ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
तृतीय उद्योतः ३१९ ध्वन्यालोकः तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य वाक्यप्रकाशता यथा— विसमइओ काण वि काण वि वालेइ अमिअणिम्माओ। काण वि विसामिअमओ काण वि अविसामओ कालो॥ (विषमयितः केषामपि केषामपि प्रयात्यमृतनिर्माणः। केषामपि विषामृतमयः केषामप्यविषामृतः कालः॥ इति छाया) अत्र हि वाक्ये विषामृतशब्दाभ्यां दुःखसुखरूपसङ्क्रमितवाच्याभ्यां व्यवहार इत्यर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य व्यञ्जकत्वम्। उसी अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य की वाक्यप्रकाशता, जैसे— समय किन्हीं के लिए विषमय हो जाता है, किन्हीं के लिए अमृत बन जाता है, किन्हीं के लिए विषमय और अमृतमय दोनों हो जाता है और किन्हीं के लिए न विष होता है न अमृत। इस वाक्य में दुःख और सुख रूप में संक्रमित वाच्य वाले 'विष' और 'अमृत' शब्दों से व्यवहार है, इस प्रकार अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य का व्यंजकत्व है। लोचनम् विषामृतपदे च लावण्यादिशब्दवन्निरूढलक्षणारूपतया सुखदुःखसाधनयोर्वर्तेते, यथा—विषं निम्बममृतं कपित्थमिति। न चात्र सुखदुःखसाधने तन्मात्रवि- श्रान्ते, अपि तु स्वकर्तव्यसुखदुःखपर्यवसिते। न च ते साधने सर्वथा न विवक्षिते। निस्साधनयोस्तयोरभावात्। तदाह—सङ्क्रमितवाच्याभ्यामिति। केषाञ्चिदिति चास्य विशेषे सङ्क्रान्तिः। अतिक्रामतीत्यस्य च क्रियामात्र- सङ्क्रान्तिः। काल इत्यस्य च सर्वव्यवहारसङ्क्रान्तिः। उपलक्षणार्थं तु विषा- मृतग्रहणमात्रसङ्क्रमणं वृत्तिकृता व्याख्यातम्। तदाह—वाक्य इति। और 'अमृत' पद 'लावण्य' आदि शब्द की भाँति निरूढलक्षणा रूप होने के कारण सुख और दुःख के साधन में हैं, जैसे—निम्ब विष है; कपित्थ अमृत है। यहाँ सुख और दुःख के साधन सुख और दुःख के साधनमात्र में विश्रान्त नहीं हैं अपि तु अपने कर्तव्य सुख और दुःख में पर्यवसित हैं। ऐसी बात नहीं कि वे साधन सर्वथा विवक्षित नहीं हैं, क्यों कि बिना साधन के वे दोनों नहीं होते। इस लिए कहते हैं—सङ्क्रमित वाच्य वाले—। 'किन्हीं के लिए' इसका विशेष (दुष्कृती आदि उक्त विशेष अर्थ) में सङ्क्रान्ति है। 'काल' इसकी सभी व्यवहार (के अर्थ) में सङ्क्रान्ति है। वृत्तिकार ने तो उपलक्षण के लिए 'विष' और 'अमृत' शब्द मात्र के सङ्क्रमण का व्याख्यान किया है। इस लिए कहते हैं—वाक्य में—।
३२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः विवक्षिताभिधेयस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य शब्दशक्त्युद्भवे प्रभेदे पदप्रकाशता यथा— प्रातुं धनैरर्थिजनस्य वाञ्छां दैवेन सृष्टो यदि नाम नास्मि । पथि प्रसन्नाम्बुधरस्तडागः कूपोऽथवा किं न जडः कृतोऽहम् ॥१॥ अत्र हि जड इति पदं निर्विण्णेन वक्त्रात्मसमानाधिकरणतया विवक्षित वाच्य के अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ( ध्वनि ) के शब्दशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे-- यदि दैव ने मुझे याचकजन की इच्छा धनों से पूरी करने के लिए नहीं बनाया है तो क्यों नहीं मुझे मार्ग में स्वच्छ जल वाला तालाब अथवा जड कूप बनाया ! यहां निर्वेदयुक्त वक्ता द्वारा स्वसमानाधिकरण रूप से प्रयुक्त 'जड' पद अपनी लोचनम् एवं कारिकाप्रथमार्धलक्षितांश्चतुरः प्रकारानुदाहृत्य द्वितीयकारिकार्धस्वी- कृतान् षडन्यान् प्रकारान् क्रमेणोदाहरति—विवक्षिताभिधेयस्येत्यादिना । प्रातु- मिति पूरयितुम् । धनैरिति बहुवचनं यो येनार्थी तस्य तेनेति सूचनार्थम् । अत एवार्थिग्रहणम् । जनस्येति बाहुल्येन हि लोको धनार्थी, न तु गुणैरुपका- रार्थी । दैवेनेति । अशक्यपर्यनुयोगेनेत्यर्थः । अस्मीति । अन्यो हि तावदवश्यं कश्चित्सृष्टो न त्वहमिति निर्वेदः । प्रसन्नं लोकोपयोगि अम्बु धारयतीति । कूपोऽथवेति । लोकैरप्यलक्ष्यमाण इत्यर्थः । आत्मसमानाधिकरणतयेति । जडः किङ्कर्तव्यतामूढ इत्यर्थः, अथ च कूपो जडोऽर्थिता कस्य कीदृशीत्यसम्भवद्वि- वेक इति । अत एव जडः शीतलो निर्वेदसन्तापरहितः । तथा जडः शीतलजल- इस प्रकार कारिका के प्रथमार्ध में लक्षित चारों प्रकारों का उदाहरण देकर द्वितीयार्ध में स्वीकृत छः अन्य प्रकारों का क्रम से उदाहरण देते हैं—विवक्षितवाच्य के—। 'प्रातुं' अर्थात् पूरी करने के लिए । 'धनों से' यहां बहुवचन 'जो जिसका अर्थी ( मांग करने वाला ) है उसे उसके द्वारा' इसके सूचनार्थ है । अत एव 'अर्थी' का ग्रहण किया है । 'जन' अर्थात् बहुततया लोग धन चाहने वाले होते हैं न कि गुणों से उपकार चाहते हैं । दैवेने अर्थात् जिससे कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता । 'मुझे' । अर्थात् अन्य किसी को अवश्य बनाया होगा न कि मुझे, यह निर्वेद है । प्रसन्न (स्वच्छ) अर्थात् लोकोपयोगी जल धारण करता है ।—अथवा कूप—। अर्थात् लोगों की दृष्टि भी जिस पर न पड़े ।—स्वसमानाधिकरण रूप से—। जड़ अर्थात् किङ्कर्तव्यतामूढ, और कूप जड़ है अर्थात् कौन कैसा अर्थी है यह विवेक नहीं रखता । अत एव जड अर्थात् शीतल, निर्वेद और सन्ताप से रहित । तथा जड़ अर्थात् शीत जल से युक्त होने के
तृतीय उद्योतः ३२१ ध्वन्यालोकः प्रयुक्तमनुरणनरूपतया कूपसमानाधिकरणतां स्वशक्त्या प्रतिपद्यते । तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा हर्षचरिते सिंहनादवाक्येषु–‘वृत्तेऽ- स्मिन्महाप्रलये धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः’ । एतद्धि वाक्यमनुरणनरूपमर्थान्तरं शब्दशक्त्या स्फुटमेव प्रकाशयति । अस्यैव कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरस्यार्थशक्त्युद्भवे प्रभेदे पद- प्रकाशता यथा हरिविजये— चूअंकुरावअंसं छणप्पसरमहग्घणमणहरसुरामोअम् । शक्ति से कूपसमानाधिकरणभाव प्राप्त करता है । उसी की वाक्यप्रकाशता, जैसे 'हर्षचरित' में सिंहनाद के वाक्यों में—'इस महा- प्रलय की स्थिति में पृथिवी के धारण के लिए तुम शेष हो ।' यह वाक्य अनुरणनरूप अर्थान्तर को शब्दशक्ति से स्पष्ट ही प्रकाशित करता है । कविप्रौढोक्तिमात्र से निष्पन्नशरीर इसी के अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे 'हरिविजये' में— आम्रमञ्जरी के अवतंस वाले, क्षण ( वसन्तोत्सव ) के प्रसार से मनोहर सुर लोचनम् योगितया परोपकारसमर्थः । अनेन तृतीयार्थेनायं जडशब्दस्तटाकार्थेन पुनरु- क्तार्थसम्बन्ध इत्यभिप्रायेणाह–कूपसमानाधिकरणतामिति । स्वशक्त्येति शब्द- शक्त्युद्भवत्वं योजयति । महाप्रलय इति । महस्य उत्सवस्य आसमन्तात्प्रलयो यत्र तादृशि शोककारणभूते वृत्ते