ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३४१ ध्वन्यालोकः तमर्थमवलम्बन्ते येऽङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः । अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ इति । अथवा भवन्तु शब्दाश्रया एव गुणाः, न चैषामनुप्रासादितुल्य- त्वम् । यस्मादनुप्रासादयोऽनपेक्षितार्थशब्दधर्मा एव प्रतिपादिताः । गुणास्तु व्यङ्ग्यविशेषावभासिवाच्यप्रतिपादनसमर्थशब्दधर्मा एव । शब्दधर्मत्वं चैषामन्याश्रयत्वेऽपि शरीराश्रयत्वमिव शौर्यादीनाम् । उस अङ्गी ( रस रूप ) अर्थ को जो अवलम्बन करते हैं वे गुण कहे जाते हैं और कटक आदि की भाँति अङ्गों के आश्रित रहने वालों को अलङ्कार मानना चाहिए । अथवा गुण शब्द के आश्रित ही हों, ( ऐसी स्थिति में ) इनकी अनुप्रास आदि से समानता नहीं है । क्योंकि अनुप्रास आदि अर्थ की अपेक्षा न रखने वाले शब्दमात्र के धर्म ही प्रतिपादन किए गए हैं, परन्तु गुण व्यङ्ग्यविशेष को अवभासित करने वाले वाच्य के प्रतिपादन में समर्थ शब्द के ही धर्म ( प्रतिपादन किए गए हैं )। और इनका शब्दधर्मत्व शौर्य आदि की भाँति अन्य के आश्रित होने पर भी शरीर के आश्रित होना ( माना गया है )। लोचनम् अथवेति । न ह्येकाश्रितत्वादेक्यं, रूपस्य संयोगस्य चैक्यप्रसङ्गात् । संयोगे द्वितीयमपेक्ष्यमिति चेत्—इहापि व्यङ्ग्योपकारकवाच्यापेक्षास्त्येवेति समानम् । न चायं मम स्थितः पक्षः, अपि तु भवत्वेषामविवेकिनामभिप्रायेणापि शब्द- धर्मत्वं शौर्यादीनामिव शरीरधर्मत्वम् । अविवेकी हि औपचारिकत्वविभागं विवेक्तुमसमर्थः । तथापि न कश्चिद्दोष इत्येवम्परमेतदुक्तमित्येतदाह—शब्द- धर्मत्वमिति । अन्याश्रयत्वेऽपीति । आत्मनिष्ठत्वेऽपीत्यर्थः । हमारे मूलग्रन्थकार द्वारा । अथवा—। एक ही ( वस्तु ) में आश्रित होने के कारण ही ( गुण और अलङ्कार का ) ऐक्य नहीं होगा, ( ऐसा होने पर ) रूप और संयोग दोनों का ऐक्य ( अभेद ) प्रसक्त होगा ( क्योंकि दोनों ही घट आदि द्रव्य के आश्रित हैं )। संयोग में दूसरे की अपेक्षा होती है तो ठीक है यहां भी व्यङ्ग्य के उपकारक वाच्य की अपेक्षा है ही अतः बात ( दोनों जगह ) बराबर है। यह ( गुणों का शब्दधर्मत्व ) मेरा पक्ष नहीं है, बल्कि इन अविवेकी जनों के अभिप्राय से भी ( गुणों का ) शब्दधर्मत्व शौर्य आदि के शरीरधर्मत्व की भांति मान लेते हैं। अविवेकी आदमी औपचारिकत्व का विवेक नहीं कर पाता । तथापि कोई दोष नहीं, इस अभिप्राय से यह कहा है, इस प्रकार यह कहते हैं—शब्दधर्म होना—। अन्य के आश्रित होने पर भी—। अर्थात् आत्मनिष्ठ होने पर भी ।