ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
द्वितीय उद्योतः ३०९ ध्वन्यालोकः यतः— सर्वेष्वेव प्रभेदेषु स्फुटत्वेनावभासनम् । यद्व्यङ्ग्यस्याङ्गिभूतस्य तत्पूर्णं ध्वनिलक्षणम् ॥ ३३ ॥ क्योंकि— सभी प्रभेदों में स्फुट रूप से जो अङ्गिभूत व्यङ्ग्य का अवभासित होना है वह ध्वनि का पूर्ण लक्षण है ॥ ३३ ॥ लोचनम् इति च विचले । अत्रैतत् कामपि कान्ति न पुष्यति, ऋते वृत्तपूरणात् । स चेति । प्रथमोद्द्योते यः प्रसिद्धयनुरोधप्रवर्तितव्यवहाराः कवय इत्यत्र ‘वदति बिसिनीपत्रशयनम्’ इत्यादि भाक्त उक्तः । स न केवलं ध्वनेर्न विषयो यावदय- मन्योऽपीति चशब्दस्यार्थः । उक्तमेव ध्वनिस्वरूपं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदतीत्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति—यत इति । अवभास- नमिति । भावानयने द्रव्यानयनमिति न्यायादवभासमानं व्यङ्ग्यम् । ध्वनि- लक्षणं ध्वनेः स्वरूपं पूर्णम् , अवभासनं वा ज्ञानं तद्ध्वनेर्लक्षणं प्रमाणं, तच्च पूर्णं, पूर्णध्वनिस्वरूपनिवेदकत्वात् । अथ वा ज्ञानमेव ध्वनिलक्षणम्, लक्षणस्य ज्ञानपरिच्छेद्यत्वात् । वृत्तावेवकारेण ततोऽन्यस्य चाभासरूपत्वमेवेति सूचयता तदाभासविवेकहेतुभावो यः प्रक्रान्तः स एव निर्वाहित इति शिवम् ॥ ३३ ॥ मय’ यह विचल में । यहां यह किसी कान्ति का पोषण नहीं करता, बावजूद छन्दःपूर्ति के । और वह—। प्रथम उद्योत में जो ‘प्रसिद्धि के अनुरोध से व्यवहार प्रवृत्त करने वाले कवि’ इस प्रसंग में ‘कमलिनी के पत्र का शयन कहता है’ इत्यादि भाक्त कहा है । न केवल वही ध्वनि का विषय नहीं है, बल्कि अन्य भी, यह ‘और’ ( च ) शब्द का अर्थ है । कहे हुए ही ध्वनिस्वरूप को उसके आभास के विवेक के हेतु रूप से कारिकाकार अनुवाद करते हैं, इस अभिप्राय से वृत्तिकार उपस्कार देते हैं—क्योंकि—। अवभासित होना—। ‘भाव के आनयन में द्रव्य का आनयन होता है’ इस न्याय के अनुसार अव- भासमान व्यङ्ग्य ( अवभासन का अर्थ है ) ध्वनि का लक्षण अर्थात् ध्वनि का स्वरूप पूर्ण है, अथवा अवभासन अर्थात् ज्ञान वह ध्वनि का लक्षण अर्थात् प्रमाण है, और वह पूर्ण है, क्यों कि पूर्ण ध्वनि के स्वरूप को निवेदन करता है । अथवा ज्ञान ही ध्वनि का लक्षण है, क्यों कि लक्षण ज्ञान का परिच्छेद्य होता है । वृत्ति में ‘ही’ ( एवकार ) से ‘उससे इतर का आभासरूपत्व ही है’ यह सूचित करते हुए उसके आभास के विवेक का हेतुभाव जो आरम्भ किया वही निर्वाह किया । शिवम् ।
३१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तच्चोदाहृतविषयमेव ॥ ३३ ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके द्वितीय उद्योतः ॥ उसका विषय उदाहृत ही है ॥ ३३ ॥ श्री राजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में द्वितीय उद्योत समाप्त ॥ लोचनम् प्राज्यं प्रोल्लासमात्रं सद्भेदेनासूत्रयते यया । वन्देऽभिनवगुप्तोऽहं पश्यन्तीं तामिदं जगत् ॥ ३३ ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोक- लोचने ध्वनिसङ्केते द्वितीय उद्योतः ॥ जो ( भगवती परमेश्वरी माया ) समस्त को सत्तत्त्व से भिन्न करके प्रतीतिमात्र निर्माण करती है, इस जगत् को देखती हुई ( पश्यन्ती ) उसको मैं अभिनवगुप्त वन्दना करता हूँ । श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित सहृदयालोकलोचन ध्वनिसङ्केत में दूसरा उद्योत समाप्त ।
तृतीय उद्योतः ध्वन्यालोकः एवं व्यङ्ग्यमुखेनैव ध्वनेः प्रदर्शिते सप्रभेदे स्वरूपे पुनर्व्यञ्जक- मुखेनैतत्प्रकाशयते— इस प्रकार व्यङ्ग्य के प्रकार से ही ध्वनि के सप्रभेद स्वरूप के प्रदर्शित करने पर पुनः व्यञ्जक के प्रकार से इसे प्रकाशित करते हैं— लोचनम् स्मरामि स्मरसंहारलीलापाटवशालिनः । प्रसह्य शम्भोर्देहार्धं हरन्तीं परमेश्वरीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गतिं कर्तुमाह वृत्तिकारः—एवमित्यादि। तत्र वाच्यमुखेन ताव- दविवक्षितवाच्यादयो भेदाः, वाच्यश्च यद्यपि व्यञ्जक एव। यथोक्तम्—‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति। ततश्च व्यञ्जकमुखेनापि भेद उक्तः, तथापि स वाच्योऽर्थो व्यङ्ग्यमुखेनैव भिद्यते। तथा ह्यविवक्षितो वाच्यो व्यङ्ग्येन न्यग्भावितः, विवक्षितान्यपरो वाच्य इति व्यङ्ग्यार्थप्रवण एवोच्यते इत्येवं मूलभेदयोरेव यथास्वमवान्तरभेदसहितयोर्व्यञ्जकरूपो योऽर्थः स व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षिताशरण- तयैव भेदमासादयति। अत एवाह—व्यङ्ग्यमुखेनेति। किं च यद्यप्यर्थो व्यञ्जक- स्तथापि व्यङ्ग्यतायोग्योऽप्यसौ भवतीति, शब्दस्तु न कदाचिद्व्यङ्ग्यः अपि तु व्यञ्जक एवेति। तदाह—व्यञ्जकमुखेनेति। न च वाच्यस्याविवक्षितादिरूपेण काम के संहार की लीला में सामर्थ्यशाली भगवान् शंकर का देहार्ध हरण करती हुई परमेश्वरी को स्मरण करता हूँ। अन्य उद्योत की प्रसङ्ग-सङ्गति करने के लिए वृत्तिकार कहते हैं—'इस प्रकार' इत्यादि। अविवक्षितवाच्य आदि भेद वाच्य के प्रकार से हैं, और वाच्य यद्यपि व्यञ्जक ही है, जैसे कहा है—'जहां अर्थ अथवा शब्द०'। तब तो व्यञ्जक के प्रकार से भी भेद कह दिया, तथापि वह वाच्य अर्थ व्यङ्ग्य के प्रकार से ही भिन्न हुआ है। जैसा कि अविवक्षित वाच्य व्यङ्ग्य के द्वारा न्यग्भावित (अप्रधानीकृत) है और विवक्षि- तान्यपरवाच्य, व्यङ्ग्यार्थप्रवण ही कहा जाता है, इस प्रकार यथावस्थित अवान्तर- भेदसहित मूलभेदों में ही व्यञ्जक रूप जो अर्थ है वह व्यङ्ग्य की मुखप्रेक्षिता की शरण के रूप से ही भेद प्राप्त करता है। इसीलिए कहते हैं—व्यङ्ग्य के प्रकार से—। और भी, यद्यपि अर्थ व्यञ्जक है, तथापि व्यङ्ग्यता के योग्य भी वह होता है, परन्तु शब्द कभी व्यङ्ग्य नहीं होता, बल्कि व्यञ्जक ही होता है। इस लिए कहते हैं—व्यञ्जक के प्रकार से—। ऐसी बात नहीं कि वाच्य का अविवक्षित आदि रूप से जो भेद है वहां