धरण्या राज्यधुराया धारणायाश्वासनाय त्वं शेषः शिष्यमाणः । इतीयता पूर्णे वाक्यार्थे कल्पावसाने भूपीठारोहणक्षम एको नागराज एव दिग्दन्तिप्रभृतिष्वपि प्रलीनेष्वित्यर्थान्तरम् । चूताङ्कुरावतंसं क्षणप्रसरमहार्घमनोहरसुरामोदम् । कारण परोपकार करने में समर्थ । इस तृतीयार्थ से ( ‘शीत जल से युक्त होने के कारण’ इस हेतु से ) 'जड' शब्द तालाब के अर्थ के साथ पुनरुक्त अर्थ-सम्बन्ध का हो जायगा ( क्योंकि तालाब का विशेषण 'प्रसन्नाम्बुधर' दे ही चुके हैं ) इस अभिप्राय से कहते हैं— कूपसमानाधिकरणभाव—। ‘अपनी शक्ति से’ इस कथन से शब्दशक्त्युद्भव की योजना करते हैं । महाप्रलय—। मह अर्थात् उत्सव का—आ समन्तात् प्रलयः ( प्रकर्षेण लयः )— जहां हो जाता है उस प्रकार के शोककारणभूत प्रसंग में पृथिवी के अर्थात् राज्यधुरा के धारण के लिए अर्थात् आश्वासन के लिए तुम शेष हो अर्थात् बच रहे (शिष्यमाण) हो । इतने से वाक्यार्थ के पूर्ण होने पर 'कल्पान्त में जब दिग्गज नष्ट हो गए तब नागराज ही अकेले पृथिवी के धारण में क्षम रह गए' यह अर्थान्तर (प्रकाशित होता ) है । २१ ध्व०
३२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः असमप्पिअं पि गहिअं कुसुमशरेण मधुमासलच्छिमुहम् ॥ अत्र ह्यसमर्पितमपि कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्म्या मुखं गृहीतमित्य- समर्पितमपीत्येतदवस्थाभिधायिपदमर्थशक्त्या कुसुमशरस्य बलात्कारं प्रकाशयति । (कामदेव) के आमोद (चमत्कार) से भरे (दूसरे पक्षमें बहुमूल्य सुरा की सुगन्धि से युक्त) वसन्तलक्ष्मी के मुख को कामदेव ने बिना समर्पित किए ही ग्रहण किया । यहां 'बिना समर्पित किए ही कामदेव ने वसन्तलक्ष्मी के मुख को ग्रहण किया' में 'बिना समर्पित किए ही' इस अवस्था का अभिधान करने वाला पद अर्थशक्ति से कामदेव का बलात्कार प्रकाशित करता है । लोचनम् महार्घेण उत्सवप्रसरेण मनोहरसुरस्य मन्मथदेवस्य आमोदश्चमत्कारो यत्र तत् । अत्र महार्घशब्दस्य परनिपातः, प्राकृते नियमाभावात् । छण इत्युत्सवः । असमर्पितमपि गृहीतं कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्मीमुखम् ॥ मुखं प्रारम्भो वक्त्रं च । तच्च सुरामोदयुक्तं भवति । मध्वारम्भे कामश्चित्त- माक्षिपतीत्येतावानयमर्थः कविप्रौढोक्त्यार्थान्तरव्यञ्जकः सम्पादितः । अत्र कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिशरीरार्थशक्त्युद्भवे पदवाक्यप्रकाशतायामुदाहरणद्वयं न दत्तम् । 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इति प्राच्यकारि- काया इयतैवोदाहृतत्वं भवेदित्यभिप्रायेण । तत्र पदप्रकाशता यथा— सत्यं मनोरमाः कामाः सत्यं रम्या विभूतयः । किन्तुमत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥ इत्यत्र कविना यो विरागी वक्ता निबद्धस्तत्प्रौढोक्त्या जीवितशब्दोऽर्थशक्ति- महार्घ (महनीय) उत्सव के प्रसार से मनोहरसुर अर्थात् कामदेव का आमोद अर्थात् चमत्कार है जहां वहां । यहां 'महार्घ' शब्द का 'परनिपात' है, क्योंकि प्राकृत में नियम नहीं । 'छण' (क्षण) अर्थात् उत्सव । मुख अर्थात् प्रारम्भ और वक्त्र । वह (मुख) सुरा के आमोद से युक्त होता है । मधु के आरम्भ में काम चित्त को आक्षिप्त (चलायमान) कर देता है, यही इतना अर्थ कवि की प्रौढोक्ति से अर्थान्तर का व्यञ्जक बना दिया गया है। यहां, कविनिबद्धवक्तृप्रौढो- क्तिशरीर अर्थशक्त्युद्भव में पदप्रकाशता और वाक्यप्रकाशता में दो उदाहरण नहीं दिए हैं, इस अभिप्राय से कि 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः' इस पूर्वकारिका का इतने ही से उदाहृतत्व बन जायगा । उनमें पदप्रकाशता, जैसे— यह ठीक है कि काम मनोरम होते हैं और यह ठीक है कि विभूतियां रम्य होती हैं, किन्तु जीवन मतवाली अङ्गना के कटाक्षभङ्ग की भांति चंचल है । यहां कवि ने जिस विरागी वक्ता का निबन्धन किया है उसकी प्रौढोक्ति से
तृतीय उद्योतः ३२३ ध्वन्यालोकः अत्रैव प्रभेदे वाक्यप्रकाशता यथोदाहृतं प्राक् 'सज्जेहि सुरहिमासो' इत्यादि । अत्र सञ्जयति सुरभिमासो न तावदर्पयत्यनङ्गाय शरानित्ययं वाक्यार्थः कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो मन्मथोन्माथकदनावस्थां वसन्तसमयस्य सूचयति । स्वतःसम्भविशरीरार्थशक्त्युद्भवे प्रभेदे पदप्रकाशता यथा— वाणिअ हत्तिदन्ता कुत्तो अह्माण वाघकित्ती अ । जाव लुलिआलअमुही घरम्मि परिसक्कए सुण्हा ॥ इसी प्रभेद में वाक्यप्रकाशता, जैसे पहले उदाहरण दे चुके हैं—'सज्जेहि सुर- हिमासो०' इत्यादि । यहां, सुरभिमास वाणों को तैयार करता है, कामदेव को बाण अर्पित नहीं कर रहा है, यह कविप्रौढोक्तिमात्र से निष्पन्नशरीर वाक्यार्थ वसन्तसमय की काम के अतिशय उद्दीपन से जनित दुरवस्था को सूचित करता है । स्वतःसम्भविशरीर अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे— अरे बनिये, हमारे यहां हाथी के दांत और बाघ के चमड़े कहां, जब तक चंचल लटों से युक्त मुख वाली पतोहू घर में चमक-चमक कर चलती है । लोचनम् मूलतयेदं ध्वनयति—सर्व एवामी कामा विभूतयश्च स्वजीवितमात्रोपयो- गिनः, तदभावे हि सद्भिरपि तैरसद्रूपताप्यते, तदेव च जीवितं प्राणधारणरूप- त्वात्प्राणवृत्तेश्च चाञ्चल्यादनास्थापदमिति विषयेषु वराकेषु किं दोषोद्घोषणदौ- र्जन्येन निजमेव जीवितमुपालम्भ्यम्, तदपि च निसर्गचञ्चलमिति न सापराध- मित्येतावता गाढं वैराग्यमिति । वाक्यप्रकाशता यथा—'शिखरिणि' इत्यादौ । वाणिजक हस्तिदन्ताः कुतोऽस्माकं व्याघ्रकृत्तयश्च । यावल्लुलितालकमुखी गृहे परिष्वक्कते स्नुषा ॥ इति छाया । सविभ्रमं चंक्रम्यते । अत्र लुलितेति स्वरूपमात्रेण विशेषणमवलिप्ततया 'जीवन' शब्द अर्थशक्तिमूल रूप से यह ध्वनित करता है—ये सभी काम और विभूतियां अपने जीवन मात्र के उपयोग की वस्तुएं हैं, क्योंकि उसके (जीवन के) अभाव में उन सज्जनों ने भी असद्रूप माना है, जब कि वही जीवन प्राणधारणरूप होने से और प्राणवृत्ति के चञ्चल होने से अनास्था का स्थान है तो बेचारे विषयों को दोष देने की दुर्जनता से क्या लाभ ? पहले तो अपने ही जीवन को उपालम्भ देना चाहिए, वह भी स्वभावतः चंचल है अतः अपराधी नहीं, इस प्रकार गाढ वैराग्य है । वाक्यप्रकाशता जैसे, 'शिखरिणि०' इत्यादि में । (चमक-चमक कर चलती है) अर्थात् विलास या नजाकत के साथ चङ्क्रमण
