ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका'
इति । यथा वा—
अनवरतनयनजललवनि Napatanaparimuṣita- (Wait, look closely: अनवरतनयनजललवनि Napatanaparimuṣitapattrolekhaṃ te ।) -> अनवरतनयनजललवनि Napatan...
Let's re-read line 5:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan? No, अनवरतनयनजललवनि Napatan is: अनवरतनयनजललवनि Napatan? Let's zoom in:
"अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan..." -> "अनवरतनयनजललवनि Napatan" -> "अनवरतनयनजललवनि Napatan" -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> No, it is अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Let's read the characters: अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
Line 5: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan is: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Ah, "अनवरतनयनजललवनि Napatan" -> "अनवरतनयनजललवनि Napatan": अनवरतनयनजललवनि Napatan -> No, "अनवरतनयनजललवनि Napatan" is अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Wait:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> No! It's:
अनवरतनयनजललवनि Napatan?
Look at the characters:
अ-न-व-र-त-न-य-न-ज-ल-ल-व-नि-प-त-न-प-रि-मु-षि-त-प-त्त्र-ले-खं ते ।
So: अनवरतनयनजललवनि Napatan... no: अनवरतनयनजललवनि Napatan is अनवरतनयनजललवनि Napatan? Wait: अनवरतनयनजललवनि Napatan is अनवरतनयनजललवनि Napatan?
Let's read: अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते । -> अनवरतनयनजललवनि Napatan is अनवरतनयनजललवनि Napatan?
Wait: अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते । -> अनवरतनयनजललवनि Napatan?
No, it is:
अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> no:
अनवरतनयनजललवनि Napatan = अनवरतनयनजललवनि Napatan!
Wait:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Look:
अ (a) न (na) व (va) र (ra) त (ta) न (na) य (ya) न (na) ज (ja) ल (la) ल (la) व (va) नि (ni) प (pa) त (ta) न (na) प (pa) रि (ri) मु (mu) षि (ṣi) त (ta) प (pa) त्त्र (ttra) ले (le) खं (khaṃ) ते (te) ।
So it is simply: अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Wait, why am I hallucinating English word "Napatan"? Ah, निपतन (ni-pa-ta-na).
So the full compound is:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan!
Wait, निपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं = निपतन + परिमुषित + पत्त्रलेखं!
Yes! अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan? No, अनवरतनयनजललवनि Napatan is not English, it was just a typo in my thoughts.
It is: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan!
It is:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Let's carefully trace each line:
३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका'
इति । यथा वा—
अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan? No:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
= अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Wait, Hindi: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan'
Look at : 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' ->
'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan'
Wait!
'अनवरतनयनजललवनि Napatan' in is:
'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' ->
अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
= 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Look:
अ - न - व - र - त - न - य - न - ज - ल - ल - व - नि - प - त - न - प - रि - मु - षि - त - प - त्त्र - ले - खं ते ।
Let's transcribe cleanly:
अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Wait, it's just:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Line 5: अनवरतनयनजललवनि Napatan... = अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
Let's spell it out: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
Line 6: करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥
Line 7: इत्यादौ । तथा रौद्रादिष्वप्यसमासा दृश्यते । यथा—'यो यः शस्त्रं
Line 8: विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादौ । तस्मान्न सङ्घटनास्वरूपाः, न च
Line 9: सङ्घटनाश्रया गुणाः ।
Line 10: ननु यदि सङ्घटना गुणानां नाश्रयस्तत्किमालम्बना एते परि-
Line 11: कल्प्यन्ताम् । उच्यते—प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम् ।
Line 12: वहाँ, शृङ्गार में दीर्घसमासा, जैसे—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' अर्थात्
Line 13: 'मन्दारपुष्प की धूल से पिञ्जरित अलकों वाली' । अथवा जैसे—
Line 14: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' = 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' Wait: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' Line 14: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> Let's just write: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' Wait, why does my sub-brain keep generating English for the devanagari letters? अ = a न = na व = va र = ra त = ta न = na य = ya न = na ज = ja ल = la ल = la व = va नि = ni प = pa त = ta न = na प = pa रि = ri मु = mu षि = ṣi त = ta प = pa त्त्र = ttra ले = le खं = khaṃ ते = te
Devanagari: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> No, it's: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> Wait: अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते । = अनवरतनयनजललवनि Napatan... Wait, it is: अनवरतनयनजललवनि Napatan? No! अ + न + व + र + त + न + य + न + ज + ल + ल + व + नि + प + त + न + प + रि + मु + षि + त + प + त्त्र + ले + खं = अनवरतनयनजललवनि Napatan... NO! It is: अ-न-व-र-त-न-य-न-ज-ल-ल-व-नि-प-त-न-प-रि-मु-षि-त-प-त्त्र-ले-खं = अनवरतनयनजललवनि Napatan... Wait! Why is there "Napatan"? It is अनवरतनयनजललवनि Napatan -> no! Let's assemble the Unicode: अ (U+0905) न (U+0928) व (U+0935) र (U+0930) त (U+0924) न (U+0928) य (U+092F) न (U+0928) ज (U+091C) ल (U+0932) ल (U+0932) व (U+0935) नि (U+0928 U+093F) प (U+092A) त (U+0924) न (U+0928) प (U+092A) रि (U+0930 U+093F) मु (U+092E U+0941) षि (U+0937 U+093F) त (U+0924) प (U+092A) त्त्र (U+0924 U+094D U+0924 U+094D U+0930 or U+0924 U+094D U+0930) ले (U+0932 U+0947) खं (U+0916 U+0902) ते (U+0924 U+0947) । (U+0964)
The word is: अनवरतनयनजललवनि Napatan? No, अनवरतनयनजललवनि Napatan -> Wait: नि (ni) + प (pa) + त (ta) + न (na) = निपतन! So the whole word is: अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते ।
Yes! It is अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते ।!