३१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः । अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यप्रकाशता । तदन्यस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य च ध्वनेः ॥ १ ॥ अविवक्षितवाच्य और उससे अन्य (विवक्षितान्यपरवाच्य का भेद) अनुरणन रूपव्यङ्ग्य (अर्थात् संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य) ध्वनि पदप्रकाश और वाक्यप्रकाश होते हैं ॥१॥ लोचनम् यो भेदस्तत्र सर्वथैव व्यञ्जकत्वं नास्तीति पुनःशब्देनाह । व्यञ्जकमुखेनापि भेदः सर्वथैव न न प्रकाशितः किन्तु प्रकाशितोऽप्यधुना पुनः शुद्धव्यञ्जकमु- खेन । तथाहि व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षितया विना पदं वाक्यं वर्णाः पदभागः सङ्घटना महावाक्यमिति स्वरूपत एव व्यञ्जकानां भेदः, न चैषामर्थवत्कदाचिदपि व्यङ्ग्यता सम्भवतीति व्यञ्जकैकनियतं स्वरूपं यत्तन्मुखेन भेदः प्रकाश्यत इति तात्पर्यम् । यस्तु व्याचष्टे—'व्यङ्ग्यानां वस्त्वलङ्काररसानां मुखेन' इति, स एवं प्रष्टव्यः—एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम् । वृत्तिकारेण तु दर्शितम् । न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति । ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ? न चैतावता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्गतिः कृता भवति । अविवक्षि- तवाच्यादीनामपि प्रकाराणां दर्शितत्वादित्यलं निजपूज्यजनसगोत्रैः साकं विवादेन । चकारः कारिकायां यथासङ्ख्यशङ्कानिवृत्त्यर्थः । तेनाविवक्षित- वाच्यो द्विप्रभेदोऽपि प्रत्येकं पदवाक्यप्रकाश इति द्विधा । तदन्यस्य विवक्षिता- सर्वथा ही व्यञ्जकत्व नहीं है, यह 'पुनः' शब्द से कहते हैं । व्यञ्जक के प्रकार से भी भेद को सर्वथा ही प्रकाशित नहीं किया है ऐसा नहीं, किन्तु प्रकाशित है, तथापि अब फिर से शुद्ध व्यञ्जक के प्रकार से (कहते हैं) । जैसा कि व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षिता के विना (बिना व्यङ्ग्य की अपेक्षा किए) पद, वाक्य, वर्ण, पदभाग, संघटना और महावाक्य यह स्वरूपतः ही व्यञ्जकों का भेद है, अर्थ की भांति इनकी व्यङ्ग्यता कभी सम्भव नहीं अत एव जिस कारण (इनका) स्वरूप व्यञ्जक मात्र में नियत है तदनुसार भेद प्रकाशित करते हैं, यह तात्पर्य है । परन्तु जो व्याख्यान करता है—'वस्तु, अलङ्कार, रस इन व्यङ्ग्यों के प्रकार से' उससे इस प्रकार पूछना चाहिए—(व्यङ्ग्य का) यह त्रिभेदत्व कारिकाकार ने नहीं किया है, परन्तु वृत्तिकार ने दिखाया है। अभी वृत्तिकार भेद का प्रकटन नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में 'यह किया है यह करने जा रहे हैं' इसकी सङ्गति कर्ता के भिन्न होने पर क्या होगी ? और इतने से सभी प्राचीन ग्रन्थों में सङ्गति नहीं की जा सकती । क्योंकि अविवक्षित वाच्य आदि के भी प्रकारों को दिखाया जा चुका है । इस प्रकार अपने पूज्य जन के बिरादरों के साथ विवाद व्यर्थ है ! 'कारिका' में 'और' ('च') शब्द यथासङ्ख्य की शङ्का के निवृत्त्यर्थ है । इस कारण दो भेदों वाला अविवक्षितवाच्य
तृतीय उद्योतः ३१३ ध्वन्यालोकः ( अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्ये प्रभेदे पदप्रकाशता यथा महर्षेर्व्यासस्य—'सप्तैताः समिधः श्रियः', यथा वा कालिदासस्य—'कः अविवक्षितवाच्य के अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे महर्षि व्यास का—'ये सात सम्पत्ति की समिधाएं हैं'; अथवा जैसे कालिदास का—'(तुम्हारे) लोचनम् भिधेयस्य सम्बन्धी यो भेदः क्रमद्योत्यो नाम स्वभेदसहितः सोऽपि प्रत्येकं द्विधैव । अनुरणनेन रूपं रूपणसादृश्यं यस्य तादृग्व्यङ्ग्यं यत्तस्येत्यर्थः । मह- र्षेरित्यनेन तदनुसन्धत्ते यत्प्रागुक्तम्, अथ च रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये दृश्यत इति । धृतिः क्षमा दया शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा । मित्राणां चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः ॥ समिच्छब्दार्थस्यात्र सर्वथा तिरस्कारः, असम्भवात् । समिच्छब्देन च व्यङ्ग्योऽर्थोऽनन्यापेक्षलक्ष्म्युद्दीपनक्षमत्वं सप्तानां वक्तृभिप्रेतं ध्वनितम् । यद्यपि—'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्याद्युदाहरणादप्ययमर्थो लभ्यते, तथापि प्रसङ्गाद्बहुलक्ष्यव्यापित्वं दर्शयितुमुदाहरणान्तराण्युक्तानि । अत्र च वाच्यस्या- त्यन्ततिरस्कारः पूर्वोक्तमनुसृत्य योजनीयः किं पुनरुक्तेन । सन्नद्धपदेन चात्रा- सम्भवत्स्वार्थेनोद्यतत्वं लक्षयता वक्तुरभिप्रेता निष्करुणकत्वाप्रतिकार्यत्वापेक्षा- भी प्रत्येक पदप्रकाश और वाक्यप्रकाश रूप से दो प्रकार का है । उससे अन्य विव- क्षितवाच्य का सम्बन्धी जो अपने भेदों सहित 'क्रमद्योत्य' नाम का भेद है, वह भी प्रत्येक दो प्रकार का ही है । अनुरणन से रूप अर्थात् रूपणसादृश्य जिसका हो उस प्रकार के उस (व्यङ्ग्य) का । 'महर्षि का' इस के द्वारा उसका अनुसन्धान करते हैं जिसे पहले कह चुके हैं—'और भी, रामायण, महाभारत प्रभृति लक्ष्य में देखा जाता है' । धृति, क्षमा, दया, शौच, कारुण्य, अनिष्ठुर वाणी और मित्रों से अद्रोह, ये सात सम्पत्ति की समिधाएँ हैं । 'समित्' (समिधा) शब्द के अर्थ का यहाँ सर्वथा तिरस्कार है, क्यों कि (वह अर्थ) असम्भव है । और 'समित्' (समिधा) शब्द से व्यङ्ग्य अर्थ 'अन्य की अपेक्षा न करके सातों का सम्पत्ति के उद्दीपन में क्षमत्व' (यह अर्थ) वक्ता के अभिप्रेत रूप में ध्वनित होता है । यद्यपि 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादि उदाहरण से भी यह अर्थ प्राप्त होता है तथापि प्रसङ्ग से बहुत लक्ष्यों में व्यापित्व दिखाने के लिए अन्य उदाहरण कहे हैं । और यहाँ वाच्य का अत्यन्ततिरस्कार पहले कहे हुए के अनुसार लगा लेना चाहिए, पुनः कहने से क्या लाभ ! 'सन्नद्ध' पद, जिसका अपना अर्थ सम्भव नहीं हो रहा है, 'उद्यतत्व' (अथवा उद्धतत्व) को लक्षित करता हुआ, वक्ता के अभिप्रेत निष्करुणकत्व, अप्रतीकार्यत्व (जिसका कोई प्रतिकार नहीं हो