३२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र लुलितालकमुखीत्येतत्पदं व्याधवध्वाः स्वतःसम्भावितशरी- रार्थशक्त्या सुरतक्रीडासक्तिं सूचयंस्तदीयस्य भर्तुः सततसम्भोगक्षामतां प्रकाशयति । तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा— सिहिपिच्छकण्णऊरा बहुआ वाहस्स गव्विरी भमइ । मुत्ताफलरइअपसाहणाँ मज्झे सवत्तीणम् ॥ अनेनापि वाक्येन व्याधवध्वाः शिखिपिच्छकर्णपूराया नवपरिणी- तायाः कस्याश्चित्सौभाग्यातिशयः प्रकाश्यते । तत्सम्भोगैकरतो मयूर- मात्रमारणसमर्थः पतिर्जात इत्यर्थप्रकाशनात् तदन्यासां चिरपरिणीतानां मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां दौर्भाग्यातिशयः ख्याप्यते । तत्ससम्भोग- यहां, ‘चंचल लटों से युक्त मुख वाली’ ‘लुलितालकमुखी’ यह पद स्वतः सम्भा- वित शरीर अर्थशक्ति से व्याध-वधू की सुरत-क्रीडा में आसक्ति सूचित करता हुआ उसके पति की निरन्तर सम्भोग के कारण दुर्बलता प्रकाशित करता है । उसी की वाक्यप्रकाशता, जैसे— मोर-पंखों के कनफूल पहने व्याध की पत्नी मुक्ताफल के बने गहनों वाली सौतों के बीच गर्वीली होकर घूमती है । इस वाक्य से भी मोर-पंखों के कनफूल वाली नवपरिणीता किसी व्याध-पत्नी का अतिशय सौभाग्य प्रकाशित होता है । ‘उसके साथ एकमात्र सम्भोग में रत पति सिर्फ मोर मारने में समर्थ रह गया’ इस अर्थ के प्रकाशन से उसके अतिरिक्त, चिरपरिणीत मुक्ताफल के बने गहनों वाली (सौतों) का अतिशय दौर्भाग्य सूचित लोचनम् च हस्तिदन्ताद्यपहरणं सम्भाव्यमिति वाक्यार्थस्य तावत्येव न काचिद्- नुपपत्तिः । सिहिपिच्छेति । पूर्वमेव योजिता गाथा । करती है । यहां ‘लुलित’ (या चंचल) यह विशेषण स्वरूपकथनमात्र से (प्रयुक्त) है और अभिमान से हाथीदांत का नहीं देना सम्भाव्य है, इस प्रकार इतने में ही वाक्यार्थ की कोई अनुपपत्ति नहीं है । मोरपंखों—पहले ही लगाई हुई गाथा है ।
काले स एव व्याधः करिवरवधव्यापारसमर्थ आसीदित्यर्थप्रकाशनात् । ननु ध्वनिः काव्यविशेष इत्युक्तं तत्कथं तस्य पदप्रकाशता । काव्यविशेषो हि विशिष्टार्थप्रतिपत्तिहेतुः शब्दसन्दर्भविशेषः । तद्भावश्च पदप्रकाशत्वे नोपपद्यते । पदानां स्मारकतवेनावाचकत्वात् । उच्यते— स्यादेष दोषः यदि वाचकत्वं प्रयोजकं ध्वनिव्यवहारे स्यात् । न त्वेवम् ; तस्य व्यञ्जकत्वेन व्यवस्थानात् । किं च काव्यानां शरीरा- किया है। क्यों कि अर्थ यह प्रकाशित होता है कि व्याध बड़े-बड़े हाथियों को मार डालने की सामर्थ्य रखता था। 'जब कि 'ध्वनि काव्यविशेष है' ऐसा कह चुके हैं, तब उसकी पदप्रकाशता कैसे ? क्यों कि विशिष्ट अर्थ की प्रतिपत्ति का हेतु शब्दसन्दर्भविशेष काव्यविशेष है, और उसका भाव पदप्रकाश होने पर नहीं उपपन्न होता है, क्यों कि स्मारक होने के कारण पद अवाचक होते हैं। ( समाधान में ) कहते हैं—यह दोष तब होता यदि वाचकत्व ध्वनि के व्यवहार में प्रयोजक होता, परन्तु ऐसा नहीं है; क्यों कि लोचनम् नन्विति । समुदाय एव ध्वनिरित्यत्र पक्षे चोद्यमेतत् । तद्भावश्चेति । काव्य- विशेषत्वमित्यर्थः । अवाचकत्वादिति यदुक्तं सोऽयमप्रयोजको हेतुरिति छलेन तावद्दर्शयति — स्यादेष दोष इति। एवं छलेन परिहृत्य वस्तुवृत्तेनापि परिहरति— किं चेति । यदि परो ब्रूयात्—न मया अवाचकत्वं ध्वन्यभावे हेतूकृतं किं तूक्तं काव्यं ध्वनिः । काव्यं चानाकाङ्क्षप्रतिपत्तिकारि वाक्यं न पदमिति तत्राह— सत्यमेवं, तथापि पदं न ध्वनिरित्यस्माभिरुक्तम् । अपि तु समुदाय एव; तथा च पदप्रकाशो ध्वनिरिति प्रकाशपदेनोक्तम् । ननु पदस्य तत्र तथाविधं साम- र्ध्यमिति कुतोऽखण्ड एव प्रतीतिक्रम इत्याशङ्कयाह—काव्यानामिति । उक्तं हि प्राग्विवेककाले विभागोपदेश इति । जब कि—।'समुदाय ही ध्वनि है' इस पक्ष में यह प्रष्टव्य है। उसका भाव—। अर्थात् काव्यविशेषत्व । 'अवाचक होने के कारण' यह जो कहा है वह अप्रयोजक हेतु है, यह छल से दिखाते हैं— यह दोष तब होता—। इस प्रकार छल से परिहार करके परमार्थरूप से भी परिहार करते हैं—और भी—। यदि कोई दूसरा कहे—मैंने अवाच- कत्व को ध्वनि के अभाव में हेतु नहीं माना है, किन्तु काव्य को 'ध्वनि' कहा है। और काव्य बिना आकांक्षा के प्रतिपत्ति करने वाला वाक्य है पद नहीं, इस पर कहते हैं— यह ठीक है, तथापि 'पद ध्वनि नहीं है' यह हमने कहा है, अपितु समुदाय ही ( ध्वनि ) है, और जैसा कि 'पदप्रकाश ध्वनि है' यह 'प्रकाश' पद से कहा है। पद की वहां उस प्रकार की सामर्थ्य है अतः अखण्डरूप से प्रतीतिक्रम कहां है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—काव्यों की—। पहले कहा गया है कि विवेक के समय विभाग का उपदेश है ।
३२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः णामिव संस्थानविशेषावच्छिन्नसमुदायसाध्यापि चारुत्वप्रतीतिरन्वय- व्यतिरेकाभ्यां भागेषु कल्प्यत इति पदानामपि व्यञ्जकत्वमुखेन व्यव- स्थितो ध्वनिव्यवहारो न विरोधी । 'अनिष्टस्य श्रुतिर्यद्वदापादयति दुष्टताम् । श्रुतिदुष्टादिषु व्यक्तं तद्वदिष्टस्मृतिर्गुणम् ॥ पदानां स्मारकत्वेऽपि पदमात्रावभासिनः । उसका व्यञ्जकरूप से व्यवस्थान है । और भी, शरीरों की भांति काव्यों की चारुत्व- प्रतीति, संस्थानविशेषरूप समुदायसाध्य होने पर भी अन्वय-व्यतिरेक से भागों में मानी जाती है, इस प्रकार पदों का भी व्यञ्जकत्व के प्रकार से व्यवस्थित ध्वनि- व्यवहार विरोधी नहीं है । अनिष्ट का श्रवण श्रुतिदुष्ट आदि से जैसे दुष्टता ला देता है उसी प्रकार इष्ट अर्थ की स्मृति भी गुण हो जाती है । इसलिए पदों के स्मारक होने पर भी पदमात्र से प्रतीत होने वाले ध्वनि के सभी प्रभेदों में रम्यता रह सकती है । लोचनम् ननु भागेषु पदरूपेषु कथं सा चारुत्वप्रतीतिरारोपयितुं शक्या ? तानि हि स्मारकाण्येव । ततः किम् ? मनोहारिव्यङ्ग्यार्थस्मारकत्वाद्धि चारुत्वप्रतीति- निबन्धनत्वं केन वार्यते । यथा श्रुतिदुष्टानां पेलवादिपदानामसभ्यपेलाद्यर्थं प्रति न वाचकत्वम् । अपि तु स्मारकत्वम् । तद्दशाच्च चारुस्वरूपं काव्यं श्रुतिदुष्टम् । तच्च श्रुतिदुष्टत्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यां भागेषु व्यवस्थाप्यते तथा प्रकृतेऽपीति तदाह—अनिष्टस्येति । अनिष्टार्थस्मारकस्येत्यर्थः । दुष्टतामित्यचा- रुत्वम् । गुणमिति चारुत्वम् । एवं दृष्टान्तमभिधाय पादत्रयेण तुर्येण दार्ष्टान्तिक- कार्य उक्तः । अधुनोपसंहरति—पदानामिति । यत एवमिष्टस्मृतिश्चारुत्वमा- ( शंका ) पद रूप भागों में वह चारुत्व की प्रतीति का आरोप कैसे किया जा सकता है ? क्योंकि वे ( पद ) स्मारक ही होते हैं । ( समाधान— ) इससे क्या ? मनोहारी व्यङ्ग्य के स्मारक होने के कारण (उन पदों की) चारुत्वप्रतीति का निबन्धनत्व किससे वारण होगा ? जैसे श्रुतिदुष्ट ‘पेलव’ आदि पद असभ्य ‘पेल’ आदि अर्थ के वाचक नहीं हैं, अपितु स्मारक हैं । और इस कारण चारुस्वरूप काव्य श्रुतिदुष्ट हो जाता है । वह श्रुतिदुष्टत्व अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा भागों में व्यवस्थापित होता है, इस प्रकार प्रकृत में भी, इसलिए कहते हैं—अनिष्ट का—। अर्थात् अनिष्ट अर्थ के स्मारक का । दुष्टता अर्थात् अचारुत्व । गुण अर्थात् चारुत्व । इस प्रकार दृष्टान्त का अभिधान करके चतुर्थ के तीन पादों से दार्ष्टान्तिक अर्थ कहा है । अब उपसंहार करते हैं—पदों के—। जिस
