रकाश और वाक्यप्रकाश के रूप से प्रत्येक दो प्रकार के कहेंगे । अलक्ष्यक्रम के वर्णप्रकाश, ( पदप्रकाश, वाक्यप्रकाश ) संघटनाप्रकाश और प्रबन्धप्रकाश होने के कारण पैंतीस भेद

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