( इति त्रीणि पदानि अत्यन्ततिरस्कृतव्यङ्ग्ययुक्तानि ) ३१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायाम्', यथा वा- 'किमिव हि मधू- राणां मण्डनं नाकृतीनाम्', एतेषूदाहरणेषु 'समिध' इति 'सन्नद्ध' इति 'मधुराणा'मिति च पदानि व्यञ्जकत्वाभिप्रायेणैव कृतानि । तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्ये यथा- 'रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं सन्नद्ध होने पर कौन विरहविधुर पत्नी की उपेक्षा करता है ?'; अथवा, जैसे— 'मधुर आकृतियों का मण्डन क्या नहीं है !'; इन उदाहरणों में 'समिधा' 'सन्नद्ध' और 'मधुर' ये पद व्यञ्जकत्व के अभिप्राय से ही किए गए हैं । उसी के ही अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य में, जैसे— 'हे प्रिये, जीवित रहने के लोभी लोचनम् पूर्वकारित्वादयो ध्वन्यन्ते । तथैव मधुरशब्देन सर्वविषयरञ्जकत्वतर्पकत्वादिकं लक्षयता सातिशायाभिलाषविषयत्वं नात्राश्चर्यमिति वक्तुरभिप्रेतं ध्वन्यते । तस्यैवेति । अविवक्षितवाच्यस्य यो द्वितीयो भेदस्तत्रेत्यर्थः । 'प्रत्याख्यानरुषः कृतं समुचितं क्रूरेण ते रक्षसा सोढं तच्च तथा त्वया कुलजनो धत्ते यथोच्चैः शिरः । व्यर्थं सम्प्रति बिभ्रता धनुरिदं त्वद्व्यापदः साक्षिणा' इति । रक्षःस्वभावादेव यः क्रूरोऽनतिलङ्घ्यशासनत्वदुर्मदत या च प्रसद्य निराक्रि- यमाणः क्रोधान्धः तस्यैतत्तावत्स्वचित्तवृत्तिसमुचितमनुष्ठानं यन्मूर्धकर्तनं नाम, माऽन्योऽपि कश्चिन्ममाज्ञां लङ्घयिष्यतीति । त इति यथा तादृगपि त्वया न गणितस्तस्यास्तवेत्यर्थः । तदपि तथा अविकारेणोत्सवापत्तिबुद्ध्या नेत्रविस्फा- सकता ), अपेक्षापूर्वकत्व ( जो बिना सोचे-विचारे कर बैठता है ) आदि अर्थों को ध्वनित करता है । उसी प्रकार 'मधुर' शब्द सभी विषयों का रञ्जकत्व, तर्पकत्व आदि अर्थ को लक्षित करता हुआ, 'अतिशय अभिलाषा का विषय होना यहाँ आश्चर्य नहीं' यह वक्ता का अभिप्रेत ( अर्थ ) ध्वनित करता है । उसीके - । अर्थात् अविवक्षित- वाच्य का जो दूसरा भेद कहा है, उसमें । 'तुम्हारे तिरस्कार के समुचित ही क्रूर राक्षस ( रावण ) ने किया, और उसे तुमने उस प्रकार सहन किया, जिस प्रकार कि कुलाङ्गनाएँ सिर ऊँचा रखती हैं । तत्काल इस धनुष को व्यर्थ धारण करते हुए तुम्हारे संकट के साक्षी, ( जीवित रहने के लोभी राम ने, हे प्रिये प्रेम के उचित कार्य नहीं किया ) ।' राक्षस-स्वभाव के कारण ही जो क्रूर अनतिलंघ्यशासन होने से दुर्मद होने के कारण हठात् तिरस्कृत, क्रोधान्ध है उसका यह अपनी चित्तवृत्ति के समुचित अनुष्ठान है सिर काट डालना, जिससे कोई मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन नहीं करेगा । तुम्हारे अर्थात् उस प्रकार के भी उसे तुमने कुछ नहीं समझा, उस तुम्हारे । उसे भी
तृतीय उद्योतः ३१५
ध्वन्यालोकः प्रेम्णः प्रिये नोचितम्' । अत्र रामेणेत्येतत्पदं समसाहसैकरसत्वादि- व्यङ्ग्याभिसङ्क्रमितवाच्यं व्यञ्जकम् । राम ने प्रेम के उचित कार्य नहीं किया।' यहां 'राम' यह पद 'साहसैकरसत्व' आदि व्यङ्ग्य में संक्रमितवाच्य रूप में व्यञ्जक है । लोचनम् रतामुखप्रसादादिलक्ष्यमाणया सोढम् । यथा येन प्रकारेण कुलजन इति यः कश्चित्पामरप्रायोऽपि कुलवधूशब्दवाच्यः । उच्चैः शिरो धत्ते एवंविधाः किल वयं कुलवध्वो भवाम इति । अथ च शिरःकर्तनावसरे त्वया शीघ्रं कृत्यतामिति तथा सोढं तथोच्चैः शिरो धृतं यथान्योऽपि कुलस्त्रीजन उच्चैः शिरो धत्ते नित्यप्रवृत्ततया । एवं रावणस्य तव च समुचितकारित्वं निर्व्यूढम् । मम पुनः सर्वमेवानुचितं पर्यवसितम् । तथाहि राज्यनिर्वासनादिनिरवकाशीकृतधनुर्व्या- पारस्यापि कलत्रमात्ररक्षणप्रयोजनमपि यच्चापमभूत्तत्संप्रति त्वय्यरक्षितव्यापन्ना- यामेव निष्प्रयोजनम्, तथापि च तद्धारयामि । तन्नूनं निजजीवितरक्षैवास्य प्रयोजनत्वेन संभाव्यते । न चैतद्युक्तम् । रामेणेति । समसाहसरसत्वसत्यसंध- त्वोचितकारित्वादिव्यङ्ग्यधर्मान्तरपरिणतेनेत्यर्थः । 'कापुरुषादिधर्मपरिग्रह- स्त्वादिशब्दात्' इति यद्व्याख्यातम्, तदसत्; कापुरुषस्य ह्येतदेव प्रत्युतोचितं स्यात् । प्रिय इति शब्दमात्रसेवैतदिदानीं संवृत्तम् । प्रियशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तं उस प्रकार बिना विकार के, नेत्रों की विस्फारता और मुख की प्रसन्नता आदि से लक्ष्यमाण उत्सव-प्राप्ति की बुद्धि से सहन किया । जिस प्रकार कुलजन अर्थात् जो कोई पामर-प्राय भी जो 'कुलवधू' शब्द से अभिहित है । सिर ऊँचा रखती है, कि हम कुलवधुएँ इस प्रकार की होती हैं । और भी, सिर काटने के अवसर में तुमने 'शीघ्र काटो' ( यह कह कर ) सहन किया और ऊँचा सिर रखा, जैसे अन्य भी कुल- स्त्रियाँ नित्य प्रवृत्त होने के कारण सिर ऊँचा रखती हैं । इस प्रकार रावण का और तुम्हारा समुचितकारित्व निष्पन्न हो जाता है । मेरा तो सभी कुछ अनुचित पर्यवसित हुआ । जैसा कि राज्य से निर्वासन आदि के अवसर में धनुष का कोई व्यापार रहा नहीं, फिर भी कलत्रमात्र की रक्षा के प्रयोजन के लिए भी जो चाप था वह भी इस समय जब कि अरक्षित अवस्था में विपन्न हुई तो निष्प्रयोजन हो गया, और तब भी उसे धारण करता हूँ । तो निश्चय ही अपने प्राणों की रक्षा ही इसके प्रयोजन रूप में सम्भावित होती है । यह तो ठीक नहीं । 'राम'- । अर्थात् समसाहसरसत्व, सत्य- संधत्व, उचितकारित्व आदि व्यङ्ग्य धर्मान्तरों में परिणत । 'आदि' शब्द से कापुरुष आदि धर्म का परिग्रह है, यह जो कि व्याख्यान किया है, वह ठीक नहीं, क्यों कि बल्कि कापुरुष के यही उचित होता । 'प्रिये' यह शब्दमात्र ही इस समय हो गया है । और 'प्रिय' शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त जो प्रेम का नाम है वह भी अनौचित्य से
३१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा— एमेअ जणो तिस्सा देउ कवोलोपमाइ ससिबिम्बम् । परमत्थविआरे उण चन्दो चन्दो विअ वराओ ॥ अत्र द्वितीयश्चन्द्रशब्दोऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यः । अथवा, जैसे— 'इसी प्रकार लोग उसके कपोलों की उपमा शशिबिम्ब से देते हैं, परमार्थ रूप से विचार करने पर चन्द्र तो चन्द्र के समान वराक ( बेचारा ) है ।' यहां दूसरा 'चन्द्र' शब्द अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य है । लोचनम् यत्प्रेमानाम तदप्यनौचित्यकलङ्कितमिति शोकालम्बनोद्दीपनविभावयोगात्करुण- रसो रामस्य स्फुटीकृत इति । एमेअ इति । एवमेव जनस्तस्या ददाति कपोलोपमायां शशिबिम्बम् । परमार्थविचारे पुनश्चन्द्रश्चन्द्र इव वराकः ॥ ( इति छाया । ) एवमेवेति स्वयमविवेकान्धतया । जन इति लोकप्रसिद्धगतानुगतिकता- मात्रशरणः । तस्या इत्यसाधारणगुणगणमहार्घवपुषः । कपोलोपमायामिति निर्व्याजलावण्यसर्वस्वभूतमुखमध्यवर्तिप्रधानभूतकपोतलतस्योपमायां प्रत्युत तदधिकवस्तुकर्तव्यं ततो दूरनिकृष्टं शशिबिम्बं कलङ्कव्याजजिह्मीकृतम् । एवं यद्यपि गड्डरिकाप्रवाहपतितो लोकः, तथापि यदि परीक्षकाः परीक्षन्ते तद्वराकः कृपैकभाजनं यश्चन्द्र इति प्रसिद्धः स चन्द्र एव क्षयित्वविलासशून्यत्वमलिनत्व- कलङ्कित है । इस प्रकार शोक के आलम्बन-उद्दीपन विभावों के योग से राम का करुणरस स्फुट हो गया है । इसी प्रकार— । अर्थात् स्वयं अविवेकान्ध होने के कारण । लोग—। अर्थात् लोक में फैली बात के पीछे चल पड़ने के मात्र पक्षपाती । उसके अर्थात् असाधारण गुणगणों से कीमती शरीर वाली के । कपोलों की उपमा अर्थात् निर्व्याजलावण्यसर्व- स्वभूत और मुख मध्य में रहने वालों में प्रधानभूत कपोलतल की उपमा, प्रत्युत उससे अधिक वस्तु को देना चाहिए तो उससे अत्यन्त निकृष्ट एवं कलङ्कव्याज ( शश ) द्वारा मलिन किए गए शशिबिम्ब से ( देते हैं ) । इस प्रकार यद्यपि संसार गड्डरिका ( भेड़ की चाल ) की भाँति प्रवाहपतित है, तथापि यदि परीक्षक लोग परीक्षा करते हैं तब वराक (बेचारा) अर्थात् एकमात्र कृपा का भाजन जो 'चन्द्र' नाम से प्रसिद्ध है वह चन्द्र ही क्षयित्व, विलासशून्यत्व और मलिनत्व धर्मान्तरों में संक्रान्त अर्थ वाला है । यहाँ
