भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 680 में से

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३३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तिष्ठेत्युक्तं किमिव न तया यत्समुत्सृज्य बाष्पं मय्यासक्तश्चकितहरिणीहारिनेत्रत्रिभागः ॥ कर उसने चकित हरिणी की भांति मनोहर नेत्रों का तीसरा भाग (अर्थात् कटाक्ष) मुझमें लगा दिया तो क्या उसने 'ठहरो' यह नहीं कहा ? लोचनम् पनतस्मरणविशेषाकारसूचकत्वं तच्छब्दस्य 'स घट' इत्यादौ यथा, तत्र का परामर्शकत्वकथेत्यास्तामलीकपरामर्शकैः पण्डितम्मन्यैः सह विवादेन । उत्कम्पिनीत्यादिना तदीयभयानुभावोत्प्रेक्षणम् । मयाऽनिर्वाहितप्रतीकार- मिति शोकावेशस्य विभावः । ते इति सातिशयविभ्रमैकायतनरूपे अपि लोचने विधुरे कान्दिशीकतया निर्लङ्के क्षिपन्ती कस्त्राता कासावार्यपुत्र इति तयो- र्लोचनयोस्तादृशी चावस्थेति सुतरां शोकोद्द्दीपनम् । क्रूरेणेति । तस्यायं स्वभाव एव । किं कुरुतां तथापि च धूमेनान्धीकृतो द्रष्टुमसमर्थ इति न तु सविवेकस्येदृशानुचितकारित्वं सम्भाव्यते, इति स्मर्यमाणं तदीयं सौन्दर्य- मिदानीं सातिशयशोकावेशविभावतां प्राप्तमिति । ते शब्दे सति सर्वोऽयमर्थो निर्व्यूढः । एवं तत्र तत्र व्याख्यातव्यम् । सूचक होता है, जैसे 'वह घट' इत्यादि में, वहां परामर्शकत्व की बात क्या ? मिथ्या परामर्श करने वाले पण्डितम्मन्य जनों के साथ विवाद व्यर्थ है ! 'उत्कम्पशील' इत्यादि से उसके भय के अनुभावों का उत्प्रेक्षण है । जब कि मैंने कोई उसका प्रतीकार नहीं किया, यह शोकावेश का विभाव है । 'उन' अर्थात् अतिशय विलासों के एकमात्र आयतन रूप भी भय के मारे विधुर नेत्रों को दौड़ाती हुई 'कौन बचाने वाला है, वह आर्यपुत्र कहां हैं ?' यह उन आंखों की अवस्था पूर्ण रूप से शोक का उद्दीपन है । क्रूर—। उसका यह स्वभाव ही है । क्या करें, तथापि धुयें से अन्धा होने के कारण देख नहीं सका; विवेकशील व्यक्ति ऐसा अनुचित नहीं कर सकता । इस प्रकार स्मरण किया जाता हुआ उसका (रत्नावली का) सौन्दर्य इस समय अतिशय शोकावेश का विभाव बन रहा है । 'उन' शब्द के होने पर यह सब अर्थ निर्वाह हो जाता है । इस प्रकार वहां-वहां व्याख्यान कर लेना चाहिए । आचार्य लिखते हैं कि जहाँ 'तत्' शब्द पूर्व प्रक्रान्त का परामर्शक होता है वहाँ दोनों का प्रयोग अनिवार्य है, जैसे, 'यो विद्वान् स पूज्यः' । यहाँ पर 'यत्' शब्द से अनुद्दिश्यमान धर्मान्तर पूज्यत्व के साथ सम्बन्धयोग्य धर्मान्तर विद्वत्त्व के सम्बन्ध का अभिधान करके उस बुद्धि धर्मान्तर विद्वत्त्व का साहित्य सम्बन्ध 'तत्' शब्द से परामर्श किया गया है । प्रस्तुत उदाहरण में लोचनकार के अनुसार 'ते' यह पद स्मरण विशेषाकार का सूचक होने के कारण, कि सहृदयों की रसप्रतीति में सहायक होता है, क्योंकि यहाँ इसी शब्द से करुण रस के अनुकूल विभावादि समर्प्यमाण होकर रस-चमत्कार को उत्पन्न करते हैं ।