ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः ३०९ ध्वन्यालोकः यतः— सर्वेष्वेव प्रभेदेषु स्फुटत्वेनावभासनम् । यद्व्यङ्ग्यस्याङ्गिभूतस्य तत्पूर्णं ध्वनिलक्षणम् ॥ ३३ ॥ क्योंकि— सभी प्रभेदों में स्फुट रूप से जो अङ्गिभूत व्यङ्ग्य का अवभासित होना है वह ध्वनि का पूर्ण लक्षण है ॥ ३३ ॥ लोचनम् इति च विचले । अत्रैतत् कामपि कान्ति न पुष्यति, ऋते वृत्तपूरणात् । स चेति । प्रथमोद्द्योते यः प्रसिद्धयनुरोधप्रवर्तितव्यवहाराः कवय इत्यत्र ‘वदति बिसिनीपत्रशयनम्’ इत्यादि भाक्त उक्तः । स न केवलं ध्वनेर्न विषयो यावदय- मन्योऽपीति चशब्दस्यार्थः । उक्तमेव ध्वनिस्वरूपं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदतीत्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति—यत इति । अवभास- नमिति । भावानयने द्रव्यानयनमिति न्यायादवभासमानं व्यङ्ग्यम् । ध्वनि- लक्षणं ध्वनेः स्वरूपं पूर्णम् , अवभासनं वा ज्ञानं तद्ध्वनेर्लक्षणं प्रमाणं, तच्च पूर्णं, पूर्णध्वनिस्वरूपनिवेदकत्वात् । अथ वा ज्ञानमेव ध्वनिलक्षणम्, लक्षणस्य ज्ञानपरिच्छेद्यत्वात् । वृत्तावेवकारेण ततोऽन्यस्य चाभासरूपत्वमेवेति सूचयता तदाभासविवेकहेतुभावो यः प्रक्रान्तः स एव निर्वाहित इति शिवम् ॥ ३३ ॥ मय’ यह विचल में । यहां यह किसी कान्ति का पोषण नहीं करता, बावजूद छन्दःपूर्ति के । और वह—। प्रथम उद्योत में जो ‘प्रसिद्धि के अनुरोध से व्यवहार प्रवृत्त करने वाले कवि’ इस प्रसंग में ‘कमलिनी के पत्र का शयन कहता है’ इत्यादि भाक्त कहा है । न केवल वही ध्वनि का विषय नहीं है, बल्कि अन्य भी, यह ‘और’ ( च ) शब्द का अर्थ है । कहे हुए ही ध्वनिस्वरूप को उसके आभास के विवेक के हेतु रूप से कारिकाकार अनुवाद करते हैं, इस अभिप्राय से वृत्तिकार उपस्कार देते हैं—क्योंकि—। अवभासित होना—। ‘भाव के आनयन में द्रव्य का आनयन होता है’ इस न्याय के अनुसार अव- भासमान व्यङ्ग्य ( अवभासन का अर्थ है ) ध्वनि का लक्षण अर्थात् ध्वनि का स्वरूप पूर्ण है, अथवा अवभासन अर्थात् ज्ञान वह ध्वनि का लक्षण अर्थात् प्रमाण है, और वह पूर्ण है, क्यों कि पूर्ण ध्वनि के स्वरूप को निवेदन करता है । अथवा ज्ञान ही ध्वनि का लक्षण है, क्यों कि लक्षण ज्ञान का परिच्छेद्य होता है । वृत्ति में ‘ही’ ( एवकार ) से ‘उससे इतर का आभासरूपत्व ही है’ यह सूचित करते हुए उसके आभास के विवेक का हेतुभाव जो आरम्भ किया वही निर्वाह किया । शिवम् ।