ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः असमप्पिअं पि गहिअं कुसुमशरेण मधुमासलच्छिमुहम् ॥ अत्र ह्यसमर्पितमपि कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्म्या मुखं गृहीतमित्य- समर्पितमपीत्येतदवस्थाभिधायिपदमर्थशक्त्या कुसुमशरस्य बलात्कारं प्रकाशयति । (कामदेव) के आमोद (चमत्कार) से भरे (दूसरे पक्षमें बहुमूल्य सुरा की सुगन्धि से युक्त) वसन्तलक्ष्मी के मुख को कामदेव ने बिना समर्पित किए ही ग्रहण किया । यहां 'बिना समर्पित किए ही कामदेव ने वसन्तलक्ष्मी के मुख को ग्रहण किया' में 'बिना समर्पित किए ही' इस अवस्था का अभिधान करने वाला पद अर्थशक्ति से कामदेव का बलात्कार प्रकाशित करता है । लोचनम् महार्घेण उत्सवप्रसरेण मनोहरसुरस्य मन्मथदेवस्य आमोदश्चमत्कारो यत्र तत् । अत्र महार्घशब्दस्य परनिपातः, प्राकृते नियमाभावात् । छण इत्युत्सवः । असमर्पितमपि गृहीतं कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्मीमुखम् ॥ मुखं प्रारम्भो वक्त्रं च । तच्च सुरामोदयुक्तं भवति । मध्वारम्भे कामश्चित्त- माक्षिपतीत्येतावानयमर्थः कविप्रौढोक्त्यार्थान्तरव्यञ्जकः सम्पादितः । अत्र कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिशरीरार्थशक्त्युद्भवे पदवाक्यप्रकाशतायामुदाहरणद्वयं न दत्तम् । 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इति प्राच्यकारि- काया इयतैवोदाहृतत्वं भवेदित्यभिप्रायेण । तत्र पदप्रकाशता यथा— सत्यं मनोरमाः कामाः सत्यं रम्या विभूतयः । किन्तुमत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥ इत्यत्र कविना यो विरागी वक्ता निबद्धस्तत्प्रौढोक्त्या जीवितशब्दोऽर्थशक्ति- महार्घ (महनीय) उत्सव के प्रसार से मनोहरसुर अर्थात् कामदेव का आमोद अर्थात् चमत्कार है जहां वहां । यहां 'महार्घ' शब्द का 'परनिपात' है, क्योंकि प्राकृत में नियम नहीं । 'छण' (क्षण) अर्थात् उत्सव । मुख अर्थात् प्रारम्भ और वक्त्र । वह (मुख) सुरा के आमोद से युक्त होता है । मधु के आरम्भ में काम चित्त को आक्षिप्त (चलायमान) कर देता है, यही इतना अर्थ कवि की प्रौढोक्ति से अर्थान्तर का व्यञ्जक बना दिया गया है। यहां, कविनिबद्धवक्तृप्रौढो- क्तिशरीर अर्थशक्त्युद्भव में पदप्रकाशता और वाक्यप्रकाशता में दो उदाहरण नहीं दिए हैं, इस अभिप्राय से कि 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इस पूर्वकारिका का इतने ही से उदाहृतत्व बन जायगा । उनमें पदप्रकाशता, जैसे— यह ठीक है कि काम मनोरम होते हैं और यह ठीक है कि विभूतियां रम्य होती हैं, किन्तु जीवन मतवाली अङ्गना के कटाक्षभङ्ग की भांति चंचल है । यहां कवि ने जिस विरागी वक्ता का निबन्धन किया है उसकी प्रौढोक्ति से