भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 397

तृतीय उद्योतः ३३७ ध्वन्यालोकः असमसा समासेन मध्यमेन च भूषिता । तथा दीर्घसमासेति त्रिधा सङ्घटनोदिता ॥ ५ ॥ कैश्चित्—तां केवलमनूद्येदमूच्यते— गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन्व्यनक्ति सा । रसान्— सा सङ्घटना रसादीन् व्यनक्ति गुणानाश्रित्य तिष्ठन्तीति । अत्र च विकल्प्यं गुणानां सङ्घटनायाश्चैक्यं व्यतिरेको वा । व्यतिरेकेऽपि संघटना तीन प्रकार की कही है—असमासा, मध्यम-समासा तथा दीर्घसमासा ॥ कुछ लोगों ने उसका केवल अनुवाद करके यह कहते हैं— माधुर्य आदि गुणों का आश्रयण करके रहती हुई वह रसों को व्यक्त करती है । वह संघटना रस आदि को व्यक्त करती है गुणों का आश्रयण करके रहती हुई । यहाँ विकल्प करना चाहिए कि गुणों का और संघटना का ऐक्य (अभेद) है अथवा लोचनम् रसानिति कारिकायां द्वितीयार्थस्यायं पदम् । 'रसांस्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः' इति कारिकार्धम् । बहुवचनेनाद्यर्थः सङ्गृहीत इति दर्शयति— रसादीनिति । अत्र चेति । अस्मिन्नेव कारिकार्धे । विकल्पेनेदमर्थजातं कल्पयितुं व्याख्यातुं शक्यम्, किं तदित्याह—गुणानामिति । त्रयः पक्षा ये सम्भाव्यन्ते ते पद है । 'रसांस्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः' यह कारिकार्ध है । बहुवचन से 'आदि' अर्थ संगृहीत है, यह दिखाते हैं—रस आदि को—। यहां—। इसी कारिकार्ध में । विकल्प के द्वारा यह अर्थसमूह कल्पना, व्याख्यान किया जा सकता है, वह क्या है ? कहते हैं—गुणों के—। तीन १ पक्ष जो सम्भावित होते हैं व्याख्यान किए जा १. मुख्यरूप से सङ्घटना और गुणों का सम्बन्ध और सङ्घटना को रसाभिव्यक्ति का एक साधन, ये दो बातें प्रस्तुत ग्रन्थ में विवेचित हैं, इसकी आधारभूत कारिका का यह अंश है—'गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा । रसान् ।' कारिका के 'गुणानाश्रित्य' इस निर्देश के अनुसार गुणों और सङ्घटना के सम्बन्ध को लेकर तीन विकल्प किए गए हैं—प्रथम विकल्प के अनुसार गुण और रीति का अभेद है, (भेद पक्ष स्वीकार करने पर) सङ्घटना के आश्रित गुण हैं अथवा गुण के आश्रित सङ्घटना है, ये दो विकल्प हैं । वामन ने रीति और गुण का अभेद माना है । इस अभेद पक्ष के अनुसार 'गुणानाश्रित्य' का अर्थ 'आत्मभूत गुणों का आश्रयण करके' । यद्यपि गुण और सङ्घटना का अभेद है तथापि 'शिंशपा के आश्रित वृक्षत्व' की भाँति स्वाभिन्न वस्तु का भी स्व से भेद परिकल्पित किया है । गुण और सङ्घटना में भेद मानने वाले भट्ट उद्भट आदि के अनुसार गुण सङ्घटना के धर्म हैं, और धर्म अपने धर्मी के आश्रित होते ही हैं इस लिए गुण २२ ध्व०