ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तच्चोदाहृतविषयमेव ॥ ३३ ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके द्वितीय उद्योतः ॥ उसका विषय उदाहृत ही है ॥ ३३ ॥ श्री राजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में द्वितीय उद्योत समाप्त ॥ लोचनम् प्राज्यं प्रोल्लासमात्रं सद्भेदेनासूत्रयते यया । वन्देऽभिनवगुप्तोऽहं पश्यन्तीं तामिदं जगत् ॥ ३३ ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोक- लोचने ध्वनिसङ्केते द्वितीय उद्योतः ॥ जो ( भगवती परमेश्वरी माया ) समस्त को सत्तत्त्व से भिन्न करके प्रतीतिमात्र निर्माण करती है, इस जगत् को देखती हुई ( पश्यन्ती ) उसको मैं अभिनवगुप्त वन्दना करता हूँ । श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित सहृदयालोकलोचन ध्वनिसङ्केत में दूसरा उद्योत समाप्त ।