भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 680 में से

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पृष्ठ 379

तृतीय उद्योतः ३१९ ध्वन्यालोकः तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य वाक्यप्रकाशता यथा— विसमइओ काण वि काण वि वालेइ अमिअणिम्माओ। काण वि विसामिअमओ काण वि अविसामओ कालो॥ (विषमयितः केषामपि केषामपि प्रयात्यमृतनिर्माणः। केषामपि विषामृतमयः केषामप्यविषामृतः कालः॥ इति छाया) अत्र हि वाक्ये विषामृतशब्दाभ्यां दुःखसुखरूपसङ्क्रमितवाच्याभ्यां व्यवहार इत्यर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य व्यञ्जकत्वम्। उसी अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य की वाक्यप्रकाशता, जैसे— समय किन्हीं के लिए विषमय हो जाता है, किन्हीं के लिए अमृत बन जाता है, किन्हीं के लिए विषमय और अमृतमय दोनों हो जाता है और किन्हीं के लिए न विष होता है न अमृत। इस वाक्य में दुःख और सुख रूप में संक्रमित वाच्य वाले 'विष' और 'अमृत' शब्दों से व्यवहार है, इस प्रकार अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य का व्यंजकत्व है। लोचनम् विषामृतपदे च लावण्यादिशब्दवन्निरूढलक्षणारूपतया सुखदुःखसाधनयोर्वर्तेते, यथा—विषं निम्बममृतं कपित्थमिति। न चात्र सुखदुःखसाधने तन्मात्रवि- श्रान्ते, अपि तु स्वकर्तव्यसुखदुःखपर्यवसिते। न च ते साधने सर्वथा न विवक्षिते। निस्साधनयोस्तयोरभावात्। तदाह—सङ्क्रमितवाच्याभ्यामिति। केषाञ्चिदिति चास्य विशेषे सङ्क्रान्तिः। अतिक्रामतीत्यस्य च क्रियामात्र- सङ्क्रान्तिः। काल इत्यस्य च सर्वव्यवहारसङ्क्रान्तिः। उपलक्षणार्थं तु विषा- मृतग्रहणमात्रसङ्क्रमणं वृत्तिकृता व्याख्यातम्। तदाह—वाक्य इति। और 'अमृत' पद 'लावण्य' आदि शब्द की भाँति निरूढलक्षणा रूप होने के कारण सुख और दुःख के साधन में हैं, जैसे—निम्ब विष है; कपित्थ अमृत है। यहाँ सुख और दुःख के साधन सुख और दुःख के साधनमात्र में विश्रान्त नहीं हैं अपि तु अपने कर्तव्य सुख और दुःख में पर्यवसित हैं। ऐसी बात नहीं कि वे साधन सर्वथा विवक्षित नहीं हैं, क्यों कि बिना साधन के वे दोनों नहीं होते। इस लिए कहते हैं—सङ्क्रमित वाच्य वाले—। 'किन्हीं के लिए' इसका विशेष (दुष्कृती आदि उक्त विशेष अर्थ) में सङ्क्रान्ति है। 'काल' इसकी सभी व्यवहार (के अर्थ) में सङ्क्रान्ति है। वृत्तिकार ने तो उपलक्षण के लिए 'विष' और 'अमृत' शब्द मात्र के सङ्क्रमण का व्याख्यान किया है। इस लिए कहते हैं—वाक्य में—।