तृतीय उद्योतः ३१७ ध्वन्यालोकः अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्ये प्रभेदे वाक्यप्रकाशता यथा— या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ अविवक्षितवाच्य के अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य (नामक) प्रभेद में वाक्यप्रकाशता, जैसे— 'जो सब भूतों की रात्रि है उसमें संयमी जागता रहता है और जिस में भूत (प्राणिमात्र) जागते रहते हैं वह देखते हुए मुनि की रात्रि है।' लोचनम् धर्मान्तरसंक्रान्तो योऽर्थः । अत्र च यथा व्यङ्ग्यधर्मान्तरसङ्क्रान्तिस्तथा पूर्वोक्तमनुसन्धेयम् । एवमुत्तरत्रापि । एवं प्रथमभेदस्य द्वावपि प्रकारौ पदप्रकाशकत्वेनोदाहृत्य वाक्यप्रकाशक- त्वेनोदाहरति—या निशेति । विवक्षित इति । तेन ह्युक्तेन न कश्चिदुपदेश्यं प्रत्युपदेशः सिद्धयति । निशायां जागरितव्यमन्यत्र रात्रिवदासितव्य- मिति किमनेनोक्तेन । तस्माद्बाधितस्वार्थमेतद्वाक्यं संयमिनो लोकोत्तरता- लक्षणेन निमित्तेन तत्त्वदृष्टाववधानं मिथ्यादृष्टौ च पराङ्मुखत्वं ध्वनति । सर्वशब्दार्थस्य चापेक्षिततयाप्युपपद्यमानतेति न सर्वशब्दार्थान्यथानुप- पत्त्यायमर्थ आक्षिप्तो मन्तव्यः । सर्वेषां ब्रह्मादिस्थावरान्तानां चतुर्दशाना- मपि भूतानां या निशा व्यामोहजननी तत्त्वदृष्टिः तस्यां संयमी जागर्ति कथं प्राप्येतेति । न तु विषयवर्जनमात्रादेव संयमीति यावत् । यदि वा सर्वभूतनि- शायां मोहिन्यां जागर्ति कथमियं हेयेति । यस्यां तु मिथ्यादृष्टौ सर्वाणि जैसे व्यङ्ग्य धर्मान्तर में (वाच्य की) सङ्क्रान्ति है वैसे ही पूर्वोक्त का अनुसन्धान कर लेना चाहिए । इस प्रकार आगे भी । इस प्रकार प्रथम भेद के दोनों भी प्रकारों को पदप्रकाशक रूप से उदाहरण देकर वाक्यप्रकाशक रूप से उदाहरण देते हैं—जा सब०— । विवक्षित— । उस कथन से कोई उपदेश्य के प्रति उपदेश सिद्ध नहीं होता । रात्रि में जागना चाहिए और अन्यत्र (दिन में) रात्रि की भाँति रहना चाहिए, इस कथन से क्या ? इसलिए अपने अर्थ के बाधित होने पर यह वाक्य लोकोत्तरता रूप निमित्त से संयमी का तत्त्वदृष्टि में अवधान और मिथ्यादृष्टि में पराङ्मुखत्व ध्वनित करता है । 'सब' (सर्व) शब्द के अर्थ के आपेक्षिक होने पर भी उपपत्ति है इस लिए 'सब' शब्द के अर्थ की अन्यथानुप- पत्ति से यह अर्थ आक्षिप्त नहीं समझना चाहिए । सभी अर्थात् ब्रह्मा से लेकर स्थावर- पर्यन्त चतुर्दश भूतों (८ दैव, १ मानुषक और ५ तैर्यक्) के जो रात्रि अर्थात् व्यामोह- जननी तत्त्वदृष्टि है उसमें संयमी जागता रहता है, कैसे (तत्त्वदृष्टि) पाई जाय ! न कि विषयवर्जन मात्र से संयमी है । अथवा, सब भूतों की मोहिनी रात्रि में जागता
३१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनेन हि वाक्येन निशार्थो न च जागरणार्थः कश्चिद्विवक्षितः । किं तर्हि ? तत्त्वज्ञानावहितत्वमतत्त्वपराङ्मुखत्वं च मुनेः प्रतिपाद्यत इति तिरस्कृतवाच्यस्यास्य व्यञ्जकत्वम् । इस वाक्य से रात्र्यर्थ और न तो जागरणार्थ कोई विवक्षित है। तो क्या है ? मुनि का तत्त्वज्ञान में अवहित होना और अतत्त्व से पराङ्मुख होना प्रतिपादन किया है, इस तिरस्कृतवाच्य का व्यञ्जकत्व है । लोचनम् भूतानि जाग्रति अतिशयेन सुप्रबुद्धरूपाणि सा तस्य रात्रिरप्रबोधविषयः । तस्या हि चेष्टायां नासौ प्रबुद्धः । एवमेव लोकोत्तराचारव्यवस्थितः पश्यति मन्यते च । तस्यैवान्तर्बहिश्चकरणवृत्तिश्चरितार्था । अन्यस्तु न पश्यति न च मन्यत इति । तत्त्वदृष्टिपरेण भाव्यमिति तात्पर्यम् । एवं च पश्यत इत्यपि मुनेरित्यपि च न स्वार्थमात्रविश्रान्तम् । अपि तु व्यङ्ग्य एव विश्राम्यति । यत्तच्छब्दयोश्च न स्वतन्त्रार्थतेति सर्व एवायमाख्यातसहायः पदसमूहो व्यङ्ग्यपरः । तदाह—अनेन हि वाक्येनेति । प्रतिपाद्यत इति ध्वन्यत इत्यर्थः । विषमथितो विषम्यतां प्राप्तः । केषाञ्चिद्दुष्कृतिनामतिविवेकिनां वा । केषा- ञ्चित्सुकृतिनामत्यन्तमविवेकिनां वा अतिक्रामत्यमृतनिर्माणः । केषाञ्चिन्मिश्र- कर्मणां विवेकाविवेकवतां वा, विषामृतमयः । केषामपि मूढप्रायाणां धाराप्रा- योगभूमिकारूढानां वा अविषामृतमयः कालोऽतिक्रामतीति सम्बन्धः । रहता है कि कैसे इसे त्याग किया जाय ! परन्तु जिस मिथ्यादृष्टि में समस्त भूत जागते रहते हैं अर्थात् अतिशय रूप से सुप्रबुद्ध रहते हैं, वह उसके (संयमी के) रात्रि अर्थात् अप्रबोध का विषय है। क्यों कि उस (रात्रि) की चेष्टा (स्थिति) में वह प्रबुद्ध नहीं है। इसी प्रकार लोकोत्तर क्रियाकलाप (आचार) में व्यवस्थित होकर देखता है और मानता है। उसी की आभ्यन्तर और बाह्य इन्द्रियों की वृत्ति चरितार्थ है । परन्तु दूसरा न तो देखता है और न तो मानता है । तात्पर्य यह कि तत्त्वदृष्टि के लिए तत्पर होना चाहिए । और इस प्रकार 'देखते हुए' और 'मुनि के' यह 'अपने अर्थमात्र में नहीं रहता, अपितु व्यङ्ग्य में ही विश्राम लेता है। और 'जो' 'वह' ( 'यत्' 'तत्' ) शब्दों के स्वतन्त्र अर्थ नहीं हैं इसलिए सभी यह आख्यातसहाय पदसमूह व्यङ्ग्य में तात्पर्य रखता है । उसे कहते हैं—इस वाक्य से—। प्रतिपादन किया है अर्थात् ध्वनित होता है । विषमियत अर्थात् विषम्यता को प्राप्त । किन्हीं दुष्कृतियों अथवा अतिविवेकियों का । किन्हीं सुकृतियों अथवा अत्यन्त अविवेकियों का अमृत बन जाता है । किन्हीं मिश्रकर्म वालों (कुछ दुष्कृत कुछ सुकृत वालों) का अथवा विवेक-अविवेक वालों का विष-अमृतमय होता है । किन्हीं मूढप्राय अथवा धारा के क्रम से प्राप्त योग की भूमिका में आरूढ़ लोगों का न विषममय न अमृतमय काल व्यतीत होता है । 'विष'