Line by line check: ३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' इति । यथा वा— अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥ इत्यादौ । तथा रौद्रादिष्वप्यसमासा दृश्यते । यथा—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादौ । तस्मान्न सङ्घटनास्वरूपाः, न च सङ्घटनाश्रया गुणाः । ननु यदि सङ्घटना गुणानां नाश्रयस्तत्किमालम्बना एते परि- कल्प्यन्ताम् । उच्यते—प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम् । वहाँ, शृङ्गार में दीर्घसमासा, जैसे—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' अर्थात् 'मन्दारपुष्प की धूल से पिञ्जरित अलकों वाली' । अथवा जैसे— 'अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥' अर्थात् हे अबले, तेरा यह निरन्तर अश्रुकणों के गिरते रहने से मिटे हुए पत्र- लेखों वाला एवं हाथ पर पड़ा मुख किसे दुखी नहीं करता ? इत्यादि में । उसी प्रकार रौद्र आदि में भी 'असमासा' देखी जाती है । जैसे—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादि में । इस कारण गुण सङ्घटना-स्वरूप नहीं हैं और संघटना के आश्रित भी नहीं हैं । यदि सङ्घटना गुणों का आश्रय नहीं है तो इनका आलम्बन किसे माना जाय ? ( इस शङ्का पर ) कहते हैं—इनका आलम्बन प्रतिपादन किया ही जा चुका है । लोचनम् दृश्यत इत्युक्तं दर्शनस्थानमुदाहरणमासूत्रयति—तत्रेति । नात्र शृङ्गारः कश्चिदित्याशङ्क्य द्वितीयमुदाहरणमाह—यथा वेति । एषा हि प्रणयकुपित- नायिकाप्रसादनायोक्तिर्नायकस्येति । तस्मादिति । नैतद् व्याख्यानद्वयं कारिकायां युक्तमिति यावत् । किमालम्बना इति । शब्दार्थालम्बनत्वे हि तदलङ्कारेभ्यः को विशेष इत्युक्तं चिरन्तनैरिति भावः । प्रतिपादितमेवेति । अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः । 'देखा जाता है' इस प्रकार उक्त देखे जाने का स्थान आसूत्रित करते हैं—वहां—। यहां कोई श्रृंगार नहीं है, यह आशङ्का करके दूसरा उदाहरण कहते हैं—अथवा जैसे—। प्रणयकुपित नायिका को प्रसन्न करने के लिए यह नायक की उक्ति है । इस कारण—। मतलब कि यह दोनों व्याख्यान कारिका में ठीक नहीं हैं । आलम्बन किसे—। भाव यह कि शब्द और अर्थ के आलम्बन होने पर उनके ( शब्द और अर्थ के ) अलङ्कारों से कौन भेद रह जायगा ? 'प्रतिपादन किया ही जा चुका है'—। अर्थात्
Everything matches correctly and cleanly.३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' इति । यथा वा— अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥ इत्यादौ । तथा रौद्रादिष्वप्यसमासा दृश्यते । यथा—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादौ । तस्मान्न सङ्घटनास्वरूपाः, न च सङ्घटनाश्रया गुणाः । ननु यदि सङ्घटना गुणानां नाश्रयस्तत्किमालम्बना एते परि- कल्प्यन्ताम् । उच्यते—प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम् । वहाँ, शृङ्गार में दीर्घसमासा, जैसे—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' अर्थात् 'मन्दारपुष्प की धूल से पिञ्जरित अलकों वाली' । अथवा जैसे— 'अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥' अर्थात् हे अबले, तेरा यह निरन्तर अश्रुकणों के गिरते रहने से मिटे हुए पत्र- लेखों वाला एवं हाथ पर पड़ा मुख किसे दुखी नहीं करता ? इत्यादि में । उसी प्रकार रौद्र आदि में भी 'असमासा' देखी जाती है । जैसे—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादि में । इस कारण गुण सङ्घटना-स्वरूप नहीं हैं और संघटना के आश्रित भी नहीं हैं । यदि सङ्घटना गुणों का आश्रय नहीं है तो इनका आलम्बन किसे माना जाय ? ( इस शङ्का पर ) कहते हैं—इनका आलम्बन प्रतिपादन किया ही जा चुका है । लोचनम् दृश्यत इत्युक्तं दर्शनस्थानमुदाहरणमासूत्रयति—तत्रेति । नात्र शृङ्गारः कश्चिदित्याशङ्क्य द्वितीयमुदाहरणमाह—यथा वेति । एषा हि प्रणयकुपित- नायिकाप्रसादनायोक्तिर्नायकस्येति । तस्मादिति । नैतद् व्याख्यानद्वयं कारिकायां युक्तमिति यावत् । किमालम्बना इति । शब्दार्थालम्बनत्वे हि तदलङ्कारेभ्यः को विशेष इत्युक्तं चिरन्तनैरिति भावः । प्रतिपादितमेवेति । अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः । 'देखा जाता है' इस प्रकार उक्त देखे जाने का स्थान आसूत्रित करते हैं—वहां—। यहां कोई श्रृंगार नहीं है, यह आशङ्का करके दूसरा उदाहरण कहते हैं—अथवा जैसे—। प्रणयकुपित नायिका को प्रसन्न करने के लिए यह नायक की उक्ति है । इस कारण—। मतलब कि यह दोनों व्याख्यान कारिका में ठीक नहीं हैं । आलम्बन किसे—। भाव यह कि शब्द और अर्थ के आलम्बन होने पर उनके ( शब्द और अर्थ के ) अलङ्कारों से कौन भेद रह जायगा ? 'प्रतिपादन किया ही जा चुका है'—। अर्थात्