तृतीय उद्योतः ३२७
ध्वन्यालोकः
तेन ध्वनेः प्रभेदेषु सर्वेष्वेवास्ति रम्यता ॥
विच्छित्तिशोभिनैकेन भूषणेनेव कामिनी ।
पदद्योत्येन सुकवेर्ध्वनिना भाति भारती ॥'
इति परिकरश्लोकाः ॥ १ ॥
( यस्त्वलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिर्वर्णपदादिषु ।
वाक्ये सङ्घटनायां च स प्रबन्धेऽपि दीप्यते ॥ २ ॥
जिस प्रकार कामिनी विशेष शोभा वाले (विच्छित्तिशोभिना) एक ही आभूषण
से शोभित होने लगती है उसी प्रकार सुकवि की वाणी पद से द्योतित होने वाली
ध्वनि से शोभित होने लगती है ।
ये परिकर-श्लोक हैं ॥ १ ॥
परन्तु जो अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि वर्ण, पद आदि में होता है वह वाक्य में,
संघटना में और प्रबन्ध में भी दीप्त होता है ॥ २ ॥
लोचनम्
वहति तेन हेतुना सर्वेषु प्रकारेषु निरूपितस्य पदमात्रावभासिनोऽपि पदप्रका-
शस्यापि ध्वने रम्यतास्ति स्मारकत्वेऽपि पदानामिति समन्वयः । अपिशब्दः
काकाक्षिन्यायेनोभयत्रापि सम्बध्यते । अधुना चारुत्वप्रतीतौ पदस्यान्वयव्य-
तिरेकौ दर्शयति—विच्छित्तीति ॥ १ ॥
एवं कारिकां व्याख्याय तदसङ्गृहीतमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यं प्रपञ्चयितुमाह—
यस्त्विति । तुशब्दः पूर्वभेदेभ्योऽस्य विशेषद्योतकः । वर्णसमुदायश्च पदम् ।
तत्समुदायो वाक्यम् । सङ्घटना पदगता वाक्यगता च । सङ्घटितवाक्यसमुदायः
कारण इस प्रकार इष्ट अर्थ की स्मृति चारुत्व अर्पित करती है उस कारण सब प्रकारों
में निरूपित, पदमात्र से अवभासित होने वाले भी पदप्रकाश ध्वनि की रम्यता पदों
के स्मारक होने पर भी है, यह (श्लोकार्थ का) समन्वय है । 'भी' शब्द ('अपि' )
'काकाक्षिगोलक' न्याय (अर्थात् जिस प्रकार कौए का एक ही अक्षिगोल दोनों ओर का
काम करता है उस प्रकार) से दोनों ओर लगेगा । अब चारुत्व की प्रतीति में पद का
अन्वय-व्यतिरेक दिखाते हैं—विशेष शोभा (विच्छित्ति)—॥ १ ॥
इस प्रकार कारिका की व्याख्या करके उसके द्वारा असङ्गृहीत अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य
का प्रपञ्च करने के लिए कहते हैं—परन्तु जो—। 'परन्तु' ('तु') शब्द पहले के प्रभेदों
से इसका विशेष द्योतक है, वर्णों का समुदाय 'पद' होता है, उन (पदों) का समुदाय
'वाक्य' होता है, संघटना पदगत और वाक्यगत होती है, संघटित वाक्यों का समुदाय
३२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र वर्णानामनर्थकत्वाद्व्योतकत्वमसम्भवीत्याशङ्क्येदमूच्यते— शषौ सरेफसंयोगो ढकारश्चापि भूयसा। विरोधिनः स्युः शृङ्गारे ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ३ ॥ त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्साद्यौ रसे यदा। तदा तं दीपयन्त्येव ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ४ ॥ उनमें, वर्णों के अनर्थक होने के कारण द्योतकत्व असम्भव है, यह आशङ्का करके कहते हैं— श, ष, रेफ के साथ संयोग, और ढकार बहुत बार (प्रयुक्त होने पर) शृङ्गार में विरोधी हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं (सिद्ध) होते हैं ॥३॥ परन्तु वे ही जब बीभत्स आदि रस में निवेशित किये जाते हैं तब उस (रस) को दीपित ही करते हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं होते हैं ॥ ४ ॥ लोचनम् प्रबन्धः इत्यभिप्रायेण वर्णादीनां यथाक्रममुपादानम् आदिशब्देन पदैकदेश- पदद्वित्यादीनां ग्रहणम् । सप्तम्या निमित्तत्वमुक्तम् । दीप्ततेऽवभासते सकलका- व्यावभासकतयेति पूर्ववत्काव्यविशेषत्वं समर्थितम् ॥ २ ॥ भूयसेति प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तेन शकारो भूयसेत्यादि व्याख्यातव्यम् । रेफप्रधानस्संयोगः र्कहंद्रं इत्यादिः । विरोधिन इति । परुषा वृत्तिर्विरोधिनी शृङ्गारस्य । यतस्ते वर्णा भूयसा प्रयुज्यमाना न रसांश्च्योतन्ति स्रवन्ति । यदि वा तेन शृङ्गारविरोधित्वेन हेतुना वर्णाः शषादयो रसाच्छृङ्गाराच्च्यवन्ते तं न व्यञ्जयन्तीति व्यतिरेक उक्तः । अन्वयमाह—त एव त्विति । शादयः । तमिति । बीभत्सादिकं रसम् । दीपयन्ति द्योतयन्ति । कारिकाद्वयं तात्पर्येण 'प्रबन्ध' होता है, इस अभिप्राय से वर्ण आदि का क्रम से उपादान है। 'आदि' शब्द से पद के एकदेश, पदद्वितय आदि के ग्रहण हैं (……पद आदि में) सप्तमी से निमित्तत्व कहा है। दीप्त होता है अर्थात् सकल काव्य के अवभासकरूप से अवभासित होता है, इससे पूर्व की भांति काव्यविशेषत्व का समर्थन किया ॥ २ ॥ बहुत बार—। यह प्रत्येक के साथ लगेगा । इस लिए 'बहुत बार शकार' इत्यादि व्याख्यान करना चाहिए । रेफप्रधान संयोग र्कहंद्रं इत्यादि । विरोधी—। परुषा वृत्ति शृङ्गार की विरोधिनी है। क्यों कि वे वर्ण बहुत बार प्रयुज्यमान होकर रसों को प्रवाहित नहीं करते । अथवा ('तेन' अर्थात्) शृङ्गार के विरोधी होने के कारण श, ष आदि वर्ण रस अर्थात् शृङ्गार से च्युत होजाते हैं, अर्थात् उसे व्यञ्जित नहीं करते, यह 'व्यतिरेक' कहा गया । 'अन्वय' कहते हैं—वे ही—। अर्थात् श आदि (वर्ण) । उसको अर्थात् बीभत्स आदि रस को । दीपित करते हैं अर्थात् द्योतित करते हैं। दोनों
तृतीय उद्योतः ३२९
ध्वन्यालोकः
श्लोकद्वयेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां वर्णानां द्योतकत्वं दर्शितं भवति ।
श्लोकद्वय से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वर्णों का द्योतकत्व मालूम होता है।
लोचनम्
व्याचष्टे-श्लोकद्वयेनेति । यथासंख्यप्रसङ्गपरिहारार्थं श्लोकाभ्यामिति न कृतम् ।
पूर्वश्लोकेन हि व्यतिरेक उक्तो द्वितीयेनान्वयः । अस्मिन्विषये शृङ्गारलक्षणे
शषादिप्रयोगः सुकवित्वमभिवाञ्छता न कर्तव्य इत्येवंफलत्वादुपदेशस्य
कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तः । न च सर्वथा न कर्तव्योऽपि तु वीभत्साद्यौ
कर्तव्य एवेति पश्चादन्वयः । वृत्तिकारेण त्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनु-
सर्तुमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।
एतदुक्तं भवति-यद्यपि विभावानुभावव्यभिचारिप्रतीतिसम्पदेव रसास्वादे
निवन्धनम् । तथापि विशिष्टश्रुतिकशब्दसमर्थ्यमानास्ते विभावादयस्तथा
