ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः ३०७ ध्वन्यालोकः सख्या प्रतिबोध्यते । एतदपेक्षणीयं वाच्यार्थप्रतिपत्तये । प्रतिपन्ने च वाच्येऽर्थे तस्याविनयप्रच्छादनतात्पर्येणाभिधीयमानत्वात्पुनर्व्यङ्ग्या- ङ्गत्वमेवेत्यस्मिन्ननुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनावन्तर्भावः ॥ ३१ ॥ एवं विवक्षितवाच्यस्य ध्वनेस्तदाभासविवेके प्रस्तुते सत्यविव- क्षितवाच्यस्यापि तं कर्तुमाह— अव्युत्पत्तेरशक्तेर्वा निबन्धो यः स्खलद्गतेः । शब्दस्य स च न ज्ञेयः सूरिभिर्विषयो ध्वनेः ॥ ३२ ॥ वाच्यार्थ को समझने के लिए अपेक्षित है, और वाच्य अर्थ के मालूम हो जाने पर उस ( वाच्यार्थ ) के अविनय के प्रच्छादन के लिए कहे जाने के कारण पुनः व्यङ्ग्य का अङ्ग ही है, इस प्रकार इस अनुरणन रूप व्यङ्ग्य ध्वनि में अन्तर्भाव है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार विवक्षित वाच्य ध्वनि के और उसके आभास के विवेक प्रस्तुत होने पर अविवक्षितवाच्य का भी वह करने के लिए कहते हैं— अव्युत्पत्ति अथवा अशक्ति के कारण स्खलद्गति शब्द का जो प्रयोग है उसे विद्वानों को ध्वनि का विषय नहीं समझना चाहिए ॥ ३२ ॥ लोचनम् वाच्यार्थस्य प्रतिपत्तये लाभाय एतद्व्यङ्ग्यमपेक्षणीयम् । अन्यथा वाच्योऽर्थो न लभ्येत । स्वतःसिद्धतया अवचनीय एव सोऽर्थः स्यादिति यावत् । नन्वेवं व्यङ्ग्यस्योपस्कारता प्रत्युतोक्ता भवेदित्याशङ्क्याह—प्रतिपन्ने चेति । शब्दे- नोक्त इति यावत् ॥ ३१ ॥ तदाभासविवेके प्रस्तुत इति सप्तमी हेतौ । तदाभासविवेकप्रस्तावलक्षणात्प्र- सङ्गादिति यावत् । कस्य तदाभास इत्यपेक्षायामाह—विवक्षितवाच्यस्येति । स्पष्टे तु व्याख्याने प्रस्तुत इत्यसङ्गतम् । परिसमाप्तौ हि विवक्षिताभिधेयस्य तदा- लिए यह व्यङ्ग्य अपेक्षणीय है, अन्यथा वाच्य अर्थ लब्ध नहीं होगा। मतलब कि स्वतः- सिद्ध होने के कारण वह अर्थ अवचनीय ही होगा । तब तो इस प्रकार प्रत्युत व्यङ्ग्य की उपस्कारता कही गई, यह आशंका करके कहते हैं—वाच्य अर्थ के प्रतिपन्न—। मतलब कि शब्द से उक्त होने पर ॥ ३१ ॥ उसके आभास के विवेक के प्रस्तुत होने पर यहां हेतु में सप्तमी है । मतलब कि उसके आभास के विवेक के प्रस्ताव रूप प्रसङ्ग से । किसका 'उसका आभास' इस अपेक्षा में कहते हैं—विवक्षितवाच्य का—। व्याख्यान स्पष्ट होने पर 'प्रस्तुत' यह कहना असङ्गत है । क्यों कि परिसमाप्ति में विवक्षितवाच्य का उसके आभास का विवेक