ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु यदि शब्दाश्रया गुणास्तत्सङ्घटनारूपत्वं तदाश्रयत्वं वा तेषां प्राप्तमेव । न ह्यसङ्घटिताः शब्दा अर्थविशेषप्रतिपाद्यरसाद्याश्रितानां गुणानामवाचकत्वादाश्रया भवन्ति । नैवम् ; वर्णपदव्यङ्ग्यत्वस्य रसादीनां प्रतिपादितत्वात् । यदि गुण शब्द के आश्रित हैं तब वे सङ्घटना रूप अथवा उसके आश्रित हो ही जायेंगे । क्योंकि असङ्घटित शब्द अर्थविशेष द्वारा प्रतिपाद्य रस आदि के आश्रित गुणों के अवाचक होने के कारण आश्रय नहीं होते । ऐसा नहीं; क्योंकि रस आदि का वर्ण और पद से व्यङ्ग्यत्व प्रतिपादित हो चुका है । लोचनम् शब्दाश्रया इति । उपचारेण यदि शब्देषु गुणास्तदेदं तात्पर्यम्—शृङ्गारा- दिरसाभिव्यञ्जकवाच्यप्रतिपादनसामर्थ्यमेव शब्दस्य माधुर्यम् । तच्च शब्दगतं विशिष्टघटनयैव लभ्यते । अथ सङ्घटना न व्यतिरिक्ता काचित् , अपि तु सङ्घटिता एव शब्दाः, तदाश्रितं तत्सामर्थ्यमिति सङ्घटनाश्रितमेवेत्युक्तं भवतीति तात्पर्यम् । ननु शब्दधर्मत्वं शब्दैकात्मकत्वं वा तावतास्तु, किमयं मध्ये सङ्घटनानु- प्रवेश इत्याशङ्क्य स एव पूर्वपक्षवाच्याह—न हीति । अर्थविशेषैर्न तु पदान्तर- निरपेक्षशुद्धपदवाच्यैः सामान्यैः प्रतिपाद्या व्यङ्ग्या ये रसभावतदाभासतत्- प्रशमास्तदाश्रितानां मुख्यतया तन्निष्ठानां गुणानामसङ्घटिताः शब्दा आश्रया न भवन्त्युपचारेणापीति भावः । अत्र हेतुः—अवाचकत्वादिति । न ह्यसङ्घटिताः व्यङ्ग्योपयोगिनिराकाङ्क्षरूपं वाच्यमाहुरित्यर्थः । एतत्परिहरति—नैवमिति । शब्द के आश्रित—। उपचार से यदि शब्दों में गुण रहते हैं तो तात्पर्य यह है— शब्द का माधुर्य शृङ्गारादि रस के अभिव्यञ्जक वाच्य के प्रतिपादन का सामर्थ्य है, और वह ( माधुर्य ) विशिष्ट घटना से ही शब्दगत प्राप्त होता है । और सङ्घटना अलग कुछ नहीं, बल्कि सङ्घटित शब्द ही हैं, उन ( सङ्घटित शब्द ) के आश्रित वह ( पूर्वोक्त ) सामर्थ्य है, इसलिए सङ्घटना के आश्रित ( सामर्थ्य ) ही उक्त हुआ, यह तात्पर्य है । ( गुणों का ) शब्दधर्मत्व अथवा शब्दैकात्मकत्व हो, बीच में सङ्घटना का अनु- प्रवेश क्यों ? यह आशङ्का करके वही पूर्वपक्षवादी कहता है—क्योंकि—। अर्थविशेषों से, न कि पदान्तर की अपेक्षा से रहित शुद्ध पद के सामान्य वाच्यों से, प्रतिपाद्य व्यङ्ग्य जो रस, भाव, रसाभास, भावप्रशम हैं, उनके आश्रित अर्थात् मुख्यरूप से तन्निष्ठ गुणों के असङ्घटित शब्द आश्रय उपचार से भी नहीं होते । यहां हेतु है— अवाचक होने के कारण—। अर्थात् असङ्घटित ( शब्द ) व्यङ्ग्य के उपयोगी निराकांक्ष- रूप वाच्य को नहीं कहते हैं । इसका परिहार करते हैं—ऐसा नहीं—। जब कि रस को