भवन्तीति स्वसंवित्सिद्धमदः । तेन वर्णानामपि श्रुतिसमयोपलभ्यमानार्थान-
पेक्ष्यपि श्रोत्रैकग्राह्यो मृदुपारुषात्मा स्वभावो रसास्वादे सहकार्येत्र । अत एव च
सहकारितामेवाभिधातुं निमित्तसप्तमी कृता वर्णपदादिष्विति । न तु वर्णैरेव
रसाभिव्यक्तिः, विभावादिसंयोगाद्धि रसनिष्पत्तिरित्युक्तं बहुशः । श्रोत्रैक-
ग्राह्योऽपि च स्वभावो रसनिष्यन्दे व्यापियत एव, अपद्गीतध्वनिवत् पुष्कर-
कारिकाओं का तात्पर्य से व्याख्यान करते हैं— श्लोक द्वय से—। यथासंख्य का प्रसंग
हटाने के लिए ‘दोनों श्लोकों से’ (श्लोकाभ्यां) यह नहीं किया है, क्यों कि प्रथम
श्लोक से ‘व्यतिरेक’ कहा है, द्वितीय से ‘अन्वय’। शृङ्गार रूप इस विषय में श, ष
आदि का प्रयोग सुकवित्व की इच्छा वाला व्यक्ति नहीं करे, एतद्रूप उपदेश के फल
के कारण कारिकाकार ने पहले ‘व्यतिरेक’ कहा है। ऐसा नहीं कि सर्वथा नहीं करे,
अपि तु बीभत्स आदि में करे ही, यह बाद में ‘अन्वय’ है। परन्तु वृत्तिकार ने
‘अन्वयपूर्वक व्यतिरेक’ इस शैली के अनुसरण के लिए ‘अन्वय’ का पहले उपादान
किया है।
बात यह कही गई—यद्यपि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी की प्रतीतिसम्पत्ति
ही रसास्वाद में कारण (निबन्धन) है, तथापि जिनका सुनना विशिष्ट होता है ऐसे
शब्दों द्वारा समर्प्यमाण होकर वे विभाव आदि उस प्रकार (अर्थात् रसास्वाद में निबन्धन)
होते हैं, यह स्वप्रतीतिसिद्ध बात है। इस कारण वर्णों का भी श्रवण के अवसर में
ज्ञायमान अर्थ की अपेक्षा नहीं रखने वाला भी एकमात्र श्रोत्रद्वारा ग्राह्य मृदु अथवा
परुषरूप स्वभाव रसास्वाद में सहकारी है ही। और इसी लिए सहकारिता के
अभिधान के लिए ‘वर्ण, पद आदि में’ यह निमित्तसप्तमी की है। न कि वर्णों से ही रस
की अभिव्यक्ति होती है, विभाव आदि के संयोग से रसनिष्पत्ति होती है, यह बहुत बार
कहा जा चुका है। एकमात्र श्रोत्रद्वारा ग्राह्य स्वभाव भी रसनिष्यन्द में व्यापृत होता
३३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः (पदे चालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य द्योतनं यथा- उत्कम्पिनी भयपरिस्खलितांशुकान्ता ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे क्षिपन्ती । क्रूरेण दारुणतया सहसैव दग्धा धूमान्धितेन दहनेन न वीक्षितासि ॥ अत्र हि ते इत्येतत्पदं रसमयत्वेन स्फुटमेत्रावभासते सहृदयानाम् । पदावयवेन द्योतनं यथा— पद में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन, जैसे— भय के मारे छूट गए वस्त्र वालो, उन उत्कम्पशील विधुर आँखों को चारों ओर दौड़ाती हुई तुझे दारुण होने के कारण क्रूर अग्नि ने सहसा ही जला डाला, धुयें से अंधे (उस अग्नि) ने तुझे नहीं देखा । यहाँ 'उन' यह पद सहृदयों को रसमय रूप में स्पष्ट ही प्रतीत होता है । पद के अवयव से द्योतन, जैसे— लोचनम् वाद्यनियमितविशिष्टजातिकरणघाद्यनुकरणशब्दवच्च । पदे चेति । पदे च सती- त्यर्थः । तेन रसप्रतीतिर्विभावादेरेव । ते विभावादयो यदा विशिष्टेन केनापि पदेनार्प्यमाणा रसचमत्कारविधायिनो भवन्ति तदा पदस्यैवासौ महिमा समर्प्यत इति भावः । अत्र हीति । वासवदत्तादाहाकर्णनप्रबुद्धशोकनिर्भरस्य वत्सराजस्येदं परि- देवितवचनम् । तत्र च शोको नामेष्टजनविनाशप्रभव इति तस्य जनस्य ये भ्रूक्षेपकटाक्षप्रभृतयः पूर्वं रतिविभावतामवलम्बन्ते स्म त एवात्यन्तविनष्टाः सन्त इदानीं स्मृतिगोचरतया निरपेक्षभावत्वप्राणं करुणमुद्दीपयन्तीति स्थितम् । ही है, बिना पद के गीत की भांति और पुष्कर वाद्य में नियमित एवं विशिष्ट जाति, करण, घ आदि अनुकरण शब्द की भांति । पद में—। अर्थात् पद के होने पर । अतः रस की प्रतीति विभावादि से ही होती है । भाव यह कि वे विभाव आदि विशिष्ट किसी पद से अर्प्यमाण होकर रस-चमत्कार का विधान करते हैं तब पद की ही वह महिमा समर्पित होती है । यहां—। वासवदत्ता के जल जाने की खबर सुनने से उत्पन्न शोकनिर्भर वाले वत्सराज का यह परिदेवितवचन है । इसमें बात यह है कि शोक इष्ट जन के विनाश से उत्पन्न होता है, इस प्रकार उस व्यक्ति के जो भ्रूक्षेप, कटाक्ष प्रभृति पहले रति की विभावना का अवलम्बन करते थे वे ही अत्यन्त विनष्ट होते हुए अब स्मृतिगोचर होने के
तृतीय उद्योतः ३३१ ध्वन्यालोकः व्रीडायोगान्नतवदनया सन्निधाने गुरूणां बद्धोत्कम्पं कुचकलशयोर्र्मन्युमन्तर्निगृह्य। गुरुजनों (सास, असुर आदि) के समीप लज्जा के मारे सिर झुकाए, स्तन के कलशों में कम्प उत्पन्न कर देने वाले क्रोध को भीतर ही रोक कर और आँसू टपका लोचनम् ते लोचने इति तच्छब्दस्तल्लोचनगतस्वसंवेद्याव्यपदेश्यानन्तगुणस्मरणाकार- द्योतको रसस्यासाधारणनिमित्ततां प्राप्तः। तेन यत्केनचिच्चोदितं परिहृतं च तन्मिथ्यैव। तथाहि चोद्यम्—प्रक्रान्तपरामर्शकस्य तच्छब्दस्य कथमियति सामर्थ्यमिति। उत्तरं च—रसाविष्टोऽत्र पराम्रष्टेति। तदुभयमनुत्थानोपहतम्। यत्र ह्यनूद्दिश्यमानधर्मान्तरसाहित्ययोग्यधर्मयोगित्वं वस्तुनो यच्छब्देनाभिधाय तद्बुद्धिस्थधर्मान्तरसाहित्यं तच्छब्देन निर्वाह्यते। यत्रोच्यते—‘यत्तदोनित्य- सम्बन्धत्वम्’ इति, तत्र पूर्वप्रक्रान्तपरामर्शकत्वं तच्छब्दस्य। यत्र पुनर्निमित्तो- कारण निरपेक्षभावत्वप्राण करुण को उद्दीपित करते हैं। ‘उन आँखों को’ यहां ‘उन’ (‘तत्’) शब्द उसकी आँखों के स्वसंवेद्य एवं अव्यपदेश्य अनन्त गुणगणों के स्मरण के आकार का द्योतक बन कर रस का असाधारण निमित्त हो जाता है। इस लिए जो किसीने प्रश्न किया है और परिहार किया है, वह मिथ्या ही है। जैसा कि प्रश्न है—प्रक्रान्त के परामर्शक ‘तत्’ (‘उन’) शब्द की इतने में सामर्थ्य कैसे है? और उत्तर है—परामर्श करने वाला यहां रसाविष्ट है। ये दोनों अवसर न मिलने से (अनुत्थान के कारण) उपहत (वेकार) हैं। क्योंकि¹ जहां ‘यत्’ शब्द से वस्त्र का अनूद्दिश्यमान धर्मान्तर के साहित्ययोग्य धर्म का योगित्व अभिधान करके उस बुद्धिस्थ धर्मान्तर के साहित्य (सम्बन्ध) को ‘तत्’ शब्द के द्वारा बोध करते हैं, जहां कहते हैं— ‘यत्’ और ‘तत्’ का नित्य सम्बन्ध है, वहां ‘तत्’ शब्द पहले के प्रक्रान्त का परामर्शक होता है। फिर जहां ‘तत्’ शब्द किसी कारण से लाए गए स्मरण-विशेष के आकार का १. लोचनकार के कहने का आशय यह है कि ‘तत्’ शब्द का प्रयोग दो प्रकार से होता है। एक तो पूर्व प्रक्रान्त के परामर्श के लिए और दूसरा किसी निमित्त से प्राप्त स्मरण-विशेष के आकार की सूचना के लिए। जहां पहले प्रकार से प्रयोग होता है वहां ‘यत्तदोर्नित्यं सम्बन्धः’ इस नियम के अनुसार ‘यत्’ शब्द का होना अनिवार्य होता है, न होने पर आक्षेप कर लिया जाता है। किन्तु जहां किसी कारणवश प्राप्त स्मरण-विशेष के आकार का ‘तत्’ शब्द सूचक होता है वहाँ ‘यत्’ के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती। प्रस्तुत उदाहरण में ‘ते लोचने’ का ‘तत्’ शब्द दूसरे प्रकार से प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् यहाँ उस नायिका के नेत्रों के स्वसंवेद्य एवं अव्यपदेश्य अनन्त गुणों के स्मरण के आकार का द्योतक या सूचक है। किन्तु दूसरे किसी ने भ्रमवश प्रथम प्रकार से यहाँ ‘तत्’ शब्द का प्रयोग समझकर जो समाधान किया है वह सर्वथा ठीक नहीं।
