ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः विवक्षिताभिधेयस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य शब्दशक्त्युद्भवे प्रभेदे पदप्रकाशता यथा— प्रातुं धनैरर्थिजनस्य वाञ्छां दैवेन सृष्टो यदि नाम नास्मि । पथि प्रसन्नाम्बुधरस्तडागः कूपोऽथवा किं न जडः कृतोऽहम् ॥१॥ अत्र हि जड इति पदं निर्विण्णेन वक्त्रात्मसमानाधिकरणतया विवक्षित वाच्य के अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ( ध्वनि ) के शब्दशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे-- यदि दैव ने मुझे याचकजन की इच्छा धनों से पूरी करने के लिए नहीं बनाया है तो क्यों नहीं मुझे मार्ग में स्वच्छ जल वाला तालाब अथवा जड कूप बनाया ! यहां निर्वेदयुक्त वक्ता द्वारा स्वसमानाधिकरण रूप से प्रयुक्त 'जड' पद अपनी लोचनम् एवं कारिकाप्रथमार्धलक्षितांश्चतुरः प्रकारानुदाहृत्य द्वितीयकारिकार्धस्वी- कृतान् षडन्यान् प्रकारान् क्रमेणोदाहरति—विवक्षिताभिधेयस्येत्यादिना । प्रातु- मिति पूरयितुम् । धनैरिति बहुवचनं यो येनार्थी तस्य तेनेति सूचनार्थम् । अत एवार्थिग्रहणम् । जनस्येति बाहुल्येन हि लोको धनार्थी, न तु गुणैरुपका- रार्थी । दैवेनेति । अशक्यपर्यनुयोगेनेत्यर्थः । अस्मीति । अन्यो हि तावदवश्यं कश्चित्सृष्टो न त्वहमिति निर्वेदः । प्रसन्नं लोकोपयोगि अम्बु धारयतीति । कूपोऽथवेति । लोकैरप्यलक्ष्यमाण इत्यर्थः । आत्मसमानाधिकरणतयेति । जडः किङ्कर्तव्यतामूढ इत्यर्थः, अथ च कूपो जडोऽर्थिता कस्य कीदृशीत्यसम्भवद्वि- वेक इति । अत एव जडः शीतलो निर्वेदसन्तापरहितः । तथा जडः शीतलजल- इस प्रकार कारिका के प्रथमार्ध में लक्षित चारों प्रकारों का उदाहरण देकर द्वितीयार्ध में स्वीकृत छः अन्य प्रकारों का क्रम से उदाहरण देते हैं—विवक्षितवाच्य के—। 'प्रातुं' अर्थात् पूरी करने के लिए । 'धनों से' यहां बहुवचन 'जो जिसका अर्थी ( मांग करने वाला ) है उसे उसके द्वारा' इसके सूचनार्थ है । अत एव 'अर्थी' का ग्रहण किया है । 'जन' अर्थात् बहुततया लोग धन चाहने वाले होते हैं न कि गुणों से उपकार चाहते हैं । दैवेने अर्थात् जिससे कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता । 'मुझे' । अर्थात् अन्य किसी को अवश्य बनाया होगा न कि मुझे, यह निर्वेद है । प्रसन्न (स्वच्छ) अर्थात् लोकोपयोगी जल धारण करता है ।—अथवा कूप—। अर्थात् लोगों की दृष्टि भी जिस पर न पड़े ।—स्वसमानाधिकरण रूप से—। जड़ अर्थात् किङ्कर्तव्यतामूढ, और कूप जड़ है अर्थात् कौन कैसा अर्थी है यह विवेक नहीं रखता । अत एव जड अर्थात् शीतल, निर्वेद और सन्ताप से रहित । तथा जड़ अर्थात् शीत जल से युक्त होने के