भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 680 में से

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पृष्ठ 393

तृतीय उद्योतः ३३३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र त्रिभागशब्दः। वाक्यरूपश्चालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः शुद्धोऽलङ्कारसङ्कीर्णश्चेति द्विधा मतः। तत्र शुद्धस्योदाहरणं यथा रामाभ्युदये—‘कृतककुपितैः’ इत्यादि यहाँ तीसरा भाग (‘त्रिभाग)’ शब्द। वाक्यरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि ‘शुद्ध’ और ‘अलङ्कारसङ्कीर्ण’ यह दो प्रकार का माना गया है। उनमें ‘शुद्ध’ का उदाहरण, जैसे—रामाभ्युदय में ‘कृतककुपितैः०’ लोचनम् त्रिभागशब्द इति। गुरुजनमवधीर्यापि सा मां यथा तथापि साभिलाष- मन्युदैन्यगर्वमन्थरं विलोकितवतीत्येवं स्मरणेन परस्परहेतुकत्वप्राणप्रवास- विप्रलम्भोद्दीपनं त्रिभागशब्दसन्निधौ स्फुटं भातीति। वाक्यरूपश्चेति। प्रथमा- निर्देशेनाव्यतिरेकनिर्देशस्यायमभिप्रायः। वर्णपदतद्भागादिषु सत्स्वेवालक्ष्यक्रमो व्यङ्ग्यो निर्भासमानोऽपि समस्तकाव्यव्यापक एव निर्भासते, विभावादि- संयोगप्राणत्वात्। तेन वर्णादीनां निमित्तत्वमात्रमेव, वाक्यं तु ध्वनेरलक्ष्य- क्रमस्य न निमित्ततामात्रेण वर्णादिवदुपकारि, किं तु समग्रविभावादिप्रतिपत्ति- व्यापृतत्वाद्रसादिमयमेव तन्निर्भासत इति ‘वाक्ये’ इत्येतत्कारिकायां न निमित्तसप्तमीमात्रम्, अपि त्वनन्यत्र भावविषयार्थमपीति। शुद्ध इत्यर्थाल- ङ्कारेण केनाप्यसंमिश्रः। ‘तीसरा भाग’ (‘त्रिभाग’) शब्द—। गुरुजन की परवाह न करके भी वह मुझे जिस किसी प्रकार भी अभिलाष-सहित क्रोध, दैन्य एवं गर्व से मन्थर भाव से देखने लगी, इस प्रकार स्मरण से परस्पर हेतु होने से उत्पन्न होने वाले प्रवासविप्रलम्भ का उद्दीपन ‘तीसरा भाग’ (‘त्रिभाग’) शब्द के सन्निधान में स्पष्ट प्रतीत होता है। वाक्यरूप—। प्रथमा विभक्ति के निर्देश द्वारा अव्यतिरेक अर्थात् अभेद के बोधन का यह अभिप्राय है—वर्ण, पद और पदभाग आदि में निर्भासमान भी अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य समस्त काव्य में व्यापकरूप में ही निर्भासित होता है, क्यों कि विभाव आदि का संयोग उसका प्राण है। इस लिए वर्ण आदि निमित्तमात्र ही होते हैं, परन्तु वाक्य अलक्ष्यक्रम ध्वनि का निमित्ततामात्र से वर्ण आदि की भांति उपकार नहीं करता, किन्तु समग्र विभाव आदि की प्रतिपत्ति (ज्ञान) से व्यापृत होने के कारण वह (वाक्य) रसमय ही निर्भासित होता है, इस लिए ‘वाक्य में’ यह (दूसरी) कारिका में निमित्तार्थक सप्तमीमात्र नहीं है। अपि तु अन्यत्र विषय का अभाव है इस (अर्थ के बोध के लिए सप्तमी है)। ‘शुद्ध’ अर्थात् किसी भी अर्थालङ्कार से न मिला हुआ।