३३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तिष्ठेत्युक्तं किमिव न तया यत्समुत्सृज्य बाष्पं मय्यासक्तश्चकितहरिणीहारिनेत्रत्रिभागः ॥ कर उसने चकित हरिणी की भांति मनोहर नेत्रों का तीसरा भाग (अर्थात् कटाक्ष) मुझमें लगा दिया तो क्या उसने 'ठहरो' यह नहीं कहा ? लोचनम् पनतस्मरणविशेषाकारसूचकत्वं तच्छब्दस्य 'स घट' इत्यादौ यथा, तत्र का परामर्शकत्वकथेत्यास्तामलीकपरामर्शकैः पण्डितम्मन्यैः सह विवादेन । उत्कम्पिनीत्यादिना तदीयभयानुभावोत्प्रेक्षणम् । मयाऽनिर्वाहितप्रतीकार- मिति शोकावेशस्य विभावः । ते इति सातिशयविभ्रमैकायतनरूपे अपि लोचने विधुरे कान्दिशीकतया निर्लङ्के क्षिपन्ती कस्त्राता कासावार्यपुत्र इति तयो- र्लोचनयोस्तादृशी चावस्थेति सुतरां शोकोद्द्दीपनम् । क्रूरेणेति । तस्यायं स्वभाव एव । किं कुरुतां तथापि च धूमेनान्धीकृतो द्रष्टुमसमर्थ इति न तु सविवेकस्येदृशानुचितकारित्वं सम्भाव्यते, इति स्मर्यमाणं तदीयं सौन्दर्य- मिदानीं सातिशयशोकावेशविभावतां प्राप्तमिति । ते शब्दे सति सर्वोऽयमर्थो निर्व्यूढः । एवं तत्र तत्र व्याख्यातव्यम् । सूचक होता है, जैसे 'वह घट' इत्यादि में, वहां परामर्शकत्व की बात क्या ? मिथ्या परामर्श करने वाले पण्डितम्मन्य जनों के साथ विवाद व्यर्थ है ! 'उत्कम्पशील' इत्यादि से उसके भय के अनुभावों का उत्प्रेक्षण है । जब कि मैंने कोई उसका प्रतीकार नहीं किया, यह शोकावेश का विभाव है । 'उन' अर्थात् अतिशय विलासों के एकमात्र आयतन रूप भी भय के मारे विधुर नेत्रों को दौड़ाती हुई 'कौन बचाने वाला है, वह आर्यपुत्र कहां हैं ?' यह उन आंखों की अवस्था पूर्ण रूप से शोक का उद्दीपन है । क्रूर—। उसका यह स्वभाव ही है । क्या करें, तथापि धुयें से अन्धा होने के कारण देख नहीं सका; विवेकशील व्यक्ति ऐसा अनुचित नहीं कर सकता । इस प्रकार स्मरण किया जाता हुआ उसका (रत्नावली का) सौन्दर्य इस समय अतिशय शोकावेश का विभाव बन रहा है । 'उन' शब्द के होने पर यह सब अर्थ निर्वाह हो जाता है । इस प्रकार वहां-वहां व्याख्यान कर लेना चाहिए । आचार्य लिखते हैं कि जहाँ 'तत्' शब्द पूर्व प्रक्रान्त का परामर्शक होता है वहाँ दोनों का प्रयोग अनिवार्य है, जैसे, 'यो विद्वान् स पूज्यः' । यहाँ पर 'यत्' शब्द से अनुद्दिश्यमान धर्मान्तर पूज्यत्व के साथ सम्बन्धयोग्य धर्मान्तर विद्वत्त्व के सम्बन्ध का अभिधान करके उस बुद्धि धर्मान्तर विद्वत्त्व का साहित्य सम्बन्ध 'तत्' शब्द से परामर्श किया गया है । प्रस्तुत उदाहरण में लोचनकार के अनुसार 'ते' यह पद स्मरण विशेषाकार का सूचक होने के कारण, कि सहृदयों की रसप्रतीति में सहायक होता है, क्योंकि यहाँ इसी शब्द से करुण रस के अनुकूल विभावादि समर्प्यमाण होकर रस-चमत्कार को उत्पन्न करते हैं ।
तृतीय उद्योतः ३३३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र त्रिभागशब्दः। वाक्यरूपश्चालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः शुद्धोऽलङ्कारसङ्कीर्णश्चेति द्विधा मतः। तत्र शुद्धस्योदाहरणं यथा रामाभ्युदये—‘कृतककुपितैः’ इत्यादि यहाँ तीसरा भाग (‘त्रिभाग)’ शब्द। वाक्यरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि ‘शुद्ध’ और ‘अलङ्कारसङ्कीर्ण’ यह दो प्रकार का माना गया है। उनमें ‘शुद्ध’ का उदाहरण, जैसे—रामाभ्युदय में ‘कृतककुपितैः०’ लोचनम् त्रिभागशब्द इति। गुरुजनमवधीर्यापि सा मां यथा तथापि साभिलाष- मन्युदैन्यगर्वमन्थरं विलोकितवतीत्येवं स्मरणेन परस्परहेतुकत्वप्राणप्रवास- विप्रलम्भोद्दीपनं त्रिभागशब्दसन्निधौ स्फुटं भातीति। वाक्यरूपश्चेति। प्रथमा- निर्देशेनाव्यतिरेकनिर्देशस्यायमभिप्रायः। वर्णपदतद्भागादिषु सत्स्वेवालक्ष्यक्रमो व्यङ्ग्यो निर्भासमानोऽपि समस्तकाव्यव्यापक एव निर्भासते, विभावादि- संयोगप्राणत्वात्। तेन वर्णादीनां निमित्तत्वमात्रमेव, वाक्यं तु ध्वनेरलक्ष्य- क्रमस्य न निमित्ततामात्रेण वर्णादिवदुपकारि, किं तु समग्रविभावादिप्रतिपत्ति- व्यापृतत्वाद्रसादिमयमेव तन्निर्भासत इति ‘वाक्ये’ इत्येतत्कारिकायां न निमित्तसप्तमीमात्रम्, अपि त्वनन्यत्र भावविषयार्थमपीति। शुद्ध इत्यर्थाल- ङ्कारेण केनाप्यसंमिश्रः। ‘तीसरा भाग’ (‘त्रिभाग’) शब्द—। गुरुजन की परवाह न करके भी वह मुझे जिस किसी प्रकार भी अभिलाष-सहित क्रोध, दैन्य एवं गर्व से मन्थर भाव से देखने लगी, इस प्रकार स्मरण से परस्पर हेतु होने से उत्पन्न होने वाले प्रवासविप्रलम्भ का उद्दीपन ‘तीसरा भाग’ (‘त्रिभाग’) शब्द के सन्निधान में स्पष्ट प्रतीत होता है। वाक्यरूप—। प्रथमा विभक्ति के निर्देश द्वारा अव्यतिरेक अर्थात् अभेद के बोधन का यह अभिप्राय है—वर्ण, पद और पदभाग आदि में निर्भासमान भी अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य समस्त काव्य में व्यापकरूप में ही निर्भासित होता है, क्यों कि विभाव आदि का संयोग उसका प्राण है। इस लिए वर्ण आदि निमित्तमात्र ही होते हैं, परन्तु वाक्य अलक्ष्यक्रम ध्वनि का निमित्ततामात्र से वर्ण आदि की भांति उपकार नहीं करता, किन्तु समग्र विभाव आदि की प्रतिपत्ति (ज्ञान) से व्यापृत होने के कारण वह (वाक्य) रसमय ही निर्भासित होता है, इस लिए ‘वाक्य में’ यह (दूसरी) कारिका में निमित्तार्थक सप्तमीमात्र नहीं है। अपि तु अन्यत्र विषय का अभाव है इस (अर्थ के बोध के लिए सप्तमी है)। ‘शुद्ध’ अर्थात् किसी भी अर्थालङ्कार से न मिला हुआ।
