भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 680 में से

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पृष्ठ 385

काले स एव व्याधः करिवरवधव्यापारसमर्थ आसीदित्यर्थप्रकाशनात् । ननु ध्वनिः काव्यविशेष इत्युक्तं तत्कथं तस्य पदप्रकाशता । काव्यविशेषो हि विशिष्टार्थप्रतिपत्तिहेतुः शब्दसन्दर्भविशेषः । तद्भावश्च पदप्रकाशत्वे नोपपद्यते । पदानां स्मारकतवेनावाचकत्वात् । उच्यते— स्यादेष दोषः यदि वाचकत्वं प्रयोजकं ध्वनिव्यवहारे स्यात् । न त्वेवम् ; तस्य व्यञ्जकत्वेन व्यवस्थानात् । किं च काव्यानां शरीरा- किया है। क्यों कि अर्थ यह प्रकाशित होता है कि व्याध बड़े-बड़े हाथियों को मार डालने की सामर्थ्य रखता था। 'जब कि 'ध्वनि काव्यविशेष है' ऐसा कह चुके हैं, तब उसकी पदप्रकाशता कैसे ? क्यों कि विशिष्ट अर्थ की प्रतिपत्ति का हेतु शब्दसन्दर्भविशेष काव्यविशेष है, और उसका भाव पदप्रकाश होने पर नहीं उपपन्न होता है, क्यों कि स्मारक होने के कारण पद अवाचक होते हैं। ( समाधान में ) कहते हैं—यह दोष तब होता यदि वाचकत्व ध्वनि के व्यवहार में प्रयोजक होता, परन्तु ऐसा नहीं है; क्यों कि लोचनम् नन्विति । समुदाय एव ध्वनिरित्यत्र पक्षे चोद्यमेतत् । तद्भावश्चेति । काव्य- विशेषत्वमित्यर्थः । अवाचकत्वादिति यदुक्तं सोऽयमप्रयोजको हेतुरिति छलेन तावद्दर्शयति — स्यादेष दोष इति। एवं छलेन परिहृत्य वस्तुवृत्तेनापि परिहरति— किं चेति । यदि परो ब्रूयात्—न मया अवाचकत्वं ध्वन्यभावे हेतूकृतं किं तूक्तं काव्यं ध्वनिः । काव्यं चानाकाङ्क्षप्रतिपत्तिकारि वाक्यं न पदमिति तत्राह— सत्यमेवं, तथापि पदं न ध्वनिरित्यस्माभिरुक्तम् । अपि तु समुदाय एव; तथा च पदप्रकाशो ध्वनिरिति प्रकाशपदेनोक्तम् । ननु पदस्य तत्र तथाविधं साम- र्ध्यमिति कुतोऽखण्ड एव प्रतीतिक्रम इत्याशङ्कयाह—काव्यानामिति । उक्तं हि प्राग्विवेककाले विभागोपदेश इति । जब कि—।'समुदाय ही ध्वनि है' इस पक्ष में यह प्रष्टव्य है। उसका भाव—। अर्थात् काव्यविशेषत्व । 'अवाचक होने के कारण' यह जो कहा है वह अप्रयोजक हेतु है, यह छल से दिखाते हैं— यह दोष तब होता—। इस प्रकार छल से परिहार करके परमार्थरूप से भी परिहार करते हैं—और भी—। यदि कोई दूसरा कहे—मैंने अवाच- कत्व को ध्वनि के अभाव में हेतु नहीं माना है, किन्तु काव्य को 'ध्वनि' कहा है। और काव्य बिना आकांक्षा के प्रतिपत्ति करने वाला वाक्य है पद नहीं, इस पर कहते हैं— यह ठीक है, तथापि 'पद ध्वनि नहीं है' यह हमने कहा है, अपितु समुदाय ही ( ध्वनि ) है, और जैसा कि 'पदप्रकाश ध्वनि है' यह 'प्रकाश' पद से कहा है। पद की वहां उस प्रकार की सामर्थ्य है अतः अखण्डरूप से प्रतीतिक्रम कहां है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—काव्यों की—। पहले कहा गया है कि विवेक के समय विभाग का उपदेश है ।

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