ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः ३०५ ध्वन्यालोकः प्रतीतेर्ध्वनेरविषयत्वम् । यथा— वाणीरकुडङ्गोड्डीणसउणिकोलाहलं सुणन्तीए । घरकम्मवावडाए बहुए सीअन्ति अङ्गाइं ॥ एवंविधो हि विषयः प्रायेण गुणीभूतव्यङ्ग्यस्योदाहरणत्वेन निर्देक्ष्यते । यत्र तु प्रकरणादिप्रतिपत्त्या निर्धारितविशेषो वाच्योऽर्थः रूप से प्रतीत होने के कारण ध्वनि का विषय नहीं है । जैसे— वेतस लता ( बेंत ) की घनी झाड़ से उड़े हुए पंछियों की आवाज सुनती हुई, घर के काम-काज में फंसी बहू के अङ्ग शिथिल पड़े जा रहे हैं । इस प्रकार का विषय प्रायः करके गुणीभूतव्यङ्ग्य के उदाहरण के रूप में निर्देश करेंगे। परन्तु जहां प्रकरण आदि के ज्ञान से विशेष निर्धारित होने पर वाच्य अर्थ लोचनम् वेतसलतागहनोड्डीनशकुनिकोलाहलं शृण्वत्याः । गृहकर्मव्यापृताया वध्वाः सीदन्त्यङ्गानि ॥ इति च्छाया । अत्र दत्तसङ्केतचौर्यकामुकरतसमुचितस्थानप्राप्तिर्ध्वन्यमाना वाच्यमेवोप- स्कुरुते । तथा हि गृहकर्मव्यापृताया इत्यन्यपराया अपि, वध्वा इति सातिश- यलज्जापारतन्त्र्यबद्धाया अपि, अङ्गानीत्येकमपि न तादृगङ्गं यद्गाम्भीर्याद्वहि- त्त्ववशेन संवरीतुं पारितम्, सीदन्तीत्यास्तां गृहकर्मसम्पादनं स्वात्मानमपि धर्तुं न प्रभवन्तीति । गृहकर्मयोगेन स्फुटं तथा लक्ष्यमाणानीति । अस्मादेव वाच्यात्सातिशयमदनपरवशताप्रतीतेश्चारुत्वसम्पत्तिः । यत्र त्विति । प्रकरणामा- दिर्यस्य शब्दान्तरसन्निधानसामर्थ्यलिङ्गादेस्तदवगमादेव यत्रार्थो निश्चितसमस्त- स्वभावः । पुनर्वाच्यः पुनरपि स्वशब्देनोक्तोऽत एव स्वात्मावगतेः सम्पन्न- यहां दत्तसङ्केत चौर्यकामुक का रत के योग्य स्थान में पहुंचना यह ध्वनित होता हुआ वाच्य को ही उपस्कृत करता है । जैसा कि 'घर के कामकाज में लगी हुई' अर्थात् अन्य ( कार्य ) में लगी हुई भी, 'बहू की' अर्थात् अतिशय लज्जा और पारतन्त्र्य में बंधी हुई भी, ( सब ) अङ्ग, अर्थात् एक भी अङ्ग उस प्रकार नहीं था जो गाम्भीर्य से आकारगोपन के ढङ्ग से संवरण किया जा सके, 'शिथिल पड़े जा रहे हैं' घर का काम- काज करना तो दूर रहे, अपने आपको सम्हाल भी नहीं पा रहे हैं । घर के काम-काज में उस प्रकार स्पष्ट लक्षित नहीं होते । इसी वाच्य से सातिशय मदनपारवश्य की प्रतीति होने से चारुता सम्पन्न होती है । परन्तु जहां— । प्रकरण आदि में है जिसके अर्थात् शब्दान्तरसन्निधान, सामर्थ्य, लिङ्ग आदि के अवगत होने से ही जहां अर्थ के समस्त २० ध्व०