३३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्लोकः । एतद्धि वाक्यं परस्परानुरागं परिपोषप्राप्तं प्रदर्शयत्सर्वत एव परं रसत्त्वं प्रकाशयति । इत्यादि श्लोक । यह वाक्य परिपुष्ट परस्परानुराग को प्रदर्शित करता हुआ सब ओर से उत्कृष्ट रसत्त्व को प्रकाशित करता है । लोचनम् कृतककुपितैर्बाष्पाम्भोभिः सदैन्यवलोकितै- र्वनमपि गता यस्य प्रीत्या धृतापि तथाम्बया । नवजलधरश्यामाः पश्यन्दिशो भवतीं विना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव प्रियः ॥ अत्र तथा तैस्तैः प्रकारैर्मात्रा धृतापीत्यनुरागपरवशतवेन गुरुवचनोल्लङ्घन- मपि त्वया कृतमिति । प्रिये प्रिय इति परस्परजीवितसर्वस्वाभिमानात्मको रतिस्थायिभाव उक्तः । नवजलधरेत्यसोढपूर्वप्रावृषेण्यजलदालोकनं विप्रलम्भो- द्दीपनविभावत्वेनोक्तम् । जीवत्येवेति सापेक्षभावता एवकारेण करुणावकाश- निराकरणायोक्ता । सर्वत एवेति । नात्रान्यतमस्य पदस्याधिकं किञ्चिद्रसव्यक्ति- हेतुत्वमित्यर्थः । रसत्त्वमिति । विप्रलम्भशृङ्गारात्मतत्त्वम् । [ कृतककुपितैर्बाष्पाम्भोभिः सदैन्यविलोकितै- र्वनमपि गता यस्य प्रीत्या धृताऽपि तथाऽम्बया । नवजलधरश्यामाः पश्यन् दिशो भवतीं विना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव प्रियः ॥ ] कृत्रिम कोपों से, अश्रुजलों से और दीनतापूर्ण निरीक्षणों से उस प्रकार माता के द्वारा रोके जाने पर भी जिसके प्रेमवश तू वन को भी चली आई, हे प्रिये ! नये बादलों से श्यामवर्ण दिशाओं को देखताहुआ तुम्हारे बिना कठिनहृदय वह प्रिय जी ही रहा है । यहां उस प्रकार उन उन प्रकारों से माता के द्वारा रोके जाने पर भी, अर्थात् अनुराग के परवश होने के कारण गुरुवचन का उल्लंघन भी तुमने किया । 'प्रिये' 'प्रिय', इससे एक दूसरे के जीवितसर्वस्व होने के अभिमान रूप रतिस्थायिभाव कहा गया है । 'नये बादल' इससे असह्य वर्षाकालीन बादलों का आलोकन विप्रलम्भ के उद्दीपनविभाव के रूप में कहा है । 'जी ही रहा है' 'ही' ( एवकार ) से यह सापेक्षभावता करुण रस के प्रसंग के निराकरण के लिए कही गई है । सब ओर से-। अर्थात् यहां कोई ऐसा पद नहीं जो कुछ ही रस की अभिव्यक्ति करता है । रसत्त्व अर्थात् विप्रलम्भशृङ्गार रूप आत्मतत्त्व ।
तृतीय उद्योतः ३३५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः अलङ्कारान्तरसङ्कीर्णो यथा—'स्मरनवनदीपूरेणोढाः' इत्या दिश्लो- कः । अत्र हि रूपकेण यथोक्तव्यञ्जकलक्षणानुगतेन प्रसाधितो रसः सुतरामभिव्यज्यते ॥ ३-४ ॥ अलङ्कारान्तरसङ्कीर्ण, जैसे— 'स्मरनवनदीपूरेणोढाः' इत्यादि श्लोक । यहाँ व्यञ्जक यथोक्त लक्षणों से युक्त रूपक से अलङ्कृत रस अच्छे ढङ्ग से अभिव्यक्त होता है ॥ ३-४ ॥ लोचनम् स्मरनवनदीपूरेणोढाः पुनर्गुरुसेतुभिर्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूर्णमनोरथाः । तदपि लिखितप्रख्यैरङ्गैः परस्परसन्मुखा नयननलिनीनालाानीतं पिबन्ति रसं प्रियाः ॥ रूपकेणेति । स्मर एव नवनदीपूरः प्रावृषेण्यप्रवाहः सरभसमेव प्रवृद्धत्वात् तेनोढाः परस्परसांमुख्यमबुद्धिपूर्वमेव नीताः । अनन्तरं गुरवः श्वश्रूप्रभृतय एव सेतवः, इच्छाप्रसररोधकत्वात् । अथ च गुरवोऽलङ्घ्याः सेतवस्तैः विधृताः प्रतिहतेच्छाः । अत एवापूर्णमनोरथास्तिष्ठन्ति । तथापि परस्परोन्मुखता- लक्षणेनान्योन्यतादात्म्येन स्वदेहे सकलवृत्तिनिरोधाल्लिखितप्रायैरङ्गैर्नयनान्येव नलिनीनालानि तैरानीतं रसं परस्पराभिलाषलक्षणमास्वादयन्ति परस्परा- भिलाषात्मकदृष्टिच्छटामिश्रीकारयुक्त्यापि कालमतिवाहयन्तीति । ननु नात्र [ स्मरनवनदीपूरेणोढाः पुनर्गुरुसेतुभि- र्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूर्णमनोरथाः । तदपि लिखितप्रख्यैरङ्गैः परस्परमुन्मुखा नयननलिनीनालाानीतं पिबन्ति रसं प्रियाः ॥ ] काम की नयी नदी के प्रवाह में बहे जाते हुए, पुनः गुरु (गुरुजन, माता-पिता आदि, पक्ष में विशाल) के सेतु से रोके गए अपूर्णमनोरथ प्रिय (प्रेमी और प्रेमिका) यद्यपि दूर-दूर खड़े रहते हैं तथापि चित्रलिखित की भांति अंगों से उन्मुख होकर नेत्रों के मृणाल से लाए गए रस का परस्पर पान करते हैं । रूपक से—। काम ही नवनदीपूर अर्थात् वर्षाकालीन प्रवाह है, क्योंकि बड़े वेग से वह बढ़ जाता है, उसके द्वारा ऊढ अर्थात् बिना सोचे-विचारे ही एक दूसरे के सम्मुख हुए । अनन्तर, गुरु अर्थात् सास प्रभृति ही सेतु हैं, क्योंकि वे इच्छा के वेग को रोक देते हैं, और भी, गुरु अर्थात् अलङ्घ्य जो सेतु हैं उनके द्वारा रोके गए अर्थात् प्रतिहत इच्छा वाले । अत एव अपूर्णमनोरथ खड़े रहते हैं । तथापि परस्पर उन्मुखतारूप अन्योन्य तादात्म्य के द्वारा अपने शरीर में समस्त वृत्तियों का विरोध हो जाने पर लिखितप्राय अङ्गों से (उपलक्षण में तृतीया) नयनरूपी नलिनीनालों अर्थात् मृणालों द्वारा आनीत परस्पराभिलाषरूप रस का आस्वादन करते हैं, अर्थात् परस्पराभिलाषरूप दृष्टिच्छटा के मिश्रीकार की युक्ति से भी काल-यापन करते हैं । (शङ्का—) यहां रूपक का पूर्ण रूप से
३३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः सङ्घटनायां भासते ध्वनिरित्युक्तं तत्र सङ्घटना- स्वरूपमेव तावन्निरूप्यते— अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि संघटना में (भी) भासित होता है, यह कह चुके हैं, वहाँ संघटना का स्वरूप ही पहले निरूपण करते हैं— लोचनम् रूपकं निर्व्यूढं हंसचक्रवाकादिरूपेण नायकयुगलस्यारूपितत्वात् । ते हि हंसाद्या एकनलिनीनालानीतसलिलपानक्रीडादिषूचिता इत्याशङ्क्याह— यथोक्तव्यञ्जकेति । उक्तं हि पूर्वम्—'विवक्षातत्परत्वेन' इत्यादौ 'नातिनिर्वहणै- षिता' इति । प्रसाधित इति । विभावादिभूषणद्वारेण रसोऽपि प्रसाधित इत्यर्थः ॥ सङ्घटनायामिति भावे प्रत्ययः, वर्णादिवच्च निमित्तमात्रे सप्तमी । उक्तमिति । कारिकायाम् । निरूप्यत इति । गुणेभ्यो विविक्ततया विचार्यत इति यावत् । निर्वाह नहीं किया गया है, क्योंकि नायकयुगल का हंस, चक्रवाक आदि रूप से रूपण नहीं किया गया है, क्योंकि वे हंस आदि एक मृणाल से आनीत जल के पान की क्रीड़ा आदि कार्यों में काबिल होते हैं, यह आशंका करके कहते हैं—व्यंजक यथोक्तलक्षण—। पहले कह चुके हैं 'विवक्षातत्परत्वेन' इत्यादि में 'नातिनिर्वहणैषिता' अर्थात् किसी अलङ्कार के अति दूर तक निर्वाह की इच्छा न हो । अलंकृत—। अर्थात् विभाव आदि भूषण के द्वारा रस भी अलंकृत या प्रसाधित होता है ॥ ३-४ ॥ 'संघटना' यह भाव में प्रत्यय है और (पूर्व कारिका में) 'वर्ण' आदि की भांति निमित्त मात्र में 'सप्तमी' है । कही है—कारिका में । निरूपण करते हैं—अर्थात् गुणों से भिन्न रूप से विचार करते हैं । 'रसान्' (हंसों को) यह कारिका में द्वितीयार्थ का १. यहाँ ध्वनिकार 'संघटना' पर एक विस्तृत विचार प्रस्तुत करते हैं । ध्वनिकार से पूर्व आचार्य वामन ने 'रीति' के नाम को साहित्य-शास्त्र में प्रतिष्ठित किया था और 'रीति' को काव्य का आत्मा बताया था ('रीतिरात्मा काव्यस्य') । दण्डी ने रीति को 'मार्ग' कहा, किन्तु प्रसिद्धिवश उसका लक्षण नहीं किया । साहित्य-शास्त्र के आद्य आचार्य भामह के ग्रन्थ में इसका उल्लेख नहीं मिलता । आचार्य वामन ने 'विशिष्टपदरचना' को 'रीति' कहा है और 'विशेष' का अर्थ 'गुण' किया है। इस प्रकार गुणात्मक पदरचना ही 'रीति' है। वामन ने रीति को तीन प्रकार की माना है—वैदर्भी, गौडी और पाञ्चाली । ओज, प्रसाद आदि समग्र गुणों वाली रचना 'वैदर्भी' है, ओज और कान्ति गुणों वाली रचना 'गौडी' है और माधुर्य और सौकुमार्य से युक्त रचना 'पाञ्चाली' है । जिसमें सर्वथा समास का अभाव हो उसे शुद्ध वैदर्भी कहा है। आनन्दवर्धन की प्रस्तुत 'सङ्घटना' वामन की 'रीति' ही है, क्योंकि ये भी असमासा, मध्यम-समासा और दीर्घसमासा, तीन भेद करते हैं, जिनमें पदरचना का ही उपयोग है । आनन्दवर्धन ने रीति या सङ्घटना को इतना महत्त्व नहीं दिया जो वामन ने दिया, किन्तु आचार्य आनन्दवर्धन इतना अवश्य स्वीकार करते हैं कि वर्ण, पद आदि की भाँति सङ्घटना भी काव्य के आत्मा 'ध्वनि' को व्यञ्जित करती है, रस से उसका गहरा सम्बन्ध है ।
