भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 394

३३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्लोकः । एतद्धि वाक्यं परस्परानुरागं परिपोषप्राप्तं प्रदर्शयत्सर्वत एव परं रसत्त्वं प्रकाशयति । इत्यादि श्लोक । यह वाक्य परिपुष्ट परस्परानुराग को प्रदर्शित करता हुआ सब ओर से उत्कृष्ट रसत्त्व को प्रकाशित करता है । लोचनम् कृतककुपितैर्बाष्पाम्भोभिः सदैन्यवलोकितै- र्वनमपि गता यस्य प्रीत्या धृतापि तथाम्बया । नवजलधरश्यामाः पश्यन्दिशो भवतीं विना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव प्रियः ॥ अत्र तथा तैस्तैः प्रकारैर्मात्रा धृतापीत्यनुरागपरवशतवेन गुरुवचनोल्लङ्घन- मपि त्वया कृतमिति । प्रिये प्रिय इति परस्परजीवितसर्वस्वाभिमानात्मको रतिस्थायिभाव उक्तः । नवजलधरेत्यसोढपूर्वप्रावृषेण्यजलदालोकनं विप्रलम्भो- द्दीपनविभावत्वेनोक्तम् । जीवत्येवेति सापेक्षभावता एवकारेण करुणावकाश- निराकरणायोक्ता । सर्वत एवेति । नात्रान्यतमस्य पदस्याधिकं किञ्चिद्रसव्यक्ति- हेतुत्वमित्यर्थः । रसत्त्वमिति । विप्रलम्भशृङ्गारात्मतत्त्वम् । [ कृतककुपितैर्बाष्पाम्भोभिः सदैन्यविलोकितै- र्वनमपि गता यस्य प्रीत्या धृताऽपि तथाऽम्बया । नवजलधरश्यामाः पश्यन् दिशो भवतीं विना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव प्रियः ॥ ] कृत्रिम कोपों से, अश्रुजलों से और दीनतापूर्ण निरीक्षणों से उस प्रकार माता के द्वारा रोके जाने पर भी जिसके प्रेमवश तू वन को भी चली आई, हे प्रिये ! नये बादलों से श्यामवर्ण दिशाओं को देखताहुआ तुम्हारे बिना कठिनहृदय वह प्रिय जी ही रहा है । यहां उस प्रकार उन उन प्रकारों से माता के द्वारा रोके जाने पर भी, अर्थात् अनुराग के परवश होने के कारण गुरुवचन का उल्लंघन भी तुमने किया । 'प्रिये' 'प्रिय', इससे एक दूसरे के जीवितसर्वस्व होने के अभिमान रूप रतिस्थायिभाव कहा गया है । 'नये बादल' इससे असह्य वर्षाकालीन बादलों का आलोकन विप्रलम्भ के उद्दीपनविभाव के रूप में कहा है । 'जी ही रहा है' 'ही' ( एवकार ) से यह सापेक्षभावता करुण रस के प्रसंग के निराकरण के लिए कही गई है । सब ओर से-। अर्थात् यहां कोई ऐसा पद नहीं जो कुछ ही रस की अभिव्यक्ति करता है । रसत्त्व अर्थात् विप्रलम्भशृङ्गार रूप आत्मतत्त्व ।