भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 368

३०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्खलद्गतेरुपचरितस्य शब्दस्याव्युत्पत्तेरशक्तेर्वा निबन्धो यः स च न ध्वनेर्विषयः । स्खलद्गति अर्थात् उपचरित शब्द का अव्युत्पत्ति अथवा अशक्ति से जो प्रयोग है और वह ध्वनि का विषय नहीं । लोचनम् भासविवेकः । न त्वधुना प्रस्तुततः । नाप्युत्तरकालमनुबध्नाति । स्खलद्गतेरिति । गौणस्य लाक्षणिकस्य वा शब्दस्येत्यर्थः । अव्युत्पत्तिरनुप्रासादिनिबन्धनतात्प- र्यप्रवृत्तिः । यथा— प्रेङ्खत्प्रेमप्रबन्धप्रचुरपरिचये प्रौढसीमन्तिनीनां चित्ताकाशावकाशे विहरति सततं यः स सौभाग्यभूमिः । अत्रानुप्रासरसिकतया प्रेङ्खदिति लाक्षणिकः, चित्ताकाश इति गौणः प्रयोगः कविना कृतोऽपि न ध्वन्यमानरूपसुन्दरप्रयोजनांशपर्यवसायी । अशक्ति- र्वृत्तपरिपूरणाद्यसामर्थ्यम् । यथा— विषमकाण्डकुटुम्बकसञ्चयप्रवर वारिनिधौ पतता त्वया । चलतरङ्गविघूर्णितभाजने विचलतात्मनि कुड्चमये कृता ॥ अत्र प्रवरान्तमाद्यपदं चन्द्रमस्युपचरितम् । भाजनमित्याशये, कुड्चमय है, न कि अभी प्रस्तुत है । न कि आगे तक अनुबन्ध करता है । स्खलद्गति—अर्थात् गौण या लाक्षणिक शब्द का । अव्युत्पत्ति अर्थात् अनुप्रास आदि के प्रयोग के तात्पर्य से प्रवृत्ति । जैसे— प्रौढ़ सीमन्तिनियों के स्फुरित होते हुए ( प्रेङ्खत् ) प्रेम-प्रबन्ध के प्रचुर परिचय वाले चित्त के आकाश में जो सतत विहार करता है, वह सौभाग्यभूमि है । यहां अनुप्रास के रसिक होने के कारण 'प्रेङ्खत्' यह लाक्षणिक और 'चित्त का आकाश' यह गौण प्रयोग कवि के द्वारा किया गया भी ध्वन्यमान रूप सुन्दर प्रयोजन के अंश में पर्यवसायी नहीं है । अशक्ति अर्थात् वृत्तपूर्ति आदि असामर्थ्य । जैसे— हे विषमबाण ( कामदेव ) के कुटुम्बसमूह में प्रवर ( अर्थात् चन्द्र ), समुद्र में गिरते हुए तुमने चंचल तरंग की भांति विघूर्णित भाजन वाले, कुड्यमय अपने आप में विच- लता कर दी है । यहां 'प्रवर' तक प्रथम पद चन्द्रमा में उपचरित है । 'भाजन' आशय में, 'कुड्य-