भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 680 में से

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पृष्ठ 390

३३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः (पदे चालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य द्योतनं यथा- उत्कम्पिनी भयपरिस्खलितांशुकान्ता ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे क्षिपन्ती । क्रूरेण दारुणतया सहसैव दग्धा धूमान्धितेन दहनेन न वीक्षितासि ॥ अत्र हि ते इत्येतत्पदं रसमयत्वेन स्फुटमेत्रावभासते सहृदयानाम् । पदावयवेन द्योतनं यथा— पद में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन, जैसे— भय के मारे छूट गए वस्त्र वालो, उन उत्कम्पशील विधुर आँखों को चारों ओर दौड़ाती हुई तुझे दारुण होने के कारण क्रूर अग्नि ने सहसा ही जला डाला, धुयें से अंधे (उस अग्नि) ने तुझे नहीं देखा । यहाँ 'उन' यह पद सहृदयों को रसमय रूप में स्पष्ट ही प्रतीत होता है । पद के अवयव से द्योतन, जैसे— लोचनम् वाद्यनियमितविशिष्टजातिकरणघाद्यनुकरणशब्दवच्च । पदे चेति । पदे च सती- त्यर्थः । तेन रसप्रतीतिर्विभावादेरेव । ते विभावादयो यदा विशिष्टेन केनापि पदेनार्प्यमाणा रसचमत्कारविधायिनो भवन्ति तदा पदस्यैवासौ महिमा समर्प्यत इति भावः । अत्र हीति । वासवदत्तादाहाकर्णनप्रबुद्धशोकनिर्भरस्य वत्सराजस्येदं परि- देवितवचनम् । तत्र च शोको नामेष्टजनविनाशप्रभव इति तस्य जनस्य ये भ्रूक्षेपकटाक्षप्रभृतयः पूर्वं रतिविभावतामवलम्बन्ते स्म त एवात्यन्तविनष्टाः सन्त इदानीं स्मृतिगोचरतया निरपेक्षभावत्वप्राणं करुणमुद्दीपयन्तीति स्थितम् । ही है, बिना पद के गीत की भांति और पुष्कर वाद्य में नियमित एवं विशिष्ट जाति, करण, घ आदि अनुकरण शब्द की भांति । पद में—। अर्थात् पद के होने पर । अतः रस की प्रतीति विभावादि से ही होती है । भाव यह कि वे विभाव आदि विशिष्ट किसी पद से अर्प्यमाण होकर रस-चमत्कार का विधान करते हैं तब पद की ही वह महिमा समर्पित होती है । यहां—। वासवदत्ता के जल जाने की खबर सुनने से उत्पन्न शोकनिर्भर वाले वत्सराज का यह परिदेवितवचन है । इसमें बात यह है कि शोक इष्ट जन के विनाश से उत्पन्न होता है, इस प्रकार उस व्यक्ति के जो भ्रूक्षेप, कटाक्ष प्रभृति पहले रति की विभावना का अवलम्बन करते थे वे ही अत्यन्त विनष्ट होते हुए अब स्मृतिगोचर होने के