भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 680 में से

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तृतीय उद्योतः ध्वन्यालोकः एवं व्यङ्ग्यमुखेनैव ध्वनेः प्रदर्शिते सप्रभेदे स्वरूपे पुनर्व्यञ्जक- मुखेनैतत्प्रकाशयते— इस प्रकार व्यङ्ग्य के प्रकार से ही ध्वनि के सप्रभेद स्वरूप के प्रदर्शित करने पर पुनः व्यञ्जक के प्रकार से इसे प्रकाशित करते हैं— लोचनम् स्मरामि स्मरसंहारलीलापाटवशालिनः । प्रसह्य शम्भोर्देहार्धं हरन्तीं परमेश्वरीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गतिं कर्तुमाह वृत्तिकारः—एवमित्यादि। तत्र वाच्यमुखेन ताव- दविवक्षितवाच्यादयो भेदाः, वाच्यश्च यद्यपि व्यञ्जक एव। यथोक्तम्—‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति। ततश्च व्यञ्जकमुखेनापि भेद उक्तः, तथापि स वाच्योऽर्थो व्यङ्ग्यमुखेनैव भिद्यते। तथा ह्यविवक्षितो वाच्यो व्यङ्ग्येन न्यग्भावितः, विवक्षितान्यपरो वाच्य इति व्यङ्ग्यार्थप्रवण एवोच्यते इत्येवं मूलभेदयोरेव यथास्वमवान्तरभेदसहितयोर्व्यञ्जकरूपो योऽर्थः स व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षिताशरण- तयैव भेदमासादयति। अत एवाह—व्यङ्ग्यमुखेनेति। किं च यद्यप्यर्थो व्यञ्जक- स्तथापि व्यङ्ग्यतायोग्योऽप्यसौ भवतीति, शब्दस्तु न कदाचिद्व्यङ्ग्यः अपि तु व्यञ्जक एवेति। तदाह—व्यञ्जकमुखेनेति। न च वाच्यस्याविवक्षितादिरूपेण काम के संहार की लीला में सामर्थ्यशाली भगवान् शंकर का देहार्ध हरण करती हुई परमेश्वरी को स्मरण करता हूँ। अन्य उद्योत की प्रसङ्ग-सङ्गति करने के लिए वृत्तिकार कहते हैं—'इस प्रकार' इत्यादि। अविवक्षितवाच्य आदि भेद वाच्य के प्रकार से हैं, और वाच्य यद्यपि व्यञ्जक ही है, जैसे कहा है—'जहां अर्थ अथवा शब्द०'। तब तो व्यञ्जक के प्रकार से भी भेद कह दिया, तथापि वह वाच्य अर्थ व्यङ्ग्य के प्रकार से ही भिन्न हुआ है। जैसा कि अविवक्षित वाच्य व्यङ्ग्य के द्वारा न्यग्भावित (अप्रधानीकृत) है और विवक्षि- तान्यपरवाच्य, व्यङ्ग्यार्थप्रवण ही कहा जाता है, इस प्रकार यथावस्थित अवान्तर- भेदसहित मूलभेदों में ही व्यञ्जक रूप जो अर्थ है वह व्यङ्ग्य की मुखप्रेक्षिता की शरण के रूप से ही भेद प्राप्त करता है। इसीलिए कहते हैं—व्यङ्ग्य के प्रकार से—। और भी, यद्यपि अर्थ व्यञ्जक है, तथापि व्यङ्ग्यता के योग्य भी वह होता है, परन्तु शब्द कभी व्यङ्ग्य नहीं होता, बल्कि व्यञ्जक ही होता है। इस लिए कहते हैं—व्यञ्जक के प्रकार से—। ऐसी बात नहीं कि वाच्य का अविवक्षित आदि रूप से जो भेद है वहां