भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 680 में से

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पृष्ठ 399

तृतीय उद्योतः ३३९ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः अभिधीयते—यदि गुणाः सङ्घटना चेत्येकं तत्त्वं सङ्घटनाश्रया वा गुणाः, तदा सङ्घटनाया इव गुणानामनियतविषयत्वप्रसङ्गः । गुणा- नां हि माधुर्यप्रसादप्रकर्षः करुणविप्रलम्भशृङ्गारविषय एव । रौद्राद्भु- तादिविषयमोजः । माधुर्यप्रसादौ रसभावतदाभासविषयावेवेति विषय- नियमो व्यवस्थितः, सङ्घटनायास्तु स विघटते । तथा हि शृङ्गारेऽपि दीर्घसमासा दृश्यते रौद्रादिष्वसमासा चेति । बताते हैं—यदि गुण और संघटना एक तत्त्व है अथवा संघटना के आश्रित गुण हैं, तब संघटना की भांति गुणों की अनियतता का प्रसंग होगा । क्योंकि गुणों का माधुर्यप्रसाद-प्रकर्ष करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में ही होता है । ओज के विषय रौद्र, अद्भुत आदि हैं । माधुर्य और प्रसाद (गुण) रस, भाव और भावाभास को ही विषय करते हैं, इस प्रकार विषय का नियम व्यवस्थित है, परन्तु सङ्घटना में वह (नियम) विघटित हो जाता है । जैसा कि शृङ्गार में भी दीर्घसमासा और रौद्र आदि में भी असमासा (संघटना) देखी जाती है । लोचनम् भाव आश्रयार्थः । न हि गुणेषु सङ्घटना तिष्ठतीति । तेन राजाश्रयः प्रकृतिवर्ग- इत्यत्र यथा राजाश्रयौचित्येनामात्यादिप्रकृतय इत्ययमर्थः, एवं गुणेषु परतन्त्र- स्वभावा तदायत्ता तन्मुखप्रेक्षिणी सङ्घटनेत्ययमर्थो लभ्यत इति भावः । सङ्घटनाया इवेति । प्रथमपक्षे तादात्म्येन समानयोगक्षेमत्वादितरत्र तु धर्मत्वेनेति भावः । भवत्वनियतविषयतेत्याशङ्क्याह—गुणानां हीति । हिशब्द- स्तुशब्दार्थे । न त्वेवमुपपद्यते, आपद्यते तु न्यायबलादित्यर्थः । स इति । योऽयं गुणेषु नियम उक्तोऽसावित्यर्थः । तथात्वे लक्ष्यदर्शनमेव हेतुत्वेनाह— तथा हीति । सङ्घटना नहीं रहती है । इसलिए 'प्रकृतिवर्ग राजा का आश्रित है' यहां जैसे राजा के आश्रय के औचित्य से अमात्य आदि प्रकृतियां हैं, यह अर्थ है, इस प्रकार गुणों में परतन्त्रस्वभाव अर्थात् उनके अधीन अर्थात् उनके मुंह ताकने वाली (अपेक्षा करने वाली) सङ्घटना है यह अर्थ प्राप्त होता है, यह भाव है । संघटना की भांति—। पहले पक्ष में तादात्म्य होने से योगक्षेम समान होगा और अन्यत्र (दूसरे पक्ष में) धर्म होने के कारण (योगक्षेम समान होगा), यह भाव है । अनियतविषयत्व हो (क्या हर्ज है?) यह आशङ्का करके कहते हैं—क्योंकि गुणों का—। 'क्योंकि' शब्द 'परन्तु' शब्द के अर्थ में है, अर्थात् न कि इस प्रकार उत्पन्न होगा, परन्तु न्यायबल से आपन्न होगा । वह—। अर्थात् जो यह गुणों में नियम कहा है वह । उस स्थिति में लक्ष्य का दर्शन ही हेतुरूप से कहते हैं—जैसा कि ।