तृतीय उद्योतः ३३७ ध्वन्यालोकः असमसा समासेन मध्यमेन च भूषिता । तथा दीर्घसमासेति त्रिधा सङ्घटनोदिता ॥ ५ ॥ कैश्चित्—तां केवलमनूद्येदमूच्यते— गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन्व्यनक्ति सा । रसान्— सा सङ्घटना रसादीन् व्यनक्ति गुणानाश्रित्य तिष्ठन्तीति । अत्र च विकल्प्यं गुणानां सङ्घटनायाश्चैक्यं व्यतिरेको वा । व्यतिरेकेऽपि संघटना तीन प्रकार की कही है—असमासा, मध्यम-समासा तथा दीर्घसमासा ॥ कुछ लोगों ने उसका केवल अनुवाद करके यह कहते हैं— माधुर्य आदि गुणों का आश्रयण करके रहती हुई वह रसों को व्यक्त करती है । वह संघटना रस आदि को व्यक्त करती है गुणों का आश्रयण करके रहती हुई । यहाँ विकल्प करना चाहिए कि गुणों का और संघटना का ऐक्य (अभेद) है अथवा लोचनम् रसानिति कारिकायां द्वितीयार्थस्यायं पदम् । 'रसांस्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः' इति कारिकार्धम् । बहुवचनेनाद्यर्थः सङ्गृहीत इति दर्शयति— रसादीनिति । अत्र चेति । अस्मिन्नेव कारिकार्धे । विकल्पेनेदमर्थजातं कल्पयितुं व्याख्यातुं शक्यम्, किं तदित्याह—गुणानामिति । त्रयः पक्षा ये सम्भाव्यन्ते ते पद है । 'रसांस्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः' यह कारिकार्ध है । बहुवचन से 'आदि' अर्थ संगृहीत है, यह दिखाते हैं—रस आदि को—। यहां—। इसी कारिकार्ध में । विकल्प के द्वारा यह अर्थसमूह कल्पना, व्याख्यान किया जा सकता है, वह क्या है ? कहते हैं—गुणों के—। तीन १ पक्ष जो सम्भावित होते हैं व्याख्यान किए जा १. मुख्यरूप से सङ्घटना और गुणों का सम्बन्ध और सङ्घटना को रसाभिव्यक्ति का एक साधन, ये दो बातें प्रस्तुत ग्रन्थ में विवेचित हैं, इसकी आधारभूत कारिका का यह अंश है—'गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा । रसान् ।' कारिका के 'गुणानाश्रित्य' इस निर्देश के अनुसार गुणों और सङ्घटना के सम्बन्ध को लेकर तीन विकल्प किए गए हैं—प्रथम विकल्प के अनुसार गुण और रीति का अभेद है, (भेद पक्ष स्वीकार करने पर) सङ्घटना के आश्रित गुण हैं अथवा गुण के आश्रित सङ्घटना है, ये दो विकल्प हैं । वामन ने रीति और गुण का अभेद माना है । इस अभेद पक्ष के अनुसार 'गुणानाश्रित्य' का अर्थ 'आत्मभूत गुणों का आश्रयण करके' । यद्यपि गुण और सङ्घटना का अभेद है तथापि 'शिंशपा के आश्रित वृक्षत्व' की भाँति स्वाभिन्न वस्तु का भी स्व से भेद परिकल्पित किया है । गुण और सङ्घटना में भेद मानने वाले भट्ट उद्भट आदि के अनुसार गुण सङ्घटना के धर्म हैं, और धर्म अपने धर्मी के आश्रित होते ही हैं इस लिए गुण २२ ध्व०
३३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः द्वयी गतिः । गुणाश्रया सङ्घटना, सङ्घटनाश्रया वा गुणा इति । तत्रै- क्यपक्षे सङ्घटनाश्रयगुणपक्षे च गुणानात्मभूतानाधेयभूतान्वाश्रित्य तिष्ठन्ती सङ्घटना रसादीन् व्यनक्तीत्ययमर्थः । यदा तु नानात्वपक्षे गुणाश्रयसङ्घटनापक्षः तदा गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती गुणपरतन्त्रस्वभावा न तु गुणरूपैवेत्यर्थः । किं पुनरेवं विकल्पनस्य प्रयोजनमिति ? व्यतिरेक (भेद)। व्यतिरेक (भेद) में भी दो ढङ्ग हैं, गुणों के आश्रित संघटना है या संघटना के आश्रित गुण हैं। वहाँ, ऐक्य (अभेद) पक्ष में और संघटना के आश्रित गुणों के पक्ष में अर्थ यह होता है कि आत्मभूत अथवा आधेयभूत गुणों का आश्रयण करके रहती हुई संघटना रस आदि को व्यक्त करती है। परन्तु जब नानात्व (अर्थात् भेद) पक्ष में गुणों के आश्रित संघटना का पक्ष (मानते हैं) तब अर्थ होता है कि गुणों के आश्रयण करके रहती हुई, गुणों के परतंत्र स्वभाव वाली है, न कि गुण रूप ही है। फिर इस प्रकार विकल्प करने का प्रयोजन क्या है ? लोचनम् व्याख्यातुं शक्याः । कथ मत्याह—तत्रैक्यपक्ष इति । आत्मभूतानिति । स्वभाव- स्य कल्पनया प्रतिपादनार्थं प्रदर्शितभेदस्य स्वाश्रयवाचोयुक्तिर्दृश्यते शिंशपा- श्रयं वृक्षत्वमिति । आधेयभूतानिति । सङ्घटनाया धर्मा गुणा इति भट्टोद्भटादयः, धर्माश्च धर्म्याश्रिता इति प्रसिद्धो मार्गः। गुणपरतन्त्रेति । अत्र नाधाराधेय- सकते हैं। कैसे ? कहते हैं—वहां ऐक्यपक्ष में—। आत्मभूत—। स्वभाव के प्रतिपादन के लिए कल्पना से प्रदर्शित भेद वाली वस्तु का ‘स्वाश्रय’ कहने का ढङ्ग देखा जाता है, शिंशपा के आश्रित वृक्षत्व । आधेयभूत—। ‘भट्ट उद्भट’ आदि के अनुसार गुण संघटना के धर्म हैं और यह प्रसिद्ध मार्ग (मन्तव्य) है कि धर्म धर्मी के आश्रित होते हैं। गुणों के परतन्त्र—। यहां आश्रय का अर्थ आधाराधेयभाव नहीं है, क्योंकि गुणों में संघटना के आश्रित हैं। इसके अनुसार ‘गुणान् आधेयभूतान् आश्रित्य’ अर्थात् आधेयभूत गुणों का आश्रयण करके, यह अर्थ होगा। तीसरे विकल्प के अनुसार संघटना गुणों के आश्रित है, अर्थात् संघटना अपने आधारभूत गुणों का आश्रयण करती है (‘गुणानाश्रित्य’)। यह अन्तिम विकल्प आचार्य आनन्दवर्धन का अपना सिद्धान्त-पक्ष है। संघटना को गुणों के आश्रित मानते हुए वह उसे रसों का अन्यतम व्यञ्जक भी मानते हैं। ‘गुणानाश्रित्य’ इस कारिकांश को तीनों विकल्पों के अनुसार सङ्गत करके आचार्य ने तीनों के अनुसार सङ्घटना की रसव्याञ्जकता सूचित की है। सङ्घटना गुणों के आश्रित है, इसका अभिप्राय यह नहीं कि गुणों के साथ सङ्घटना का आधारा- धेयभाव है, क्योंकि गुणों में सङ्घटना नहीं रहती है। इस लिए सङ्घटना गुण के परतन्त्र होकर रहती है, उनकी वह मुखापेक्षिणी है। जैसे राजाश्रित प्रजावर्ग, राजा के परतन्त्र या मुखापेक्षी होकर रहता है। यह बात ‘लोचन’ में निर्दिष्ट है।