ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३३५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः अलङ्कारान्तरसङ्कीर्णो यथा—'स्मरनवनदीपूरेणोढाः' इत्या दिश्लो- कः । अत्र हि रूपकेण यथोक्तव्यञ्जकलक्षणानुगतेन प्रसाधितो रसः सुतरामभिव्यज्यते ॥ ३-४ ॥ अलङ्कारान्तरसङ्कीर्ण, जैसे— 'स्मरनवनदीपूरेणोढाः' इत्यादि श्लोक । यहाँ व्यञ्जक यथोक्त लक्षणों से युक्त रूपक से अलङ्कृत रस अच्छे ढङ्ग से अभिव्यक्त होता है ॥ ३-४ ॥ लोचनम् स्मरनवनदीपूरेणोढाः पुनर्गुरुसेतुभिर्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूर्णमनोरथाः । तदपि लिखितप्रख्यैरङ्गैः परस्परसन्मुखा नयननलिनीनालाानीतं पिबन्ति रसं प्रियाः ॥ रूपकेणेति । स्मर एव नवनदीपूरः प्रावृषेण्यप्रवाहः सरभसमेव प्रवृद्धत्वात् तेनोढाः परस्परसांमुख्यमबुद्धिपूर्वमेव नीताः । अनन्तरं गुरवः श्वश्रूप्रभृतय एव सेतवः, इच्छाप्रसररोधकत्वात् । अथ च गुरवोऽलङ्घ्याः सेतवस्तैः विधृताः प्रतिहतेच्छाः । अत एवापूर्णमनोरथास्तिष्ठन्ति । तथापि परस्परोन्मुखता- लक्षणेनान्योन्यतादात्म्येन स्वदेहे सकलवृत्तिनिरोधाल्लिखितप्रायैरङ्गैर्नयनान्येव नलिनीनालानि तैरानीतं रसं परस्पराभिलाषलक्षणमास्वादयन्ति परस्परा- भिलाषात्मकदृष्टिच्छटामिश्रीकारयुक्त्यापि कालमतिवाहयन्तीति । ननु नात्र [ स्मरनवनदीपूरेणोढाः पुनर्गुरुसेतुभि- र्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूर्णमनोरथाः । तदपि लिखितप्रख्यैरङ्गैः परस्परमुन्मुखा नयननलिनीनालाानीतं पिबन्ति रसं प्रियाः ॥ ] काम की नयी नदी के प्रवाह में बहे जाते हुए, पुनः गुरु (गुरुजन, माता-पिता आदि, पक्ष में विशाल) के सेतु से रोके गए अपूर्णमनोरथ प्रिय (प्रेमी और प्रेमिका) यद्यपि दूर-दूर खड़े रहते हैं तथापि चित्रलिखित की भांति अंगों से उन्मुख होकर नेत्रों के मृणाल से लाए गए रस का परस्पर पान करते हैं । रूपक से—। काम ही नवनदीपूर अर्थात् वर्षाकालीन प्रवाह है, क्योंकि बड़े वेग से वह बढ़ जाता है, उसके द्वारा ऊढ अर्थात् बिना सोचे-विचारे ही एक दूसरे के सम्मुख हुए । अनन्तर, गुरु अर्थात् सास प्रभृति ही सेतु हैं, क्योंकि वे इच्छा के वेग को रोक देते हैं, और भी, गुरु अर्थात् अलङ्घ्य जो सेतु हैं उनके द्वारा रोके गए अर्थात् प्रतिहत इच्छा वाले । अत एव अपूर्णमनोरथ खड़े रहते हैं । तथापि परस्पर उन्मुखतारूप अन्योन्य तादात्म्य के द्वारा अपने शरीर में समस्त वृत्तियों का विरोध हो जाने पर लिखितप्राय अङ्गों से (उपलक्षण में तृतीया) नयनरूपी नलिनीनालों अर्थात् मृणालों द्वारा आनीत परस्पराभिलाषरूप रस का आस्वादन करते हैं, अर्थात् परस्पराभिलाषरूप दृष्टिच्छटा के मिश्रीकार की युक्ति से भी काल-यापन करते हैं । (शङ्का—) यहां रूपक का पूर्ण रूप से