भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 366

३०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पुनः प्रतीयमानाङ्गत्वेनैवावभासते सोऽस्यैवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य ध्वनेर्मार्गः । यथा— उच्चिणसु पडिअ कुसुमं मा धुण सेहालिअं हलिअसुहे ! अह दे विसमविरावो ससुरेण सुओ वलअसद्दो ॥ अत्र ह्यविनयपतिना सह रममाणा सखी बहिःश्रुतवलयकलकलया पुनः प्रतीयमान के अङ्ग रूप में ही भासित होता है वह इसी अनुरणन रूप व्यङ्ग्य ध्वनि का मार्ग है । जैसे— अरी हलवाहे की पतोहू, गिरे हुए फूल चुन, हरसिंगार को मत हिला । विषम ( अनिष्टजनक ) परिणाम वाली तेरे वलय की आवाज को ससुर ने सुन लिया है । यहां अविनयपति ( जार ) के साथ रमण करती हुई सखी ( नायिका ) को बाहर से वलय की आवाज सुन कर सखी सावधान करती है । यह ( व्यङ्ग्य अर्थ ) लोचनम् पूर्वत्वादेव तावन्मात्रपर्यवसायी न भवति तथाविधश्च प्रतीयमानस्याङ्गतामे- तीति सोऽस्य ध्वनेर्विषय इत्यनेन व्यङ्ग्यतात्पर्यनिबन्धनं स्फुटं वदता व्यङ्ग्य- गुणीभावे त्वेतद्विपरीतमेव निबन्धनं मन्तव्यमित्युक्तं भवति । उच्चिनु पतितं कुसुमं मा धुनीहि शेफालिकां हालिकस्नुषे । एष ते विषमविपाकः श्वशुरेण श्रुतो वलयशब्दः ॥ इति च्छाया । यतः श्वशुरः शेफालिकालतिकां प्रयत्नै रक्षंस्तस्या आकर्षणधूननादिना कुप्यति । तेनात्र विषमपरिपाकत्वं मन्तव्यम् । अन्यथा स्वोक्त्यैव व्यङ्ग्याक्षेपः स्यात् । अत्र च 'कस्स वा ण होइ रोसो' इत्येतदनुसारेण व्याख्या कर्तव्या । स्वभाव का निश्चय हो जाता है । पुनः वाच्य अर्थात् फिर भी अपने शब्द से उक्त, अतएव अपनी अवगति हो जाने के कारण पहले ही सम्पन्न हो जाने के कारण ही उतने मात्र में पर्यवसन्न होने वाला नहीं होता है और उस प्रकार का ( वह वाच्य अर्थ ) प्रतीयमान का अङ्ग हो जाता है, अतः वह ध्वनि का विषय है, इस ( कथन ) से व्यङ्ग्य में तात्पर्य का निबन्धन स्पष्ट कहते हुए यह कहा कि व्यङ्ग्य के गुणीभाव में इसके विपरीत निबन्धन मानना चाहिए । क्यों कि ससुर हरसिंगार की लत्तर की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करता है, आकर्षण-धूनन आदि से कुपित होता है । इस लिए यहां परिणाम में विषम ( अर्थात् अनिष्टकर ) सम- झना चाहिए । अन्यथा अपनी उक्ति से ही व्यङ्ग्य का आक्षेप होगा । यहां 'कस्स वा ण होइ रोसो०' के अनुसार व्याख्या करनी चाहिए । वाच्य अर्थ की प्रतिपत्ति रूप लाभ के