भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 680 में से

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पृष्ठ 364

३०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्फुटोऽपि योऽभिधेयस्याङ्गत्त्वेन प्रतीयमानोऽवभासते सोऽस्यानुरणन- रूपव्यङ्ग्यस्य ध्वनेरगोचरः । यथा— कमलाअरा णँ मलिआ हंसा उड्डाविआ ण अ पिउच्छा । केण वि गामतडाए अब्भं उत्ताणं फलिहम् ॥ अत्र हि प्रतीयमानस्य मुग्धवध्वा जलधरप्रतिबिम्बदर्शनस्य वाच्याङ्गत्त्वमेव । एवंविधे विषयेऽन्यत्रापि यत्र व्यङ्ग्यापेक्षया वाच्यस्य चारुत्वोत्कर्षप्रतीत्या प्राधान्यमवसीयते, तत्र व्यङ्ग्यस्याङ्गत्त्वेन स्फुट होकर भी जो प्रतीयमान अभिधेय (वाच्य) के अङ्गरूप से भासित होता है वह इस अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि का गोचर नहीं । जैसे— (अरी सखी,) न तालाब गन्दा हुआ है न सहसा हंस ही उड़ा दिए, किसी ने गांव के तालाब में मेघ को उलटा करके डाल दिया है ! यहां प्रतीयमान मुग्धवधू (अनबूझ नवेली) द्वारा मेघ की छाया का दर्शन वाच्य का अङ्ग ही है । इस प्रकार के विषय में अन्यत्र भी जहां व्यङ्ग्य की अपेक्षा वाच्य के चारुत्वोत्कर्ष की प्रतीति से प्राधान्य मालूम पड़ता है, वहां व्यङ्ग्य के अङ्ग लोचनम् द्वेधाः । तदाभासेभ्यो ध्वन्याभासेभ्यो विवेको विभागः । अस्येत्यात्मभूतस्य ध्वनेरसौ काव्यविशेषो न गोचरः, न विषय इत्यर्थः । कमलाकरा न मलिता हंसा उड्डायिता न च सहसा । केनापि ग्रामतडागेऽभ्रमुत्तानितं क्षिप्तम् ॥ इति च्छाया । अन्ये तु पिउच्छा पितृष्वसः इत्थमामन्त्र्यते । केनापि अतिनिपुणेन । वाच्याङ्गत्वमेवेति । वाच्येनैव हि विस्मयविभावरूपेण मुग्धिमातिशयः प्रतीयत इति वाच्यादेव चारुत्वसम्पत् । वाच्यं तु स्वात्मोपपत्तयेऽर्थान्तरं स्वोपकार- वाञ्छया व्यनक्ति । हुए । उनके आभासों अर्थात् ध्वनि के आभासों से विवेक अर्थात् विभाग । इसका अर्थात् आत्मभूत ध्वनि का वह काव्यविशेष गोचर नहीं अर्थात् विषय नहीं । परन्तु दूसरे (के अनुसार) 'पिउच्छा' अर्थात् 'बुआ' (पिता की बहन) इस प्रकार आमन्त्रण किया गया है । किसी ने अर्थात् अति चालाक ने । वाच्य का अङ्ग ही—। विस्मय-विभाव रूप वाच्य से ही अतिशय मुग्धिमा (सुन्दरता) प्रतीत होती है, इसलिए वाच्य से ही चारुत्वसम्पत्ति है । क्योंकि वाच्य अपनी उपपत्ति के लिए अर्थान्तर को अपने उपकार की वाञ्छा से व्यक्त करता है ।