भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 680 में से

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पृष्ठ 383

तृतीय उद्योतः ३२३ ध्वन्यालोकः अत्रैव प्रभेदे वाक्यप्रकाशता यथोदाहृतं प्राक् 'सज्जेहि सुरहिमासो' इत्यादि । अत्र सञ्जयति सुरभिमासो न तावदर्पयत्यनङ्गाय शरानित्ययं वाक्यार्थः कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो मन्मथोन्माथकदनावस्थां वसन्तसमयस्य सूचयति । स्वतःसम्भविशरीरार्थशक्त्युद्भवे प्रभेदे पदप्रकाशता यथा— वाणिअ हत्तिदन्ता कुत्तो अह्माण वाघकित्ती अ । जाव लुलिआलअमुही घरम्मि परिसक्कए सुण्हा ॥ इसी प्रभेद में वाक्यप्रकाशता, जैसे पहले उदाहरण दे चुके हैं—'सज्जेहि सुर- हिमासो०' इत्यादि । यहां, सुरभिमास वाणों को तैयार करता है, कामदेव को बाण अर्पित नहीं कर रहा है, यह कविप्रौढोक्तिमात्र से निष्पन्नशरीर वाक्यार्थ वसन्तसमय की काम के अतिशय उद्दीपन से जनित दुरवस्था को सूचित करता है । स्वतःसम्भविशरीर अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे— अरे बनिये, हमारे यहां हाथी के दांत और बाघ के चमड़े कहां, जब तक चंचल लटों से युक्त मुख वाली पतोहू घर में चमक-चमक कर चलती है । लोचनम् मूलतयेदं ध्वनयति—सर्व एवामी कामा विभूतयश्च स्वजीवितमात्रोपयो- गिनः, तदभावे हि सद्भिरपि तैरसद्रूपताप्यते, तदेव च जीवितं प्राणधारणरूप- त्वात्प्राणवृत्तेश्च चाञ्चल्यादनास्थापदमिति विषयेषु वराकेषु किं दोषोद्घोषणदौ- र्जन्येन निजमेव जीवितमुपालम्भ्यम्, तदपि च निसर्गचञ्चलमिति न सापराध- मित्येतावता गाढं वैराग्यमिति । वाक्यप्रकाशता यथा—'शिखरिणि' इत्यादौ । वाणिजक हस्तिदन्ताः कुतोऽस्माकं व्याघ्रकृत्तयश्च । यावल्लुलितालकमुखी गृहे परिष्वक्कते स्नुषा ॥ इति छाया । सविभ्रमं चंक्रम्यते । अत्र लुलितेति स्वरूपमात्रेण विशेषणमवलिप्ततया 'जीवन' शब्द अर्थशक्तिमूल रूप से यह ध्वनित करता है—ये सभी काम और विभूतियां अपने जीवन मात्र के उपयोग की वस्तुएं हैं, क्योंकि उसके (जीवन के) अभाव में उन सज्जनों ने भी असद्रूप माना है, जब कि वही जीवन प्राणधारणरूप होने से और प्राणवृत्ति के चञ्चल होने से अनास्था का स्थान है तो बेचारे विषयों को दोष देने की दुर्जनता से क्या लाभ ? पहले तो अपने ही जीवन को उपालम्भ देना चाहिए, वह भी स्वभावतः चंचल है अतः अपराधी नहीं, इस प्रकार गाढ वैराग्य है । वाक्यप्रकाशता जैसे, 'शिखरिणि०' इत्यादि में । (चमक-चमक कर चलती है) अर्थात् विलास या नजाकत के साथ चङ्क्रमण