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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 391

तृतीय उद्योतः ३३१ ध्वन्यालोकः व्रीडायोगान्नतवदनया सन्निधाने गुरूणां बद्धोत्कम्पं कुचकलशयोर्र्मन्युमन्तर्निगृह्य। गुरुजनों (सास, असुर आदि) के समीप लज्जा के मारे सिर झुकाए, स्तन के कलशों में कम्प उत्पन्न कर देने वाले क्रोध को भीतर ही रोक कर और आँसू टपका लोचनम् ते लोचने इति तच्छब्दस्तल्लोचनगतस्वसंवेद्याव्यपदेश्यानन्तगुणस्मरणाकार- द्योतको रसस्यासाधारणनिमित्ततां प्राप्तः। तेन यत्केनचिच्चोदितं परिहृतं च तन्मिथ्यैव। तथाहि चोद्यम्—प्रक्रान्तपरामर्शकस्य तच्छब्दस्य कथमियति सामर्थ्यमिति। उत्तरं च—रसाविष्टोऽत्र पराम्रष्टेति। तदुभयमनुत्थानोपहतम्। यत्र ह्यनूद्दिश्यमानधर्मान्तरसाहित्ययोग्यधर्मयोगित्वं वस्तुनो यच्छब्देनाभिधाय तद्बुद्धिस्थधर्मान्तरसाहित्यं तच्छब्देन निर्वाह्यते। यत्रोच्यते—‘यत्तदोनित्य- सम्बन्धत्वम्’ इति, तत्र पूर्वप्रक्रान्तपरामर्शकत्वं तच्छब्दस्य। यत्र पुनर्निमित्तो- कारण निरपेक्षभावत्वप्राण करुण को उद्दीपित करते हैं। ‘उन आँखों को’ यहां ‘उन’ (‘तत्’) शब्द उसकी आँखों के स्वसंवेद्य एवं अव्यपदेश्य अनन्त गुणगणों के स्मरण के आकार का द्योतक बन कर रस का असाधारण निमित्त हो जाता है। इस लिए जो किसीने प्रश्न किया है और परिहार किया है, वह मिथ्या ही है। जैसा कि प्रश्न है—प्रक्रान्त के परामर्शक ‘तत्’ (‘उन’) शब्द की इतने में सामर्थ्य कैसे है? और उत्तर है—परामर्श करने वाला यहां रसाविष्ट है। ये दोनों अवसर न मिलने से (अनुत्थान के कारण) उपहत (वेकार) हैं। क्योंकि¹ जहां ‘यत्’ शब्द से वस्त्र का अनूद्दिश्यमान धर्मान्तर के साहित्ययोग्य धर्म का योगित्व अभिधान करके उस बुद्धिस्थ धर्मान्तर के साहित्य (सम्बन्ध) को ‘तत्’ शब्द के द्वारा बोध करते हैं, जहां कहते हैं— ‘यत्’ और ‘तत्’ का नित्य सम्बन्ध है, वहां ‘तत्’ शब्द पहले के प्रक्रान्त का परामर्शक होता है। फिर जहां ‘तत्’ शब्द किसी कारण से लाए गए स्मरण-विशेष के आकार का १. लोचनकार के कहने का आशय यह है कि ‘तत्’ शब्द का प्रयोग दो प्रकार से होता है। एक तो पूर्व प्रक्रान्त के परामर्श के लिए और दूसरा किसी निमित्त से प्राप्त स्मरण-विशेष के आकार की सूचना के लिए। जहां पहले प्रकार से प्रयोग होता है वहां ‘यत्तदोर्नित्यं सम्बन्धः’ इस नियम के अनुसार ‘यत्’ शब्द का होना अनिवार्य होता है, न होने पर आक्षेप कर लिया जाता है। किन्तु जहां किसी कारणवश प्राप्त स्मरण-विशेष के आकार का ‘तत्’ शब्द सूचक होता है वहाँ ‘यत्’ के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती। प्रस्तुत उदाहरण में ‘ते लोचने’ का ‘तत्’ शब्द दूसरे प्रकार से प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् यहाँ उस नायिका के नेत्रों के स्वसंवेद्य एवं अव्यपदेश्य अनन्त गुणों के स्मरण के आकार का द्योतक या सूचक है। किन्तु दूसरे किसी ने भ्रमवश प्रथम प्रकार से यहाँ ‘तत्’ शब्द का प्रयोग समझकर जो समाधान किया है वह सर्वथा ठीक नहीं।