भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 680 में से

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तृतीय उद्योतः ३२१ ध्वन्यालोकः प्रयुक्तमनुरणनरूपतया कूपसमानाधिकरणतां स्वशक्त्या प्रतिपद्यते । तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा हर्षचरिते सिंहनादवाक्येषु–‘वृत्तेऽ- स्मिन्महाप्रलये धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः’ । एतद्धि वाक्यमनुरणनरूपमर्थान्तरं शब्दशक्त्या स्फुटमेव प्रकाशयति । अस्यैव कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरस्यार्थशक्त्युद्भवे प्रभेदे पद- प्रकाशता यथा हरिविजये— चूअंकुरावअंसं छणप्पसरमहग्घणमणहरसुरामोअम् । शक्ति से कूपसमानाधिकरणभाव प्राप्त करता है । उसी की वाक्यप्रकाशता, जैसे 'हर्षचरित' में सिंहनाद के वाक्यों में—'इस महा- प्रलय की स्थिति में पृथिवी के धारण के लिए तुम शेष हो ।' यह वाक्य अनुरणनरूप अर्थान्तर को शब्दशक्ति से स्पष्ट ही प्रकाशित करता है । कविप्रौढोक्तिमात्र से निष्पन्नशरीर इसी के अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे 'हरिविजये' में— आम्रमञ्जरी के अवतंस वाले, क्षण ( वसन्तोत्सव ) के प्रसार से मनोहर सुर लोचनम् योगितया परोपकारसमर्थः । अनेन तृतीयार्थेनायं जडशब्दस्तटाकार्थेन पुनरु- क्तार्थसम्बन्ध इत्यभिप्रायेणाह–कूपसमानाधिकरणतामिति । स्वशक्त्येति शब्द- शक्त्युद्भवत्वं योजयति । महाप्रलय इति । महस्य उत्सवस्य आसमन्तात्प्रलयो यत्र तादृशि शोककारणभूते वृत्ते धरण्या राज्यधुराया धारणायाश्वासनाय त्वं शेषः शिष्यमाणः । इतीयता पूर्णे वाक्यार्थे कल्पावसाने भूपीठारोहणक्षम एको नागराज एव दिग्दन्तिप्रभृतिष्वपि प्रलीनेष्वित्यर्थान्तरम् । चूताङ्कुरावतंसं क्षणप्रसरमहार्घमनोहरसुरामोदम् । कारण परोपकार करने में समर्थ । इस तृतीयार्थ से ( ‘शीत जल से युक्त होने के कारण’ इस हेतु से ) 'जड' शब्द तालाब के अर्थ के साथ पुनरुक्त अर्थ-सम्बन्ध का हो जायगा ( क्योंकि तालाब का विशेषण 'प्रसन्नाम्बुधर' दे ही चुके हैं ) इस अभिप्राय से कहते हैं— कूपसमानाधिकरणभाव—। ‘अपनी शक्ति से’ इस कथन से शब्दशक्त्युद्भव की योजना करते हैं । महाप्रलय—। मह अर्थात् उत्सव का—आ समन्तात् प्रलयः ( प्रकर्षेण लयः )— जहां हो जाता है उस प्रकार के शोककारणभूत प्रसंग में पृथिवी के अर्थात् राज्यधुरा के धारण के लिए अर्थात् आश्वासन के लिए तुम शेष हो अर्थात् बच रहे (शिष्यमाण) हो । इतने से वाक्यार्थ के पूर्ण होने पर 'कल्पान्त में जब दिग्गज नष्ट हो गए तब नागराज ही अकेले पृथिवी के धारण में क्षम रह गए' यह अर्थान्तर (प्रकाशित होता ) है । २१ ध्व०