भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

३२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः णामिव संस्थानविशेषावच्छिन्नसमुदायसाध्यापि चारुत्वप्रतीतिरन्वय- व्यतिरेकाभ्यां भागेषु कल्प्यत इति पदानामपि व्यञ्जकत्वमुखेन व्यव- स्थितो ध्वनिव्यवहारो न विरोधी । 'अनिष्टस्य श्रुतिर्यद्वदापादयति दुष्टताम् । श्रुतिदुष्टादिषु व्यक्तं तद्वदिष्टस्मृतिर्गुणम् ॥ पदानां स्मारकत्वेऽपि पदमात्रावभासिनः । उसका व्यञ्जकरूप से व्यवस्थान है । और भी, शरीरों की भांति काव्यों की चारुत्व- प्रतीति, संस्थानविशेषरूप समुदायसाध्य होने पर भी अन्वय-व्यतिरेक से भागों में मानी जाती है, इस प्रकार पदों का भी व्यञ्जकत्व के प्रकार से व्यवस्थित ध्वनि- व्यवहार विरोधी नहीं है । अनिष्ट का श्रवण श्रुतिदुष्ट आदि से जैसे दुष्टता ला देता है उसी प्रकार इष्ट अर्थ की स्मृति भी गुण हो जाती है । इसलिए पदों के स्मारक होने पर भी पदमात्र से प्रतीत होने वाले ध्वनि के सभी प्रभेदों में रम्यता रह सकती है । लोचनम् ननु भागेषु पदरूपेषु कथं सा चारुत्वप्रतीतिरारोपयितुं शक्या ? तानि हि स्मारकाण्येव । ततः किम् ? मनोहारिव्यङ्ग्यार्थस्मारकत्वाद्धि चारुत्वप्रतीति- निबन्धनत्वं केन वार्यते । यथा श्रुतिदुष्टानां पेलवादिपदानामसभ्यपेलाद्यर्थं प्रति न वाचकत्वम् । अपि तु स्मारकत्वम् । तद्दशाच्च चारुस्वरूपं काव्यं श्रुतिदुष्टम् । तच्च श्रुतिदुष्टत्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यां भागेषु व्यवस्थाप्यते तथा प्रकृतेऽपीति तदाह—अनिष्टस्येति । अनिष्टार्थस्मारकस्येत्यर्थः । दुष्टतामित्यचा- रुत्वम् । गुणमिति चारुत्वम् । एवं दृष्टान्तमभिधाय पादत्रयेण तुर्येण दार्ष्टान्तिक- कार्य उक्तः । अधुनोपसंहरति—पदानामिति । यत एवमिष्टस्मृतिश्चारुत्वमा- ( शंका ) पद रूप भागों में वह चारुत्व की प्रतीति का आरोप कैसे किया जा सकता है ? क्योंकि वे ( पद ) स्मारक ही होते हैं । ( समाधान— ) इससे क्या ? मनोहारी व्यङ्ग्य के स्मारक होने के कारण (उन पदों की) चारुत्वप्रतीति का निबन्धनत्व किससे वारण होगा ? जैसे श्रुतिदुष्ट ‘पेलव’ आदि पद असभ्य ‘पेल’ आदि अर्थ के वाचक नहीं हैं, अपितु स्मारक हैं । और इस कारण चारुस्वरूप काव्य श्रुतिदुष्ट हो जाता है । वह श्रुतिदुष्टत्व अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा भागों में व्यवस्थापित होता है, इस प्रकार प्रकृत में भी, इसलिए कहते हैं—अनिष्ट का—। अर्थात् अनिष्ट अर्थ के स्मारक का । दुष्टता अर्थात् अचारुत्व । गुण अर्थात् चारुत्व । इस प्रकार दृष्टान्त का अभिधान करके चतुर्थ के तीन पादों से दार्ष्टान्तिक अर्थ कहा है । अब उपसंहार करते हैं—पदों के—। जिस