तृतीय उद्योतः ३१९ ध्वन्यालोकः तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य वाक्यप्रकाशता यथा— विसमइओ काण वि काण वि वालेइ अमिअणिम्माओ। काण वि विसामिअमओ काण वि अविसामओ कालो॥ (विषमयितः केषामपि केषामपि प्रयात्यमृतनिर्माणः। केषामपि विषामृतमयः केषामप्यविषामृतः कालः॥ इति छाया) अत्र हि वाक्ये विषामृतशब्दाभ्यां दुःखसुखरूपसङ्क्रमितवाच्याभ्यां व्यवहार इत्यर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य व्यञ्जकत्वम्। उसी अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य की वाक्यप्रकाशता, जैसे— समय किन्हीं के लिए विषमय हो जाता है, किन्हीं के लिए अमृत बन जाता है, किन्हीं के लिए विषमय और अमृतमय दोनों हो जाता है और किन्हीं के लिए न विष होता है न अमृत। इस वाक्य में दुःख और सुख रूप में संक्रमित वाच्य वाले 'विष' और 'अमृत' शब्दों से व्यवहार है, इस प्रकार अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य का व्यंजकत्व है। लोचनम् विषामृतपदे च लावण्यादिशब्दवन्निरूढलक्षणारूपतया सुखदुःखसाधनयोर्वर्तेते, यथा—विषं निम्बममृतं कपित्थमिति। न चात्र सुखदुःखसाधने तन्मात्रवि- श्रान्ते, अपि तु स्वकर्तव्यसुखदुःखपर्यवसिते। न च ते साधने सर्वथा न विवक्षिते। निस्साधनयोस्तयोरभावात्। तदाह—सङ्क्रमितवाच्याभ्यामिति। केषाञ्चिदिति चास्य विशेषे सङ्क्रान्तिः। अतिक्रामतीत्यस्य च क्रियामात्र- सङ्क्रान्तिः। काल इत्यस्य च सर्वव्यवहारसङ्क्रान्तिः। उपलक्षणार्थं तु विषा- मृतग्रहणमात्रसङ्क्रमणं वृत्तिकृता व्याख्यातम्। तदाह—वाक्य इति। और 'अमृत' पद 'लावण्य' आदि शब्द की भाँति निरूढलक्षणा रूप होने के कारण सुख और दुःख के साधन में हैं, जैसे—निम्ब विष है; कपित्थ अमृत है। यहाँ सुख और दुःख के साधन सुख और दुःख के साधनमात्र में विश्रान्त नहीं हैं अपि तु अपने कर्तव्य सुख और दुःख में पर्यवसित हैं। ऐसी बात नहीं कि वे साधन सर्वथा विवक्षित नहीं हैं, क्यों कि बिना साधन के वे दोनों नहीं होते। इस लिए कहते हैं—सङ्क्रमित वाच्य वाले—। 'किन्हीं के लिए' इसका विशेष (दुष्कृती आदि उक्त विशेष अर्थ) में सङ्क्रान्ति है। 'काल' इसकी सभी व्यवहार (के अर्थ) में सङ्क्रान्ति है। वृत्तिकार ने तो उपलक्षण के लिए 'विष' और 'अमृत' शब्द मात्र के सङ्क्रमण का व्याख्यान किया है। इस लिए कहते हैं—वाक्य में—।
३२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः विवक्षिताभिधेयस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य शब्दशक्त्युद्भवे प्रभेदे पदप्रकाशता यथा— प्रातुं धनैरर्थिजनस्य वाञ्छां दैवेन सृष्टो यदि नाम नास्मि । पथि प्रसन्नाम्बुधरस्तडागः कूपोऽथवा किं न जडः कृतोऽहम् ॥१॥ अत्र हि जड इति पदं निर्विण्णेन वक्त्रात्मसमानाधिकरणतया विवक्षित वाच्य के अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ( ध्वनि ) के शब्दशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे-- यदि दैव ने मुझे याचकजन की इच्छा धनों से पूरी करने के लिए नहीं बनाया है तो क्यों नहीं मुझे मार्ग में स्वच्छ जल वाला तालाब अथवा जड कूप बनाया ! यहां निर्वेदयुक्त वक्ता द्वारा स्वसमानाधिकरण रूप से प्रयुक्त 'जड' पद अपनी लोचनम् एवं कारिकाप्रथमार्धलक्षितांश्चतुरः प्रकारानुदाहृत्य द्वितीयकारिकार्धस्वी- कृतान् षडन्यान् प्रकारान् क्रमेणोदाहरति—विवक्षिताभिधेयस्येत्यादिना । प्रातु- मिति पूरयितुम् । धनैरिति बहुवचनं यो येनार्थी तस्य तेनेति सूचनार्थम् । अत एवार्थिग्रहणम् । जनस्येति बाहुल्येन हि लोको धनार्थी, न तु गुणैरुपका- रार्थी । दैवेनेति । अशक्यपर्यनुयोगेनेत्यर्थः । अस्मीति । अन्यो हि तावदवश्यं कश्चित्सृष्टो न त्वहमिति निर्वेदः । प्रसन्नं लोकोपयोगि अम्बु धारयतीति । कूपोऽथवेति । लोकैरप्यलक्ष्यमाण इत्यर्थः । आत्मसमानाधिकरणतयेति । जडः किङ्कर्तव्यतामूढ इत्यर्थः, अथ च कूपो जडोऽर्थिता कस्य कीदृशीत्यसम्भवद्वि- वेक इति । अत एव जडः शीतलो निर्वेदसन्तापरहितः । तथा जडः शीतलजल- इस प्रकार कारिका के प्रथमार्ध में लक्षित चारों प्रकारों का उदाहरण देकर द्वितीयार्ध में स्वीकृत छः अन्य प्रकारों का क्रम से उदाहरण देते हैं—विवक्षितवाच्य के—। 'प्रातुं' अर्थात् पूरी करने के लिए । 'धनों से' यहां बहुवचन 'जो जिसका अर्थी ( मांग करने वाला ) है उसे उसके द्वारा' इसके सूचनार्थ है । अत एव 'अर्थी' का ग्रहण किया है । 'जन' अर्थात् बहुततया लोग धन चाहने वाले होते हैं न कि गुणों से उपकार चाहते हैं । दैवेने अर्थात् जिससे कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता । 'मुझे' । अर्थात् अन्य किसी को अवश्य बनाया होगा न कि मुझे, यह निर्वेद है । प्रसन्न (स्वच्छ) अर्थात् लोकोपयोगी जल धारण करता है ।—अथवा कूप—। अर्थात् लोगों की दृष्टि भी जिस पर न पड़े ।—स्वसमानाधिकरण रूप से—। जड़ अर्थात् किङ्कर्तव्यतामूढ, और कूप जड़ है अर्थात् कौन कैसा अर्थी है यह विवेक नहीं रखता । अत एव जड अर्थात् शीतल, निर्वेद और सन्ताप से रहित । तथा जड़ अर्थात् शीत जल से युक्त होने के
तृतीय उद्योतः ३२१ ध्वन्यालोकः प्रयुक्तमनुरणनरूपतया कूपसमानाधिकरणतां स्वशक्त्या प्रतिपद्यते । तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा हर्षचरिते सिंहनादवाक्येषु–‘वृत्तेऽ- स्मिन्महाप्रलये धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः’ । एतद्धि वाक्यमनुरणनरूपमर्थान्तरं शब्दशक्त्या स्फुटमेव प्रकाशयति । अस्यैव कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरस्यार्थशक्त्युद्भवे प्रभेदे पद- प्रकाशता यथा हरिविजये— चूअंकुरावअंसं छणप्पसरमहग्घणमणहरसुरामोअम् । शक्ति से कूपसमानाधिकरणभाव प्राप्त करता है । उसी की वाक्यप्रकाशता, जैसे 'हर्षचरित' में सिंहनाद के वाक्यों में—'इस महा- प्रलय की स्थिति में पृथिवी के धारण के लिए तुम शेष हो ।' यह वाक्य अनुरणनरूप अर्थान्तर को शब्दशक्ति से स्पष्ट ही प्रकाशित करता है । कविप्रौढोक्तिमात्र से निष्पन्नशरीर इसी के अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे 'हरिविजये' में— आम्रमञ्जरी के अवतंस वाले, क्षण ( वसन्तोत्सव ) के प्रसार से मनोहर सुर लोचनम् योगितया परोपकारसमर्थः । अनेन तृतीयार्थेनायं जडशब्दस्तटाकार्थेन पुनरु- क्तार्थसम्बन्ध इत्यभिप्रायेणाह–कूपसमानाधिकरणतामिति । स्वशक्त्येति शब्द- शक्त्युद्भवत्वं योजयति । महाप्रलय इति । महस्य उत्सवस्य आसमन्तात्प्रलयो यत्र तादृशि शोककारणभूते वृत्ते धरण्या राज्यधुराया धारणायाश्वासनाय त्वं शेषः शिष्यमाणः । इतीयता पूर्णे वाक्यार्थे कल्पावसाने भूपीठारोहणक्षम एको नागराज एव दिग्दन्तिप्रभृतिष्वपि प्रलीनेष्वित्यर्थान्तरम् । चूताङ्कुरावतंसं क्षणप्रसरमहार्घमनोहरसुरामोदम् । कारण परोपकार करने में समर्थ । इस तृतीयार्थ से ( ‘शीत जल से युक्त होने के कारण’ इस हेतु से ) 'जड' शब्द तालाब के अर्थ के साथ पुनरुक्त अर्थ-सम्बन्ध का हो जायगा ( क्योंकि तालाब का विशेषण 'प्रसन्नाम्बुधर' दे ही चुके हैं ) इस अभिप्राय से कहते हैं— कूपसमानाधिकरणभाव—। ‘अपनी शक्ति से’ इस कथन से शब्दशक्त्युद्भव की योजना करते हैं । महाप्रलय—। मह अर्थात् उत्सव का—आ समन्तात् प्रलयः ( प्रकर्षेण लयः )— जहां हो जाता है उस प्रकार के शोककारणभूत प्रसंग में पृथिवी के अर्थात् राज्यधुरा के धारण के लिए अर्थात् आश्वासन के लिए तुम शेष हो अर्थात् बच रहे (शिष्यमाण) हो । इतने से वाक्यार्थ के पूर्ण होने पर 'कल्पान्त में जब दिग्गज नष्ट हो गए तब नागराज ही अकेले पृथिवी के धारण में क्षम रह गए' यह अर्थान्तर (प्रकाशित होता ) है । २१ ध्व०
३२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः असमप्पिअं पि गहिअं कुसुमशरेण मधुमासलच्छिमुहम् ॥ अत्र ह्यसमर्पितमपि कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्म्या मुखं गृहीतमित्य- समर्पितमपीत्येतदवस्थाभिधायिपदमर्थशक्त्या कुसुमशरस्य बलात्कारं प्रकाशयति । (कामदेव) के आमोद (चमत्कार) से भरे (दूसरे पक्षमें बहुमूल्य सुरा की सुगन्धि से युक्त) वसन्तलक्ष्मी के मुख को कामदेव ने बिना समर्पित किए ही ग्रहण किया । यहां 'बिना समर्पित किए ही कामदेव ने वसन्तलक्ष्मी के मुख को ग्रहण किया' में 'बिना समर्पित किए ही' इस अवस्था का अभिधान करने वाला पद अर्थशक्ति से कामदेव का बलात्कार प्रकाशित करता है । लोचनम् महार्घेण उत्सवप्रसरेण मनोहरसुरस्य मन्मथदेवस्य आमोदश्चमत्कारो यत्र तत् । अत्र महार्घशब्दस्य परनिपातः, प्राकृते नियमाभावात् । छण इत्युत्सवः । असमर्पितमपि गृहीतं कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्मीमुखम् ॥ मुखं प्रारम्भो वक्त्रं च । तच्च सुरामोदयुक्तं भवति । मध्वारम्भे कामश्चित्त- माक्षिपतीत्येतावानयमर्थः कविप्रौढोक्त्यार्थान्तरव्यञ्जकः सम्पादितः । अत्र कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिशरीरार्थशक्त्युद्भवे पदवाक्यप्रकाशतायामुदाहरणद्वयं न दत्तम् । 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इति प्राच्यकारि- काया इयतैवोदाहृतत्वं भवेदित्यभिप्रायेण । तत्र पदप्रकाशता यथा— सत्यं मनोरमाः कामाः सत्यं रम्या विभूतयः । किन्तुमत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥ इत्यत्र कविना यो विरागी वक्ता निबद्धस्तत्प्रौढोक्त्या जीवितशब्दोऽर्थशक्ति- महार्घ (महनीय) उत्सव के प्रसार से मनोहरसुर अर्थात् कामदेव का आमोद अर्थात् चमत्कार है जहां वहां । यहां 'महार्घ' शब्द का 'परनिपात' है, क्योंकि प्राकृत में नियम नहीं । 'छण' (क्षण) अर्थात् उत्सव । मुख अर्थात् प्रारम्भ और वक्त्र । वह (मुख) सुरा के आमोद से युक्त होता है । मधु के आरम्भ में काम चित्त को आक्षिप्त (चलायमान) कर देता है, यही इतना अर्थ कवि की प्रौढोक्ति से अर्थान्तर का व्यञ्जक बना दिया गया है। यहां, कविनिबद्धवक्तृप्रौढो- क्तिशरीर अर्थशक्त्युद्भव में पदप्रकाशता और वाक्यप्रकाशता में दो उदाहरण नहीं दिए हैं, इस अभिप्राय से कि 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इस पूर्वकारिका का इतने ही से उदाहृतत्व बन जायगा । उनमें पदप्रकाशता, जैसे— यह ठीक है कि काम मनोरम होते हैं और यह ठीक है कि विभूतियां रम्य होती हैं, किन्तु जीवन मतवाली अङ्गना के कटाक्षभङ्ग की भांति चंचल है । यहां कवि ने जिस विरागी वक्ता का निबन्धन किया है उसकी प्रौढोक्ति से
तृतीय उद्योतः ३२३ ध्वन्यालोकः अत्रैव प्रभेदे वाक्यप्रकाशता यथोदाहृतं प्राक् 'सज्जेहि सुरहिमासो' इत्यादि । अत्र सञ्जयति सुरभिमासो न तावदर्पयत्यनङ्गाय शरानित्ययं वाक्यार्थः कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो मन्मथोन्माथकदनावस्थां वसन्तसमयस्य सूचयति । स्वतःसम्भविशरीरार्थशक्त्युद्भवे प्रभेदे पदप्रकाशता यथा— वाणिअ हत्तिदन्ता कुत्तो अह्माण वाघकित्ती अ । जाव लुलिआलअमुही घरम्मि परिसक्कए सुण्हा ॥ इसी प्रभेद में वाक्यप्रकाशता, जैसे पहले उदाहरण दे चुके हैं—'सज्जेहि सुर- हिमासो०' इत्यादि । यहां, सुरभिमास वाणों को तैयार करता है, कामदेव को बाण अर्पित नहीं कर रहा है, यह कविप्रौढोक्तिमात्र से निष्पन्नशरीर वाक्यार्थ वसन्तसमय की काम के अतिशय उद्दीपन से जनित दुरवस्था को सूचित करता है । स्वतःसम्भविशरीर अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे— अरे बनिये, हमारे यहां हाथी के दांत और बाघ के चमड़े कहां, जब तक चंचल लटों से युक्त मुख वाली पतोहू घर में चमक-चमक कर चलती है । लोचनम् मूलतयेदं ध्वनयति—सर्व एवामी कामा विभूतयश्च स्वजीवितमात्रोपयो- गिनः, तदभावे हि सद्भिरपि तैरसद्रूपताप्यते, तदेव च जीवितं प्राणधारणरूप- त्वात्प्राणवृत्तेश्च चाञ्चल्यादनास्थापदमिति विषयेषु वराकेषु किं दोषोद्घोषणदौ- र्जन्येन निजमेव जीवितमुपालम्भ्यम्, तदपि च निसर्गचञ्चलमिति न सापराध- मित्येतावता गाढं वैराग्यमिति । वाक्यप्रकाशता यथा—'शिखरिणि' इत्यादौ । वाणिजक हस्तिदन्ताः कुतोऽस्माकं व्याघ्रकृत्तयश्च । यावल्लुलितालकमुखी गृहे परिष्वक्कते स्नुषा ॥ इति छाया । सविभ्रमं चंक्रम्यते । अत्र लुलितेति स्वरूपमात्रेण विशेषणमवलिप्ततया 'जीवन' शब्द अर्थशक्तिमूल रूप से यह ध्वनित करता है—ये सभी काम और विभूतियां अपने जीवन मात्र के उपयोग की वस्तुएं हैं, क्योंकि उसके (जीवन के) अभाव में उन सज्जनों ने भी असद्रूप माना है, जब कि वही जीवन प्राणधारणरूप होने से और प्राणवृत्ति के चञ्चल होने से अनास्था का स्थान है तो बेचारे विषयों को दोष देने की दुर्जनता से क्या लाभ ? पहले तो अपने ही जीवन को उपालम्भ देना चाहिए, वह भी स्वभावतः चंचल है अतः अपराधी नहीं, इस प्रकार गाढ वैराग्य है । वाक्यप्रकाशता जैसे, 'शिखरिणि०' इत्यादि में । (चमक-चमक कर चलती है) अर्थात् विलास या नजाकत के साथ चङ्क्रमण
