भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 680 में से

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पृष्ठ 398

३३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः द्वयी गतिः । गुणाश्रया सङ्घटना, सङ्घटनाश्रया वा गुणा इति । तत्रै- क्यपक्षे सङ्घटनाश्रयगुणपक्षे च गुणानात्मभूतानाधेयभूतान्वाश्रित्य तिष्ठन्ती सङ्घटना रसादीन् व्यनक्तीत्ययमर्थः । यदा तु नानात्वपक्षे गुणाश्रयसङ्घटनापक्षः तदा गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती गुणपरतन्त्रस्वभावा न तु गुणरूपैवेत्यर्थः । किं पुनरेवं विकल्पनस्य प्रयोजनमिति ? व्यतिरेक (भेद)। व्यतिरेक (भेद) में भी दो ढङ्ग हैं, गुणों के आश्रित संघटना है या संघटना के आश्रित गुण हैं। वहाँ, ऐक्य (अभेद) पक्ष में और संघटना के आश्रित गुणों के पक्ष में अर्थ यह होता है कि आत्मभूत अथवा आधेयभूत गुणों का आश्रयण करके रहती हुई संघटना रस आदि को व्यक्त करती है। परन्तु जब नानात्व (अर्थात् भेद) पक्ष में गुणों के आश्रित संघटना का पक्ष (मानते हैं) तब अर्थ होता है कि गुणों के आश्रयण करके रहती हुई, गुणों के परतंत्र स्वभाव वाली है, न कि गुण रूप ही है। फिर इस प्रकार विकल्प करने का प्रयोजन क्या है ? लोचनम् व्याख्यातुं शक्याः । कथ मत्याह—तत्रैक्यपक्ष इति । आत्मभूतानिति । स्वभाव- स्य कल्पनया प्रतिपादनार्थं प्रदर्शितभेदस्य स्वाश्रयवाचोयुक्तिर्दृश्यते शिंशपा- श्रयं वृक्षत्वमिति । आधेयभूतानिति । सङ्घटनाया धर्मा गुणा इति भट्टोद्भटादयः, धर्माश्च धर्म्याश्रिता इति प्रसिद्धो मार्गः। गुणपरतन्त्रेति । अत्र नाधाराधेय- सकते हैं। कैसे ? कहते हैं—वहां ऐक्यपक्ष में—। आत्मभूत—। स्वभाव के प्रतिपादन के लिए कल्पना से प्रदर्शित भेद वाली वस्तु का ‘स्वाश्रय’ कहने का ढङ्ग देखा जाता है, शिंशपा के आश्रित वृक्षत्व । आधेयभूत—। ‘भट्ट उद्भट’ आदि के अनुसार गुण संघटना के धर्म हैं और यह प्रसिद्ध मार्ग (मन्तव्य) है कि धर्म धर्मी के आश्रित होते हैं। गुणों के परतन्त्र—। यहां आश्रय का अर्थ आधाराधेयभाव नहीं है, क्योंकि गुणों में संघटना के आश्रित हैं। इसके अनुसार ‘गुणान् आधेयभूतान् आश्रित्य’ अर्थात् आधेयभूत गुणों का आश्रयण करके, यह अर्थ होगा। तीसरे विकल्प के अनुसार संघटना गुणों के आश्रित है, अर्थात् संघटना अपने आधारभूत गुणों का आश्रयण करती है (‘गुणानाश्रित्य’)। यह अन्तिम विकल्प आचार्य आनन्दवर्धन का अपना सिद्धान्त-पक्ष है। संघटना को गुणों के आश्रित मानते हुए वह उसे रसों का अन्यतम व्यञ्जक भी मानते हैं। ‘गुणानाश्रित्य’ इस कारिकांश को तीनों विकल्पों के अनुसार सङ्गत करके आचार्य ने तीनों के अनुसार सङ्घटना की रसव्याञ्जकता सूचित की है। सङ्घटना गुणों के आश्रित है, इसका अभिप्राय यह नहीं कि गुणों के साथ सङ्घटना का आधारा- धेयभाव है, क्योंकि गुणों में सङ्घटना नहीं रहती है। इस लिए सङ्घटना गुण के परतन्त्र होकर रहती है, उनकी वह मुखापेक्षिणी है। जैसे राजाश्रित प्रजावर्ग, राजा के परतन्त्र या मुखापेक्षी होकर रहता है। यह बात ‘लोचन’ में निर्दिष्ट है।

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