ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः सङ्घटनायां भासते ध्वनिरित्युक्तं तत्र सङ्घटना- स्वरूपमेव तावन्निरूप्यते— अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि संघटना में (भी) भासित होता है, यह कह चुके हैं, वहाँ संघटना का स्वरूप ही पहले निरूपण करते हैं— लोचनम् रूपकं निर्व्यूढं हंसचक्रवाकादिरूपेण नायकयुगलस्यारूपितत्वात् । ते हि हंसाद्या एकनलिनीनालानीतसलिलपानक्रीडादिषूचिता इत्याशङ्क्याह— यथोक्तव्यञ्जकेति । उक्तं हि पूर्वम्—'विवक्षातत्परत्वेन' इत्यादौ 'नातिनिर्वहणै- षिता' इति । प्रसाधित इति । विभावादिभूषणद्वारेण रसोऽपि प्रसाधित इत्यर्थः ॥ सङ्घटनायामिति भावे प्रत्ययः, वर्णादिवच्च निमित्तमात्रे सप्तमी । उक्तमिति । कारिकायाम् । निरूप्यत इति । गुणेभ्यो विविक्ततया विचार्यत इति यावत् । निर्वाह नहीं किया गया है, क्योंकि नायकयुगल का हंस, चक्रवाक आदि रूप से रूपण नहीं किया गया है, क्योंकि वे हंस आदि एक मृणाल से आनीत जल के पान की क्रीड़ा आदि कार्यों में काबिल होते हैं, यह आशंका करके कहते हैं—व्यंजक यथोक्तलक्षण—। पहले कह चुके हैं 'विवक्षातत्परत्वेन' इत्यादि में 'नातिनिर्वहणैषिता' अर्थात् किसी अलङ्कार के अति दूर तक निर्वाह की इच्छा न हो । अलंकृत—। अर्थात् विभाव आदि भूषण के द्वारा रस भी अलंकृत या प्रसाधित होता है ॥ ३-४ ॥ 'संघटना' यह भाव में प्रत्यय है और (पूर्व कारिका में) 'वर्ण' आदि की भांति निमित्त मात्र में 'सप्तमी' है । कही है—कारिका में । निरूपण करते हैं—अर्थात् गुणों से भिन्न रूप से विचार करते हैं । 'रसान्' (हंसों को) यह कारिका में द्वितीयार्थ का १. यहाँ ध्वनिकार 'संघटना' पर एक विस्तृत विचार प्रस्तुत करते हैं । ध्वनिकार से पूर्व आचार्य वामन ने 'रीति' के नाम को साहित्य-शास्त्र में प्रतिष्ठित किया था और 'रीति' को काव्य का आत्मा बताया था ('रीतिरात्मा काव्यस्य') । दण्डी ने रीति को 'मार्ग' कहा, किन्तु प्रसिद्धिवश उसका लक्षण नहीं किया । साहित्य-शास्त्र के आद्य आचार्य भामह के ग्रन्थ में इसका उल्लेख नहीं मिलता । आचार्य वामन ने 'विशिष्टपदरचना' को 'रीति' कहा है और 'विशेष' का अर्थ 'गुण' किया है। इस प्रकार गुणात्मक पदरचना ही 'रीति' है। वामन ने रीति को तीन प्रकार की माना है—वैदर्भी, गौडी और पाञ्चाली । ओज, प्रसाद आदि समग्र गुणों वाली रचना 'वैदर्भी' है, ओज और कान्ति गुणों वाली रचना 'गौडी' है और माधुर्य और सौकुमार्य से युक्त रचना 'पाञ्चाली' है । जिसमें सर्वथा समास का अभाव हो उसे शुद्ध वैदर्भी कहा है। आनन्दवर्धन की प्रस्तुत 'सङ्घटना' वामन की 'रीति' ही है, क्योंकि ये भी असमासा, मध्यम-समासा और दीर्घसमासा, तीन भेद करते हैं, जिनमें पदरचना का ही उपयोग है । आनन्दवर्धन ने रीति या सङ्घटना को इतना महत्त्व नहीं दिया जो वामन ने दिया, किन्तु आचार्य आनन्दवर्धन इतना अवश्य स्वीकार करते हैं कि वर्ण, पद आदि की भाँति सङ्घटना भी काव्य के आत्मा 'ध्वनि' को व्यञ्जित करती है, रस से उसका गहरा सम्बन्ध है ।