ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र लुलितालकमुखीत्येतत्पदं व्याधवध्वाः स्वतःसम्भावितशरी- रार्थशक्त्या सुरतक्रीडासक्तिं सूचयंस्तदीयस्य भर्तुः सततसम्भोगक्षामतां प्रकाशयति । तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा— सिहिपिच्छकण्णऊरा बहुआ वाहस्स गव्विरी भमइ । मुत्ताफलरइअपसाहणाँ मज्झे सवत्तीणम् ॥ अनेनापि वाक्येन व्याधवध्वाः शिखिपिच्छकर्णपूराया नवपरिणी- तायाः कस्याश्चित्सौभाग्यातिशयः प्रकाश्यते । तत्सम्भोगैकरतो मयूर- मात्रमारणसमर्थः पतिर्जात इत्यर्थप्रकाशनात् तदन्यासां चिरपरिणीतानां मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां दौर्भाग्यातिशयः ख्याप्यते । तत्ससम्भोग- यहां, ‘चंचल लटों से युक्त मुख वाली’ ‘लुलितालकमुखी’ यह पद स्वतः सम्भा- वित शरीर अर्थशक्ति से व्याध-वधू की सुरत-क्रीडा में आसक्ति सूचित करता हुआ उसके पति की निरन्तर सम्भोग के कारण दुर्बलता प्रकाशित करता है । उसी की वाक्यप्रकाशता, जैसे— मोर-पंखों के कनफूल पहने व्याध की पत्नी मुक्ताफल के बने गहनों वाली सौतों के बीच गर्वीली होकर घूमती है । इस वाक्य से भी मोर-पंखों के कनफूल वाली नवपरिणीता किसी व्याध-पत्नी का अतिशय सौभाग्य प्रकाशित होता है । ‘उसके साथ एकमात्र सम्भोग में रत पति सिर्फ मोर मारने में समर्थ रह गया’ इस अर्थ के प्रकाशन से उसके अतिरिक्त, चिरपरिणीत मुक्ताफल के बने गहनों वाली (सौतों) का अतिशय दौर्भाग्य सूचित लोचनम् च हस्तिदन्ताद्यपहरणं सम्भाव्यमिति वाक्यार्थस्य तावत्येव न काचिद्- नुपपत्तिः । सिहिपिच्छेति । पूर्वमेव योजिता गाथा । करती है । यहां ‘लुलित’ (या चंचल) यह विशेषण स्वरूपकथनमात्र से (प्रयुक्त) है और अभिमान से हाथीदांत का नहीं देना सम्भाव्य है, इस प्रकार इतने में ही वाक्यार्थ की कोई अनुपपत्ति नहीं है । मोरपंखों—पहले ही लगाई हुई गाथा है ।