३२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र लुलितालकमुखीत्येतत्पदं व्याधवध्वाः स्वतःसम्भावितशरी- रार्थशक्त्या सुरतक्रीडासक्तिं सूचयंस्तदीयस्य भर्तुः सततसम्भोगक्षामतां प्रकाशयति । तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा— सिहिपिच्छकण्णऊरा बहुआ वाहस्स गव्विरी भमइ । मुत्ताफलरइअपसाहणाँ मज्झे सवत्तीणम् ॥ अनेनापि वाक्येन व्याधवध्वाः शिखिपिच्छकर्णपूराया नवपरिणी- तायाः कस्याश्चित्सौभाग्यातिशयः प्रकाश्यते । तत्सम्भोगैकरतो मयूर- मात्रमारणसमर्थः पतिर्जात इत्यर्थप्रकाशनात् तदन्यासां चिरपरिणीतानां मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां दौर्भाग्यातिशयः ख्याप्यते । तत्ससम्भोग- यहां, ‘चंचल लटों से युक्त मुख वाली’ ‘लुलितालकमुखी’ यह पद स्वतः सम्भा- वित शरीर अर्थशक्ति से व्याध-वधू की सुरत-क्रीडा में आसक्ति सूचित करता हुआ उसके पति की निरन्तर सम्भोग के कारण दुर्बलता प्रकाशित करता है । उसी की वाक्यप्रकाशता, जैसे— मोर-पंखों के कनफूल पहने व्याध की पत्नी मुक्ताफल के बने गहनों वाली सौतों के बीच गर्वीली होकर घूमती है । इस वाक्य से भी मोर-पंखों के कनफूल वाली नवपरिणीता किसी व्याध-पत्नी का अतिशय सौभाग्य प्रकाशित होता है । ‘उसके साथ एकमात्र सम्भोग में रत पति सिर्फ मोर मारने में समर्थ रह गया’ इस अर्थ के प्रकाशन से उसके अतिरिक्त, चिरपरिणीत मुक्ताफल के बने गहनों वाली (सौतों) का अतिशय दौर्भाग्य सूचित लोचनम् च हस्तिदन्ताद्यपहरणं सम्भाव्यमिति वाक्यार्थस्य तावत्येव न काचिद्- नुपपत्तिः । सिहिपिच्छेति । पूर्वमेव योजिता गाथा । करती है । यहां ‘लुलित’ (या चंचल) यह विशेषण स्वरूपकथनमात्र से (प्रयुक्त) है और अभिमान से हाथीदांत का नहीं देना सम्भाव्य है, इस प्रकार इतने में ही वाक्यार्थ की कोई अनुपपत्ति नहीं है । मोरपंखों—पहले ही लगाई हुई गाथा है ।
काले स एव व्याधः करिवरवधव्यापारसमर्थ आसीदित्यर्थप्रकाशनात् । ननु ध्वनिः काव्यविशेष इत्युक्तं तत्कथं तस्य पदप्रकाशता । काव्यविशेषो हि विशिष्टार्थप्रतिपत्तिहेतुः शब्दसन्दर्भविशेषः । तद्भावश्च पदप्रकाशत्वे नोपपद्यते । पदानां स्मारकतवेनावाचकत्वात् । उच्यते— स्यादेष दोषः यदि वाचकत्वं प्रयोजकं ध्वनिव्यवहारे स्यात् । न त्वेवम् ; तस्य व्यञ्जकत्वेन व्यवस्थानात् । किं च काव्यानां शरीरा- किया है। क्यों कि अर्थ यह प्रकाशित होता है कि व्याध बड़े-बड़े हाथियों को मार डालने की सामर्थ्य रखता था। 'जब कि 'ध्वनि काव्यविशेष है' ऐसा कह चुके हैं, तब उसकी पदप्रकाशता कैसे ? क्यों कि विशिष्ट अर्थ की प्रतिपत्ति का हेतु शब्दसन्दर्भविशेष काव्यविशेष है, और उसका भाव पदप्रकाश होने पर नहीं उपपन्न होता है, क्यों कि स्मारक होने के कारण पद अवाचक होते हैं। ( समाधान में ) कहते हैं—यह दोष तब होता यदि वाचकत्व ध्वनि के व्यवहार में प्रयोजक होता, परन्तु ऐसा नहीं है; क्यों कि लोचनम् नन्विति । समुदाय एव ध्वनिरित्यत्र पक्षे चोद्यमेतत् । तद्भावश्चेति । काव्य- विशेषत्वमित्यर्थः । अवाचकत्वादिति यदुक्तं सोऽयमप्रयोजको हेतुरिति छलेन तावद्दर्शयति — स्यादेष दोष इति। एवं छलेन परिहृत्य वस्तुवृत्तेनापि परिहरति— किं चेति । यदि परो ब्रूयात्—न मया अवाचकत्वं ध्वन्यभावे हेतूकृतं किं तूक्तं काव्यं ध्वनिः । काव्यं चानाकाङ्क्षप्रतिपत्तिकारि वाक्यं न पदमिति तत्राह— सत्यमेवं, तथापि पदं न ध्वनिरित्यस्माभिरुक्तम् । अपि तु समुदाय एव; तथा च पदप्रकाशो ध्वनिरिति प्रकाशपदेनोक्तम् । ननु पदस्य तत्र तथाविधं साम- र्ध्यमिति कुतोऽखण्ड एव प्रतीतिक्रम इत्याशङ्कयाह—काव्यानामिति । उक्तं हि प्राग्विवेककाले विभागोपदेश इति । जब कि—।'समुदाय ही ध्वनि है' इस पक्ष में यह प्रष्टव्य है। उसका भाव—। अर्थात् काव्यविशेषत्व । 'अवाचक होने के कारण' यह जो कहा है वह अप्रयोजक हेतु है, यह छल से दिखाते हैं— यह दोष तब होता—। इस प्रकार छल से परिहार करके परमार्थरूप से भी परिहार करते हैं—और भी—। यदि कोई दूसरा कहे—मैंने अवाच- कत्व को ध्वनि के अभाव में हेतु नहीं माना है, किन्तु काव्य को 'ध्वनि' कहा है। और काव्य बिना आकांक्षा के प्रतिपत्ति करने वाला वाक्य है पद नहीं, इस पर कहते हैं— यह ठीक है, तथापि 'पद ध्वनि नहीं है' यह हमने कहा है, अपितु समुदाय ही ( ध्वनि ) है, और जैसा कि 'पदप्रकाश ध्वनि है' यह 'प्रकाश' पद से कहा है। पद की वहां उस प्रकार की सामर्थ्य है अतः अखण्डरूप से प्रतीतिक्रम कहां है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—काव्यों की—। पहले कहा गया है कि विवेक के समय विभाग का उपदेश है ।
३२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः णामिव संस्थानविशेषावच्छिन्नसमुदायसाध्यापि चारुत्वप्रतीतिरन्वय- व्यतिरेकाभ्यां भागेषु कल्प्यत इति पदानामपि व्यञ्जकत्वमुखेन व्यव- स्थितो ध्वनिव्यवहारो न विरोधी । 'अनिष्टस्य श्रुतिर्यद्वदापादयति दुष्टताम् । श्रुतिदुष्टादिषु व्यक्तं तद्वदिष्टस्मृतिर्गुणम् ॥ पदानां स्मारकत्वेऽपि पदमात्रावभासिनः । उसका व्यञ्जकरूप से व्यवस्थान है । और भी, शरीरों की भांति काव्यों की चारुत्व- प्रतीति, संस्थानविशेषरूप समुदायसाध्य होने पर भी अन्वय-व्यतिरेक से भागों में मानी जाती है, इस प्रकार पदों का भी व्यञ्जकत्व के प्रकार से व्यवस्थित ध्वनि- व्यवहार विरोधी नहीं है । अनिष्ट का श्रवण श्रुतिदुष्ट आदि से जैसे दुष्टता ला देता है उसी प्रकार इष्ट अर्थ की स्मृति भी गुण हो जाती है । इसलिए पदों के स्मारक होने पर भी पदमात्र से प्रतीत होने वाले ध्वनि के सभी प्रभेदों में रम्यता रह सकती है । लोचनम् ननु भागेषु पदरूपेषु कथं सा चारुत्वप्रतीतिरारोपयितुं शक्या ? तानि हि स्मारकाण्येव । ततः किम् ? मनोहारिव्यङ्ग्यार्थस्मारकत्वाद्धि चारुत्वप्रतीति- निबन्धनत्वं केन वार्यते । यथा श्रुतिदुष्टानां पेलवादिपदानामसभ्यपेलाद्यर्थं प्रति न वाचकत्वम् । अपि तु स्मारकत्वम् । तद्दशाच्च चारुस्वरूपं काव्यं श्रुतिदुष्टम् । तच्च श्रुतिदुष्टत्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यां भागेषु व्यवस्थाप्यते तथा प्रकृतेऽपीति तदाह—अनिष्टस्येति । अनिष्टार्थस्मारकस्येत्यर्थः । दुष्टतामित्यचा- रुत्वम् । गुणमिति चारुत्वम् । एवं दृष्टान्तमभिधाय पादत्रयेण तुर्येण दार्ष्टान्तिक- कार्य उक्तः । अधुनोपसंहरति—पदानामिति । यत एवमिष्टस्मृतिश्चारुत्वमा- ( शंका ) पद रूप भागों में वह चारुत्व की प्रतीति का आरोप कैसे किया जा सकता है ? क्योंकि वे ( पद ) स्मारक ही होते हैं । ( समाधान— ) इससे क्या ? मनोहारी व्यङ्ग्य के स्मारक होने के कारण (उन पदों की) चारुत्वप्रतीति का निबन्धनत्व किससे वारण होगा ? जैसे श्रुतिदुष्ट ‘पेलव’ आदि पद असभ्य ‘पेल’ आदि अर्थ के वाचक नहीं हैं, अपितु स्मारक हैं । और इस कारण चारुस्वरूप काव्य श्रुतिदुष्ट हो जाता है । वह श्रुतिदुष्टत्व अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा भागों में व्यवस्थापित होता है, इस प्रकार प्रकृत में भी, इसलिए कहते हैं—अनिष्ट का—। अर्थात् अनिष्ट अर्थ के स्मारक का । दुष्टता अर्थात् अचारुत्व । गुण अर्थात् चारुत्व । इस प्रकार दृष्टान्त का अभिधान करके चतुर्थ के तीन पादों से दार्ष्टान्तिक अर्थ कहा है । अब उपसंहार करते हैं—पदों के—। जिस
तृतीय उद्योतः ३२७
ध्वन्यालोकः
तेन ध्वनेः प्रभेदेषु सर्वेष्वेवास्ति रम्यता ॥
विच्छित्तिशोभिनैकेन भूषणेनेव कामिनी ।
पदद्योत्येन सुकवेर्ध्वनिना भाति भारती ॥'
इति परिकरश्लोकाः ॥ १ ॥
( यस्त्वलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिर्वर्णपदादिषु ।
वाक्ये सङ्घटनायां च स प्रबन्धेऽपि दीप्यते ॥ २ ॥
जिस प्रकार कामिनी विशेष शोभा वाले (विच्छित्तिशोभिना) एक ही आभूषण
से शोभित होने लगती है उसी प्रकार सुकवि की वाणी पद से द्योतित होने वाली
ध्वनि से शोभित होने लगती है ।
ये परिकर-श्लोक हैं ॥ १ ॥
परन्तु जो अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि वर्ण, पद आदि में होता है वह वाक्य में,
संघटना में और प्रबन्ध में भी दीप्त होता है ॥ २ ॥
लोचनम्
वहति तेन हेतुना सर्वेषु प्रकारेषु निरूपितस्य पदमात्रावभासिनोऽपि पदप्रका-
शस्यापि ध्वने रम्यतास्ति स्मारकत्वेऽपि पदानामिति समन्वयः । अपिशब्दः
काकाक्षिन्यायेनोभयत्रापि सम्बध्यते । अधुना चारुत्वप्रतीतौ पदस्यान्वयव्य-
तिरेकौ दर्शयति—विच्छित्तीति ॥ १ ॥
एवं कारिकां व्याख्याय तदसङ्गृहीतमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यं प्रपञ्चयितुमाह—
यस्त्विति । तुशब्दः पूर्वभेदेभ्योऽस्य विशेषद्योतकः । वर्णसमुदायश्च पदम् ।
तत्समुदायो वाक्यम् । सङ्घटना पदगता वाक्यगता च । सङ्घटितवाक्यसमुदायः
कारण इस प्रकार इष्ट अर्थ की स्मृति चारुत्व अर्पित करती है उस कारण सब प्रकारों
में निरूपित, पदमात्र से अवभासित होने वाले भी पदप्रकाश ध्वनि की रम्यता पदों
के स्मारक होने पर भी है, यह (श्लोकार्थ का) समन्वय है । 'भी' शब्द ('अपि' )
'काकाक्षिगोलक' न्याय (अर्थात् जिस प्रकार कौए का एक ही अक्षिगोल दोनों ओर का
काम करता है उस प्रकार) से दोनों ओर लगेगा । अब चारुत्व की प्रतीति में पद का
अन्वय-व्यतिरेक दिखाते हैं—विशेष शोभा (विच्छित्ति)—॥ १ ॥
इस प्रकार कारिका की व्याख्या करके उसके द्वारा असङ्गृहीत अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य
का प्रपञ्च करने के लिए कहते हैं—परन्तु जो—। 'परन्तु' ('तु') शब्द पहले के प्रभेदों
से इसका विशेष द्योतक है, वर्णों का समुदाय 'पद' होता है, उन (पदों) का समुदाय
'वाक्य' होता है, संघटना पदगत और वाक्यगत होती है, संघटित वाक्यों का समुदाय
३२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र वर्णानामनर्थकत्वाद्व्योतकत्वमसम्भवीत्याशङ्क्येदमूच्यते— शषौ सरेफसंयोगो ढकारश्चापि भूयसा। विरोधिनः स्युः शृङ्गारे ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ३ ॥ त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्साद्यौ रसे यदा। तदा तं दीपयन्त्येव ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ४ ॥ उनमें, वर्णों के अनर्थक होने के कारण द्योतकत्व असम्भव है, यह आशङ्का करके कहते हैं— श, ष, रेफ के साथ संयोग, और ढकार बहुत बार (प्रयुक्त होने पर) शृङ्गार में विरोधी हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं (सिद्ध) होते हैं ॥३॥ परन्तु वे ही जब बीभत्स आदि रस में निवेशित किये जाते हैं तब उस (रस) को दीपित ही करते हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं होते हैं ॥ ४ ॥ लोचनम् प्रबन्धः इत्यभिप्रायेण वर्णादीनां यथाक्रममुपादानम् आदिशब्देन पदैकदेश- पदद्वित्यादीनां ग्रहणम् । सप्तम्या निमित्तत्वमुक्तम् । दीप्ततेऽवभासते सकलका- व्यावभासकतयेति पूर्ववत्काव्यविशेषत्वं समर्थितम् ॥ २ ॥ भूयसेति प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तेन शकारो भूयसेत्यादि व्याख्यातव्यम् । रेफप्रधानस्संयोगः र्कहंद्रं इत्यादिः । विरोधिन इति । परुषा वृत्तिर्विरोधिनी शृङ्गारस्य । यतस्ते वर्णा भूयसा प्रयुज्यमाना न रसांश्च्योतन्ति स्रवन्ति । यदि वा तेन शृङ्गारविरोधित्वेन हेतुना वर्णाः शषादयो रसाच्छृङ्गाराच्च्यवन्ते तं न व्यञ्जयन्तीति व्यतिरेक उक्तः । अन्वयमाह—त एव त्विति । शादयः । तमिति । बीभत्सादिकं रसम् । दीपयन्ति द्योतयन्ति । कारिकाद्वयं तात्पर्येण 'प्रबन्ध' होता है, इस अभिप्राय से वर्ण आदि का क्रम से उपादान है। 'आदि' शब्द से पद के एकदेश, पदद्वितय आदि के ग्रहण हैं (……पद आदि में) सप्तमी से निमित्तत्व कहा है। दीप्त होता है अर्थात् सकल काव्य के अवभासकरूप से अवभासित होता है, इससे पूर्व की भांति काव्यविशेषत्व का समर्थन किया ॥ २ ॥ बहुत बार—। यह प्रत्येक के साथ लगेगा । इस लिए 'बहुत बार शकार' इत्यादि व्याख्यान करना चाहिए । रेफप्रधान संयोग र्कहंद्रं इत्यादि । विरोधी—। परुषा वृत्ति शृङ्गार की विरोधिनी है। क्यों कि वे वर्ण बहुत बार प्रयुज्यमान होकर रसों को प्रवाहित नहीं करते । अथवा ('तेन' अर्थात्) शृङ्गार के विरोधी होने के कारण श, ष आदि वर्ण रस अर्थात् शृङ्गार से च्युत होजाते हैं, अर्थात् उसे व्यञ्जित नहीं करते, यह 'व्यतिरेक' कहा गया । 'अन्वय' कहते हैं—वे ही—। अर्थात् श आदि (वर्ण) । उसको अर्थात् बीभत्स आदि रस को । दीपित करते हैं अर्थात् द्योतित करते हैं। दोनों